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सर्वप्रथम
हमें यह समझना होगा कि हमारे देश के विभाजन के समय हमारे तत्कालीन नेतृत्व ने सभी धर्मावलम्बियों तथा आदिवासियों एवं दलितों को आश्वस्त किया था कि वे भारत में रहना चाहें तो अवश्य रहें। उन्हें और उनकी धार्मिक आस्थाओं को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचने दी जायेगी। इसी विश्वास पर भरोसा करके दलित-आदिवासियों सहित; मुस्लिमों और कुछ क्रिश्चन परिवारों ने भारत को ही अपना राष्ट्र माना और हमारे पूर्वजों ने अपनी वचनबद्धता पर खरे उतरते हुए, भारत को धर्मरिनपेक्ष राष्ट्र घोषित किया।

आज के समय में अनेक लोगों को ज्ञात ही नहीं है कि दलित, आदिवासी, पिछडों द्वारा भी अलग राष्ट्र की मांग की गयी थी, जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री, मोहनदास कर्मचन्द गाँधी एवं मोहम्मद अली जिन्ना के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने के बाद यह तय हुआ कि डॉ. अम्बेडकर अलग राष्ट्र की मांग छोड देंगे और इसके बदले में भारत के मूल निवासी आदिवासियों, दलितों और पिछडों को सत्ता में संवैधानिक तौर पर हिस्सेदारी दी जायेगी। इसे सुनिश्चित करने के लिये तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सहित सभी पक्षों ने आदिवासी एवं दलितों के लिये सेपरेट इल्क्ट्रोल की संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने को सर्व-सम्मति से स्वीकृति दी। इन दोनों वचनबद्धताओं पर विश्वास करके इस देश में अल्पसंख्यक एवं आदिवासी व दलित साथ-साथ भारत में रहने को राजी हुए। लेकिन मोहनदास कर्मचन्द गाँधी, जिन्हें कुछ लोग भ्रमवश या अन्धभक्ति के चलते या अज्ञानतावश सत्य का पुजारी एवं राष्ट्रपिता कहने की गलती करते आ रहे हैं, उसने ब्रिटेन से भारत लौटते ही डॉ. अम्बेडकर के साथ हुए समझौते को इकतरफा नकार दिया एवं सैपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छोडने के लिये डॉ. अम्बेडकर दबाव बनाने के लिये भूख हडताल शुरू कर दी। जो लोग ऐसा मानते हैं, कि गाँधी इंसाफ के लिये उपवास या अनशन करते थे, वे यह जान लें कि सदियों से शोषित एवं अपमानित आदिवासी एवं दलितों के हकों को छीनने के लिये भी गाँधी ने उपवास शुरू कर दिया और मरने को तैयार हो गये। जिसका तत्कालीन गाँधीवादी मीडिया ने खुलकर समर्थन किया और अन्नतः डॉ. अम्बेडकर से गाँधी सेपरेट इलेक्ट्रोल का हक देने से पूर्व ही छीन लिया और जबरन आरक्षण का झुनझुना डॉ. अम्बेडकर के हाथ में थमा दिया। जबकि आरक्षण आदिवासी एवं दलितों कभी भी मांग का हिस्सा या ऐजेण्डा नहीं था। ऐसे में गाँधी के धोखे एवं कुटिल चलाकियों में फंसकर देश की करीब 30 प्रतिशत आदिवासी एवं दलित आबादी इस देश की ही नागरिक तो बनी रही, लेकिन इस विश्वास के साथ कि उन्हें शिक्षण संस्थाओं में एवं सरकारी सेवाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्राप्त होता रहेगा। जिसके लिये संविधान में अनेक उपबन्ध एवं अनुच्छेद जोडे गये। इसी प्रकार से संवैधानिक तौर पर भारत आज भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और हर व्यक्ति को यहाँ पर धार्मिक आजादी है। लेकिन हिन्दूवादी कट्टरपंथियों और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को बढावा देने वाले राजनैतिक दलों ने धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को विकृत कर दिया है।

