लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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(जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का अपहरण)

विपिन किशोर सिन्हा

काम्यकवन की छटा इन्द्र के नन्दनकानन से कम नहीं थी। हमने वनवास का अन्तिम चरण इस रमणीय वन में पूरा करने का निश्चय किया। महर्षि तॄणविन्दु ने पहले ही हमें अपने आश्रम में आकर निवास करने का निमन्त्रण दे रखा था। महर्षि धौम्य के नेतृत्व में एक शुभ मुहूर्त निकाल हम वहां पहुंचे। महर्षि तृणविन्दु के आश्रम में कुछ दिवस व्यतीत करने के उपरान्त, समीप ही हमने एक पर्णकुटी बनाई और सुखपूर्वक उसमें निवास करने लगे।

द्रौपदी काम्यकवन की सुन्दरता पर मुग्ध थी। चपल बालिका-सी पुष्प लताओं के बीच डोलती रहती, तितली की भांति इस पुष्प से उस पुष्प तक गुनगुनाती फिरती। उसको प्रसन्न देख मन को बड़ी प्रसन्नता और शान्ति मिलती। लेकिन हमलोगों की प्रसन्नता से नियति को कुछ चिढ़-सी थी।

उस दिन आखेट के लिए हम, अरण्य के गहन भाग की ओर चले गए थे। महर्षि धौम्य ने ब्राह्मणों के भोजन हेतु कुछ विशेष प्रकार के फल ले आने का निर्देश दिया था। आश्रम में महर्षि धौम्य और द्रौपदी नित्य के कामों में व्यस्त थे।

हमारी पर्णकुटी के समीप ही विस्तृत अरण्य-पथ था। सिन्धु देश का राजा जयद्रथ पूरे आडंबर के साथ बारात लेकर विवाह की इच्छा से शाल्व देश की ओर जा रहा था। आश्रम के पास से जाते हुए उसकी दृष्टि द्रौपदी पर पड़ी। वह उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया। घना वन, वन में पर्णकुटी, पर्णकुटी के द्वार पर खड़ी, एकाकी अनिन्द्य सुन्दरी। जयद्रथ के मतिभ्रम के लिए इतना पर्याप्त था। काम के वशीभूत वह कृष्णा के सम्मुख उपस्थित हुआ और अपना परिचय दिया। वह दुर्योधन की बहन दुःशीला का पति था। द्रौपदी उसे पहचानती थी। उसे यह भी ज्ञात था कि दुःशीला न सिर्फ कौरवों की अपितु हम पाण्डवों की भी लाडली थी। उसने स्नेहपूर्वक जयद्रथ का स्वागत किया। पाद-प्रक्षालन के लिए शीतल जल की व्यवस्था की। पूरी बारात के लिए अक्षय पात्र की सहायता से जलपान का प्रबन्ध किया। आतिथ्य सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी।

लेकिन दुष्ट जयद्रथ के मानसिक विकार को वह भांप नहीं पाई। अल्पाहार, विश्राम आदि से तृप्त होने के बाद, जब जयद्रथ ने प्रणय निवेदन किया तो उसका हृदय भय से कांप उठा, भृकुटि रोष से तन गई। दुर्योधन तो नीच था ही, उसके संबन्धी भी इतने निकृष्ट होंगे, उसने कल्पना तक नहीं की थी। दो पग पीछे हटकर, जयद्रथ का तिरस्कार करते हुए उसे धिक्कारा –

“मुझसे भूल हुई, जो ननदोई समझ तुम्हारा स्वागत किया। अतिथि देवता समान होता है। मैंने धर्मानुकूल आचरण किया। अधर्मी कामुक! तूने एक पतिव्रता स्त्री से प्रणय-निवेदन कर धर्म का अपमान किया है। नीच पापी! मेरे पतियों के लौटने के पूर्व काम्यकवन की सीमा से दूर चला जा, अन्यथा शाल्व-कन्या या कृष्णा नहीं, वरन् स्वयं मृत्यु तुम्हारा वरण करेगी।”

