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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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stamp3इसे संयोग ही कहिए कि इधर पिछड़े इलाके के बाशिंदे कुम्हार गंगे का एकमात्र गधा गुजरा और उधर देश में लोक सभा के आम चुनाव सिर पर आए। गंगे कुम्हार को गधे के जाने का इतना दु:ख नहीं था जितना दु:ख इस बात का था कि अब वह अपने इलाके में चुनाव प्रचार के लिए आने वाले हर नेता को किसकी पीठ पर उठा कर आस पास के गांव में ले जाएगा। गंगे कुम्हार को इतनी इनकम घड़े बेचकर नहीं थी जितनी गधे पर नेताओं को ढो कर हो रही थी। ऊपर से इलाके में दबदबा अलग का। चुनाव के दिनों में वोटर तो नेता को अपनी पीठ पर बैठाने से रहे। यही दिन तो होते हैं उनके नेता की पीठ पर शान से बैठने के, चुनाव के बाद तो नेता ही जनता की पीठ पर बैठता है। अगर वह न बैठना चाहे तो भी जनता उसे अपनी पीठ की सवारी करवा कर ही रहती है। जिसकी पीठ पर नेता ने अपनी पिछवाड़ी धर दी समझो उसका अगले चुनाव तक का जीवन सफल हुआ।असल में गधा जबसे बोझ उठाने लायक हुआ था वह कुम्हार के घड़े कम, नेताओं को ज्यादा उठा रहा था। कभी किसी का चुनाव तो कभी किसी का चुनाव, हर महीने किसी न किसी का चुनाव चला ही रहता। घड़े उठाकर गधे की पीठ इतनी नहीं झुकी थी जितनी नेताओं को उठाकर उसकी पीठ झुकी थी। नेताओं को उठा उठा कर गधे की पीठ जितनी झुक रही थी गंगे कुम्हार की रीढ़ की हडडी पूरे इलाके में उतनी ही सीधी हो रही थी।

ऐन मौके पर धोखा दे गए गधे के शव को गंगे कुम्हार ने दो लात जड़े और गहन चिंतन में डूब गया। इतनी सोच में तो वे भी नहीं डूबे थे जो चुनाव में खडे हो रहे थे। जैसे ही अड़ोस-पड़ोस में गंगे के गधे के मरने की सूचना लोगों को मिली तो वे औपचारिकतावश उसके घर गधे के मरने के सुअवसर पर शोक प्रगट करने आने के बहाने उस पर हंसने आने लगे। तब गंगे कुम्हार को लगा ज्यों उसका गधा नहीं, वह मर गया हो। एक बात बताइए तो भाई साहब! इन दिनों हम गधों पर इतने अधिक निर्भर क्यों हो गए हैं?

ज्यों ही राजनीति के फसली बटेरों को पता चला कि गंगे कुम्हार का गधा स्वर्ग सिधार गया है तो एक पार्टी वालों ने तहसील के पी डब्लू डी के रेस्ट हाउस में गधे की आत्मा की शांति के लिए एक शोक सभा का आयोजन किया, गधे की आत्मा की शांति के लिए उन नेताओं ने पूरी ईमानदारी के साथ दो मिनट का मौन रखा, प्रेस नोट जारी किया, जिसमें कहा गया, ‘गधे की असामयिक मृत्यु से गंगे कुम्हार का ही नहीं, गधे समुदाय का ही नहीं, पूरे देश का कभी न भरने वाला नुकसान हुआ है। देश में गधे की कमी हर वक्त खलती रहेगी। देश में जब जब चुनाव आएंगे, ये गधा तब तब बहुत याद आएगा।