आगे लिखने से पूर्व साफ कर दूँ कि मैं मुस्लिम या इस्लाम या अन्य किसी भी धर्म के प्रति तनिक भी पूर्वाग्रही या दुराग्रही नहीं हूं। मैं पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष, मानवतावादी एवं इंसाफ पसन्द व्यक्ति हूं। सारी दुनिया जानती है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर खडा है। जब तक भारत में यह संविधान लागू है, इस देश में किसी को भी संविधान से खिलवाड करने का हक नहीं है। बल्कि संविधान का पालन करना हर व्यक्ति का संवैधानिक एवं कानूनी दायित्व है। इस देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को धर्मनिरपेक्षता को मानना और लागू करना ही होगा, जिसका तात्पर्य है कि-किसी भी धर्म के साथ सरकार, जन प्रतिनिधियों और लोक सेवकों को किसी भी प्रकार का कोई सरोकार नहीं होना चाहिये। यहाँ तक कि हज के लिये सब्सीडी तो दी ही नहीं जानी चाहिये, लेकिन साथ ही साथ किसी भी सरकारी इमारत की आधारशिला रखते समय गणेश पूजा या नारियल तोडने का कार्य भी इनके द्वारा नहीं करना चाहिये। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और लोक सेवक की कुर्सी संभालते समय मन्त्रोचार या कुरआन की आयतों या बाईबल का पठन भी नहीं किया जाना चाहिये, जैसा कि वसुन्धरा राजे एवं उमा भारती ने मुख्यमन्त्री पद संभालते समय किया था। इन दोनों राजनेत्रियों ने मुख्यमन्त्रियों के रूप में संविधान के पालन और सुरक्षा की शपथ ग्रहण करते ही संविधान की धज्जियाँ उडाते हुए हिन्दू धर्म के कथित सन्तों के चरणों में वन्दना करके संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को तहस नहस कर दिया।

इस देश में केवल हिन्दू-मुसलमान ही नहीं, बल्कि सभी दिशाओं में असंवैधानिक काम चल रहे हैं। यही नहीं सरकारी कार्यालयों में कार्यालयीन समय में गणेश, शिवजी, हनुमानजी, दुर्गा आदि की मूर्तियाँ या चित्र स्थापित हैं, जिनकी लोक सेवकों द्वारा वाकायदा प्रतिदिन पूजा की जाती है और प्रसाद भी वितरित किया जाता है। सबसे दुःखद तो यह है कि गणेश, शिवजी, हनुमानजी, दुर्गा के आदर्शों या जीवन से प्रेरणा लेकर जनता की या देश की सेवा करने वाला इनमें एक भी लोक सेवक नहीं हैं। सबके सब अपने कुकर्मों से मुक्ति पाने के लिये प्रतिदिन पूजा-आरती का नाटक करते हैं। जिसके लिये मुनवादी व्यवस्था जिम्मेदार है, जो पाप करे, पाप से प्रायश्चित करने के पूजा-आरती रूपी समाधान सुझाती रही है। यह सब असंवैधानिक और गैर कानूनी तो है ही, साथ ही साथ लोक सेवक के रूप में पद ग्रहण करने से पूर्व ली जाने वाली शपथ का भी खुलेआम उल्लंघन है। जबकि एक भी सरकारी कार्यालय में मक्का-मदीना, प्रभु यीशू, बुद्ध या महावीर का चित्र नहीं मिलेगा! केवल ब्राह्मणवादी एवं मुनवादी धर्म को ही हिन्दू धर्म का दर्जा दिया गया है, जबकि गहराई में जाकर देखें तो इस देश में ब्राह्मणों सहित आर्य उद्‌गत वाली कोई भी नस्ल हिन्दू है ही नहीं, लेकिन इन्हीं के द्वारा कथित हिन्दू धर्म पर जबरिया कब्जा किया हुआ है। दूसरी ओर इस देश की निकम्मी जनता जागकर भी सोई हुई है। अतः यह सब कुछ गैर-कानूनी और असंवैधानिक दुष्कृत्य हजारों वर्षों से चलता आ रहा है और आगे भी लगातार चलता ही रहेगा। लोगों को अपने साथ होने वाले अत्याचार, व्यभिचार, शोषण, जातिगत, वर्गगत और बौद्धिक व्यभिचार तक की तो परवाह नहीं है। ऐसे में वे उस हिन्दू धर्म की क्या परवाह करेंगे, जिसका उल्लेख किसी भी प्रमाणिक धार्मिक ग्रंथ (चारों वेदों) में तक नहीं किया गया है।