पर जड़ बुद्धि में चेतना कहां? विनाश उपस्थित होने पर, वैसे ही बुद्धि विपरीत आचरण करती है। काम, क्रोध, मद और लोभ – इनमें से एक ही दुर्गुण, मनुष्य को पतन की खाई में ले जाने के लिए पर्याप्त है। जयद्रथ के सिर पर तो चारो एक साथ सवार थे। उसने बलपूर्वक द्रौपदी का अपहरण कर लिया।

कुछ ही समय पश्चात हम सभी पर्णकुटी में लौटे। दासी ने रोते हुए पूरी घटना का विवरण सुनाया। पवन वेग से हमलोगों ने जयद्रथ का पीछा किया। उसके रथचक्रों के चिह्न ने हम सबका मार्ग-दर्शन किया। कुछ ही दूर जाने के उपरान्त जयद्रथ की सेना दिखाई पड़ी। हमने प्रबल बाण-वर्षा करके चारों ओर से मार्ग अवरुद्ध कर दिया। सर्वत्र अंधेरा छा गया। भीमसेन की क्रोधाग्नि में उसका मुख्य सेनानायक आहुति बना, त्रिगर्त नरेश, युधिष्ठिर का कोपभाजन बन मृत्यु को प्राप्त हुआ। मैंने नकुल, सहदेव की सहायता से पूरी सेना का संहार कर दिया। जयद्रथ भय के मारे सूखे पत्ते की भांति कांप रहा था। द्रौपदी को रथ से उतार, प्राण रक्षा हेतु, द्रूत गति से वन की ओर भागा। द्रौपदी मूर्च्छित थी। जल की शीतल बून्दों से उसका उपचार किया गया। शीघ्र ही चेतना लौट आई। भीमसेन ने आश्वासन दिया –

“डरो नहीं पांचाली, तुम हमलोगों के बीच में हो। तुम पूर्णतया सुरक्षित हो। पापात्मा जयद्रथ पीठ दिखाकर भाग गया। हमने उसके सहयोगियों और संपूर्ण सेना का संहार कर दिया है।”

“मेरा अपहरण करने के बाद भी वह कुटिल नीच अभी तक जीवित है? उसे आपलोगों ने बचकर भागने का अवसर क्यों दिया? मुझे उसकी मृत्यु से कम कुछ भी स्वीकार नहीं। लेकिन मैं उसका शव भी नहीं देखना चाहती। उसकी कलुषित देह अरण्य में शृगालों के बीच फेंक दी जाय।”

अत्यन्त क्रोध में द्रौपदी ने अपना मन्तव्य प्रकट किया और पुनः मूर्च्छित हो गई।

महर्षि धौम्य, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव को द्रौपदी के उपचार के लिए छोड़, भीमसेन और मैं, जयद्रथ की खोज में निकल पड़े। युधिष्ठिर ने मृदु स्वर में भीमसेन से आग्रह किया –

“महाबाहु भीम! यद्यपि सिन्धुराज जयद्रथ ने अक्षम्य अपराध किया है, तो भी बहन दुःशीला के वैधव्य का कारण बनने से बचना। जयद्रथ का वध मत करना।”

जय्द्रथ हमसे दो योजन आगे निकल गया था। मैंने अभिमन्त्रित शस्त्रों की सहायता से उसके अश्वों को मार डाला। अब वह रथ से उतर, पैदल ही वन में भागने लगा लेकिन भीमसेन से वह कबतक बचता? उन्होंने वेगपूर्वक दौड़कर उसकी चोटी पकड़ ली, दोनों घुटनों के बल बैठ, उसकी छाती पर चढ़ गए और मुष्टिका प्रहार आरंभ कर दिया। चार-पांच प्रहारों के बाद ही वह अचेत हो गया। भीम का क्रोध शान्त नहीं हो रहा था। वे उसके वध पर उतारू थे। मैंने उन्हें रोका –

“महाबली! धर्मराज की आज्ञा और बहन दुःशीला के वैधव्य पर तनिक चिन्तन तो कर लें। कृपया अब प्रहार रोक दें। अन्यथा यह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।”