ज्यों ही राजनीति के फसली बटेरों को पता चला कि गंगे कुम्हार का गधा स्वर्ग सिधार गया है तो एक पार्टी वालों ने तहसील के पी डब्लू डी के रेस्ट हाउस में गधे की आत्मा की शांति के लिए एक शोक सभा का आयोजन किया, गधे की आत्मा की शांति के लिए उन नेताओं ने पूरी ईमानदारी के साथ दो मिनट का मौन रखा, प्रेस नोट जारी किया, जिसमें कहा गया, ‘गधे की असामयिक मृत्यु से गंगे कुम्हार का ही नहीं, गधे समुदाय का ही नहीं, पूरे देश का कभी न भरने वाला नुकसान हुआ है। देश में गधे की कमी हर वक्त खलती रहेगी। देश में जब जब चुनाव आएंगे, ये गधा तब तब बहुत याद आएगा। भगवान से पार्टी के तहसील स्तर के प्रधान ये भी मांग करते हैं कि भगवान उसकी आत्मा को शांति तो प्रदान करे पर उसे मोक्ष न दे। क्योंकि देश को गधों की बहुत जरुरत है। गंगे कुम्हार को गधे के क्रिया कर्म के लिए फौरी तौर पर पार्टी, पार्टी फंड से दस हजार रुपये देने की सहर्ष घोषणा करती है ताकि गधे के क्रिया कर्म में किसी भी तरह की कमी न आए।’

चुनाव का वक्त तो था ही, ज्यों ही सत्ता पार्टी वालों को गंगे कुम्हार के गधे की मौत का पता चला तो उन्होंने भी आनन-फानन में आस-पास के कस्बों में जाने का कार्यक्रम छोड़ गधे की शोक सभा को प्राथमिकता देते हुए जिला मुख्यालय के जिलाधीश सभागार में गधे की आत्मा की शांति के लिए विशाल शोक सभा का आयोजन किया जिसमें सभी आला अफसरों का आना अनिवार्य हुआ।

निश्चित समय से आध घंटे बाद जिलाधीश सभागार में जिला भर के गणमान्य नेता सरकारी अमले के साथ उपस्थित हुए। सामने टेबल पर सफेद कपड़ा बिछा था। उस पर शीशे की फ्रेम में गधे का स्केच था। एक नामी पार्टी के आर्टिस्ट का बनाया हुआ। उसके पास ही ताजे फूलों की टोकरी रखी थी। टोकरी में रखे फूल अपनी बदनसीबी पर रो रहे थे। पर मजे की बात, वह स्केच सभी से मेल खा रहा था और सभी को देख मुस्कुरा रहा था। गधे के स्केच के आगे अगर बत्तियां जल रही थीं। सैंकड़ों लोगों ने मरे गधे के स्केच के आगे सिर नीचा किए पांच मिनट का मौन रखा। पार्टी के जिला प्रमुख तो उस वक्त इतने भावुक हो उठे थे कि उनकी गर्दन तो पार्टी वर्करों को मौन के दस मिनट बाद भी खुद ही उठानी पड़ी। उस वक्त उनकी आंखों में आंसू देखने लायक थे। जिलाधीश ने अपनी जेब से अपना रूमाल निकाल कर उन्हें दिया तो उन्होंने अपने आंसू उसमें पोंछे और रूमाल एसपी महोदय को पकड़ा दिया।

शोक सभा के एकदम बाद एसडीएम महोदय को आदेश हुआ कि वे सारे काम छोड़ सरकार का सांत्वना संदेश लेकर गंगे कुम्हार के घर जाएं और उससे कहें कि दु:ख की इस घड़ी में वह अकेला नहीं, सरकार उसके साथ है।

यह सब देख चार दिनों से अपने शव के पास रूकी गधे की आत्मा मुस्कराते हुए वोट तंत्र जिंदाबाद! वोट तंत्र जिंदाबाद!!! के नारे लगाती इस देश से पाकिस्तान की ओर कूच कर गई।

-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

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1 Comment on "व्यंग्य/गधा न होने का मलाल!!"

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संगीता पुरी
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सुंदर विश्‍लेषणात्‍मक आलेख के लिए धन्‍यवाद।

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