इसके अलावा यह भी स्पष्ट करना कहना चाहँूगा कि कथित हिन्दू धर्म के प्रवर्तक एवं संरक्षकों द्वारा 20 प्रतिशत हिन्दुओं को मन्दिरों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जाता है। मन्दिरों में प्रवेश करने से मुसलमान नहीं रोकते, बल्कि ब्राह्मण एवं मनुवादी मानसिकता का अन्धानुकरण करने वाले हिन्दू ही रोकते हैं। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में आदिवासियों का शोषण मुसलमान नहीं करते, बल्कि मनुवादी हिन्दू ही करते हैं। ऐसे में हिन्दूवाद को बढावा देने वाले दलित-आदिवासियों से अपने पक्ष में खडे रहने की उम्मीद किस नैतिकता के आधार पर कर सकते हैं। अजा एवं अजजा की देश में करीब 30 प्रतिशत आबादी है, लेकिन इन वर्गों के हितों पर हमेशा कुठाराघात उच्चपदों पर आसीन सवर्ण हिन्दुओं द्वारा किया जाता है। यदि कोई भी व्यक्ति वास्तव में निष्पक्ष और न्यायप्रिय है तो यह जानकर आश्चर्य होना चाहिये कि हाई कोर्ट में सडसठ प्रतिशत पदों पर जजों की सीधी नियुक्ति की जाती है, लेकिन राजस्थान में आजादी के बाद से आज तक एक भी अजा एवं अजजा वर्ग में ऐसा व्यक्ति (वकील) नियुक्ति करने वाले सवर्ण हिन्दुओं को योग्य नहीं मिला, जिसे हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया जा सकता। ऐसे में हिन्दु एकता की बात करना एक पक्षीय उच्च वर्गीय हिन्दुओं की रुग्ण मानसिकता का अव्यवहारिक पैमाना है। जो कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता और इसीलिये ऐसे लोगों को इन घोर अपमानकारी, घृणित वेदनाओं को केवल सामाजिक बुराई कहकर नहीं छोड दिया जाना चाहिये, बल्कि इस प्रकार के लोगों को कठोर दण्ड से दण्डित किये जाने की भी जरूरत है।

अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्षता एवं आरक्षण का विरोध करने वालों से मेरा विनम्र आग्रह है कि वे इस देश और समाज का माहौल खराब नहीं करें तथा अपने पूर्वजों द्वारा किये गये वायदों का निर्वाह करके अपने नैतिक एवं संवैधानिक दायित्वों को पूर्ण करें।? इस देश में हिन्दू-मुसलमानों को आडवाणी की १९८० की रथयात्रा से पूर्व की भांति और आदिवासियों तथा दलितों को आर्यों के आगमन से पूर्व की भांति शान्ति से रहने देने के लिये सुहृदयतापूर्वक अवसर प्रदान करें, जिससे देश और समाज का विकास हो सके। देश में शान्ति कायम हो और देश का सम्मान बढे।

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136 Comments on "आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता एवं अल्पसंख्यकों का विरोध असंवैधानिक / डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’"

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sushil sharma
8 months 12 days ago

इस सदी के दूसरे दशक के शुरुआती दौर में हम ठगे से खड़े हैं …एक महास्वप्न का मध्यांतर है ….देश के संरक्षण के लिए किसी आरक्षण की जरूरत ही नहीं है यहाँ तो देश के भक्षण के लिए आराक्षण की मांग है ….आरक्षण का आशीर्वाद पा कर जैसे भष्मासुर शंकर के सिर पर हाथ रख कर उनको भष्म करने चल पडा हो ….क्रान्ति के लिए किसी आरक्षण की जरूरत नहीं होती …देश की आज़ादी के लिए जान देने को किसी आरक्षण की जरूरत नहीं होती …गांधी, भगत सिंह ,आज़ाद, आंबेडकर , लाजपत राय, जय प्रकाश नारायण, लोहिया आदि सभी का… Read more »

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Sajid .hashmi
1 year 9 months ago

