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ओ. पी. उनियाल

मित्रता एवं सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक मजार एवं गुरुध्दारा। जिनका धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व अपने आप में एक उदाहरण हैं। दर्शनार्थी टेकते हैं मत्था और मांगते हैं मन्नतें इन दोनों स्थलों पर। दोस्ती की सालों पुरानी परंपरा को आज भी निभा रहे हैं श्रध्दालु।

एक तरफ उत्तराखंड की सीमा तो दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश की सीमा। दोनों सीमाओं को विभाजित करती यमुना नदी। उत्तराखंड की सीमा कुल्हाल (देहरादून) से सटी शिवालिक पर्वतमाला की एक छोटी हरी-भरी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। पीर बाबा भूरेशाह की मजार। यमुना पार ठीक सामने हिमाचल प्रदेश की सीमा पार स्थित है पांवटा साहिब नगर। सिक्खों का प्रसिध्द तीर्थस्थल। इस नगर को गुरु गोविंद सिंह ने ही बसाया था। यहीं पर उनके ध्दारा गुरुद्वारा हरिमंदिर साहिब स्थापित किया गया था।

देहरादून शहर से पश्चिम की ओर स्थित इन स्थलों की दूरी लगभग 48 कि.मी. है। इन स्थलों के दर्शनार्थ जब श्रध्दालु पहुंचते हैं तो स्वतः हीं आत्मिक शांति जागृत होने लगती है। साथ ही पवित्र-पावनी, शांति भाव से बहती मां यमुना के दर्शन से तो मन श्रध्दा और आस्था के भव से भर जाता है।

मजार तक पहुंचने के लिए कुल्हाल से पहाड़ी पर बनी सीढ़ियों से जाना होता है। टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता खतरनाक भी है। बरसात में पहाड़ी पर कहीं-कहीं भू-स्खलन भी होता है। मगर पीर बाबा का आशीर्वाद सदैव श्रध्दालुओं को सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसी मान्यता है। यमुना के दूसरे छोर पर स्थित पांवटा साहिब गुरुध्दारे का अलग ही आकर्षण है। कानों में पड़ने वाली मधुर गुरुवाणी, शबद-कीर्तन तो मन की शुध्दि कर अध्यात्म की धारा का संचरण करते हैं। रात्रि को टिमटिमाती रोशनी में तो इस स्थल की छटा देखते ही बनती है।

इतिहास के अनुसार गुरु गोविंद सिंह जी और पीर बाबा शुरेशाह में घनिष्ठ मित्रता थी। जिसके गवाह ये दोनों स्थल हैं। इसी मित्रता की परंपरा का निर्वहन श्रध्दालु अपनी अगाध श्रध्दा के माध्यम से करते हैं। गुरुध्दारे में आने वाले दर्शनार्थी पीर बाबा शुरेशाह की मजार पर भी जाकर शीश झुकाते हैं। गुरुद्वारा में भी बाबा का स्मरण गुरुवाणी में किया जाता है। एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान की भावना से ओत-प्रोत हैं ये स्थल।

उत्तराखंड एवं हिमाचल की सीमा को जोड़ता है। यमुना पुल, जिस पर गुजरते हुए दोनों स्थलों के दर्शन हो जाते हैं। पुल से बड़ा ही नयनाधिराम दृश्य दिखता है दोनों तरफ।

पीर बाबा शुरेशाह की मजार की देख-रेख व विकास यहां के ग्रामीणों द्वारा हीं किया जाता है। उसके आयोजन पर खूब चहल-पहल देखने को मिलता है। वीरवार को भी खासी भीड़ रहती है। उत्तराखंड सरकार इस स्थल के विकास की तरफ ध्यान दे तो पर्यटन मानचित्र पर जल्द ही अपना स्थान बना सकता है।

* लेखक पत्रकार हैं।

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