भीमसेन के हाथ तो रुक गए लेकिन दांत पीसते हुए मुझसे बोले –

“इस नीच पापी ने द्रौपदी को कष्ट पहुंचाया है, अतः मेरे हाथों वध के लिए सर्वथा योग्य है। लेकिन क्या करूं? युधिष्ठिर सदा ही दयालू बने रहते हैं। और तुम भी उनकी हां में हां मिलाकर, मेरे कार्यों में बाधा पहुंचाया करते हो। अब मैं इसका वध तो नहीं करूंगा लेकिन दंड अवश्य दूंगा।”

उन्होंने एक अर्धचन्द्राकार बाण की सहायता से, जयद्रथ के लांबे-लंबे बालों को मूंड़कर. पांच चोटियां रख दी। कटु स्वर में तिरस्कार करते हुए आदेश दिया –

“मूढ़मति! यदि तू जीवित रहना चाहता है तो मेरी बात सुन। कान पकड़कर यह प्रतिज्ञा कर कि किसी भी राजसभा में अपना परिचय देते हुए स्वयं को दास बताएगा। यदि मेरी शर्त तुम्हें स्वीकार हो, तब तो ठीक, अन्यथा मृत्यु के लिए स्वयं को तैयार कर।”

जयद्रथ ने वह सब स्वीकार किया जो भीम ने कहा। मरता क्या न करता! वह धूल में लथपथ और अचेतप्राय हो गया था। भीम का मुष्टिका-प्रहार हिडिम्ब, बकासुर और किर्मीर भी नहीं सह पाए थे, तो जयद्रथ किस खेत की मूली था? मैंने और भीमसेन ने उसे रज्जु से बांधा और गट्ठर की भांति रथ में डाल दिया। पर्णकुटी पहुंच दंड देने के लिए उसे महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख प्रस्तुत किया। धर्मराज युधिष्ठिर भी उसे देख अपनी हंसी रोक नहीं पाए, बोले –

“तुम लोगों ने पहले ही इसकी दुर्गत कर रखी है। इसे पर्याप्त दंड मिल चुका है। अब इसे मुक्त कर दो।”

“नहीं महाराज, तनिक धैर्य रखिए। यह अधम द्रौपदी का अपराधी है। यद्यपि इसने हमारा दासत्व स्वीकार कर लिया है, फिर भी इसके भविष्य का निर्णय पांचाली ही करेगी।” भीम ने उत्तर दिया।

“शास्त्र में निर्देशित है कि परस्त्री हरण करने वाला या परराज्य हरण करने वाला, शरण में आए तो भी उसे जीवित छोड़ना अनुचित होता है। वह समाज का प्रधान शत्रु होता है। इस तरह यह नीच जयद्रथ मृत्युदंड का अधिकारी है। लेकिन महाराज युधिष्ठिर ने जब इसे क्षमादान दे दिया है तो इसे मुक्त कर देना ही उचित होगा।” द्रौपदी ने अपना मत प्रकट किया।

भीमसेन ने जयद्रथ से सबके पांव पकड़वाए, साष्टांग प्रणिपात करवाया और क्षमा मंगवाई। प्राणों के भय से उसने सब किया। सिन्धुराज आए थे, वर-वेश में और जा रहे थे, घुटे सिर, एक वस्त्र धारण कर। जाते-जाते उसने द्रौपदी का चरण-स्पर्श कर क्षमायाचना का प्रयास किया। घृणा से मुंह फेर कृष्णा ने धिक्कारा –

“विवेकहीन कामुक पुरुष का स्पर्श तो दूर, छाया तक देखना सती नारी के लिए अनुचित है। मेरे पांवों की धूल भी स्पर्श करने के योग्य नहीं हो तुम। अविलंब हम सबकी दृष्टि से ओझल हो जाओ।”

लज्जित, पराजित, भग्नमनोरथ, अर्धनग्न जयद्रथ चला गया। उसका मन अशान्त था। अपने राज्य वापस लौटने के बदले वह हरिद्वार पहुंचा। भगवान शंकर की घोर तपस्या की, उन्हें प्रसन्न किया और मात्र एक दिन के लिए, मुझे छोड़, शेष पाण्डवों को युद्ध में पीछे हटाने का वर प्राप्त किया।

क्रमशः

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