Kal ek TV news chanel par ek show isi bindu par adharit dikhaya ja raha tha. Jismain shree baba saheb ko gandhi ji ka dhur virodhi bataya ja raha thaa, to main sirf yeh janna chahta hun agar kuch aisi batten joki itihas main ghatit hui bhi hain jisko ke saath (60)saal hu chuke hai, aaj use is tarah sarvajanik karke bharat ke logon main kya sandesh diya jaraha hai, jiska aaj ke samaj main bahut hi galat sandesh jaa sakta hai, Jahan aaj ka samaj Roti kapda aur makan ke liye duniya se lad raha hai, whin shayad kuch… Read more »

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Gaurav
3 years 4 months ago

Sanvidhan ek kavita ka nam hai jise log apane anusar rago me ya filmi dhuno me gungunate hai.

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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“EQUALITY of status and opportunity;” “स्थिति और अवसर की समानता;” ये शब्द संविधान की प्रस्तावना के हैं! प्रस्तावना संविधान का चेहरा है! क्या हम संविधान के चेहरे को विकृत करना चाहते हैं! यदि हाँ तो किसी भी फोरम पर चर्चा या प्रवक्ता पर कथित “स्वस्थ बहस” करने से कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ सकते! हाँ यदि हम संविधान का चेहरा सुन्दर और सार्थक बनाना चाहते हैं तो संविधान की भावनानुकूल देश के सभी लोगों को “अवसर की समनाता” प्रदान करके, सभी की स्थिति (स्टेटस) को समान बनाने के लिए कार्य करना होगा! आरक्षण इसी दिशा में एक छोटा सा… Read more »

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saurabh
3 years 8 months ago

आरक्षण दे दे के देश को निकम्मा बना दो | सारे प्रतिभाशील लोग विदेशों के लिए काम करेंगे तो इस देश का कल्याण कैसे होगा ?
समाज की भलाई करने की इत्ती ही इच्छा है तो आप गरीब स्टुडेंट के विकास के बारे में सोचिये उनको एक सपना दीजिये नाकि आरक्षण रूपी बैशाखी|

आप का लेख देख कर येही प्रतीत हुआ कि आप कुवे के मेढक वाली कहानी लिखते में उस्ताद हैं या फिर नेता गिरी में आप का कोई जवाब नहीं होगा |

धन्यवाद

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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मुझे लगता है कि आप जैसे लोगों के कारण ही वेब मीडिया को अविश्वसनीय और अभद्र मीडिया कहा जाता है!—

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narendrasingh
3 years 5 months ago

भारत के मूल संविधान की प्रस्तावना मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है, लेकिन विश्वसनीय संदर्भ के लिए अंग्रेजी प्रस्तावना ही दी जा रही है – WE THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens – JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thoughts, expression, faith and worship; EQUALITY of status and opportunity; and to promote among them FRATERNITY assuring the dignity of individual and the unity and integrity of the Nation. आरक्षण की व्यवस्था संविधान की मूल… Read more »

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Guest

आदरणीय श्री नरेन्द्र सिंह जी, आपने इस आलेख पर टिप्पणी की और संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करके अपनी बात कही है, इससे इस बात का प्रमाण मिलता है की आप तर्क और संविधान में विश्वास करते हैं! आपने दस वर्ष के आरक्षण का उल्लेख किया है! कितना अच्छा होता कि आप उस प्रावधान का भी उल्लेख कर देते, जिसमें और जहाँ दस वर्ष के आरक्षण का प्रावधान क्यों और किसलिए किया गया था! मैं साफ कर दूँ कि दस वर्ष का आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद में संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए किया गया था,… Read more »

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Guest

कृपया उक्त टिप्पणी के तीसरे पेरा की प्रथम पंक्ति को निम्न प्रकार से संशोधित करके पढ़ा जावे
मैं साफ कर दूँ कि दस वर्ष का आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 334 में संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए किया गया था,

इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest
3 years 8 months ago

बहुत शानदार लिखा है. आरक्षण तो अन्य्याय का मामूली पश्चाताप है उसको बराबरी आने से पहले खत्म नही किया जा सकता और गाँधी जी आलोचना से ऊपर नही हैं.

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