हिंदी का एक उपेक्षित क्षेत्र

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डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री हिंदी इस समय एक विचित्र दौर से गुज़र रही है। अनेक शताब्दियों से जो इस देश में अखिल भारतीय संपर्क भाषा थी, और इसीलिए संविधान सभा ने जिसे राजभाषा बनाने  का निश्चय सर्वसम्मति से किया, उसे उस पद पर प्रतिष्ठित करना तो दूर, “ आधुनिक शिक्षित “ लोगों ने अखिल भारतीय संपर्क… Read more »

राजनीतिक स्वार्थ की शिकार हमारी भाषाएँ

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हिंदी पर स्वार्थ का हथोड़ा…..! दुनिया में एकमात्र स्वाधीन भारत राष्ट्र-राज्य है,  जहाँ पर सत्तर साल बीत जाने पर भी  राजनीति का इतना अधिक पराभव हुआ है कि इसकी अपनी राष्ट्रभाषा तक घोषित  नहीं हो सकी है। इतिहास गवाह रहेगा कि राजनैतिक स्वार्थ ने भारत को जोड़ने वाली, उसकी एकता की वाहक, जन-जन के ह्रदय… Read more »

हिंदी का स्वाभिमान बचाने समाचार-पत्रों का शुभ संकल्प

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ह सर्वविधित है कि हिंदी के समाचार माध्यमों में अंग्रेजी शब्दों का बढ़ता प्रयोग भारतीय मानस के लिए चिंता का विषय बन गया है। विशेषकर, हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का चलन अधिक गंभीर समस्या है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी समाचार पत्रों की भाषा से नवयुवक अपनी भाषा सुधारते थे। समाचार पत्र सूचना और अध्ययन सामग्री देने के साथ-साथ समाज को भाषा का संस्कार भी देते थे।

महज़ औपचारिकता मत निभाओ… रोज हिंदी दिवस मनाओ !!!

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इंदु सिंह “इन्दुश्री’ ●●●——————————– भाषा नहीं ‘माँ’ हैं हम सबकी ‘हिंदी’ तो पहचान हैं हम सबकी ‘देवनागरी’ से बनी शान हम सबकी वर्णमाला ऐसी कि रगों में बस जाये हमारी तभी तो वो आन हैं हम सबकी ॥ ————————————●●● ‘हिंदी’ हैं हम वतन हैं… हिंदुस्तान हमारा… सिर्फ़ शब्द नहीं हमारी मातृभूमि का जयघोष हैं… जो… Read more »

हिंदी दुनिया की जरूरत है

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भाषा के बारे में कहा जाता है कि वह स्व प्रवाहित होती है, आप चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते । विश्व में कोई नहीं जिसका कार्य भाषा बिना चलता हो । मनुष्य की बात एक बार को छोड़ भी दीजिए तो पशु, पक्षी, कीट और पतंग भी अपने स्तर पर किसी… Read more »

संस्कृत की तरह प्रतीकात्मक होती हिंदी

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14 सितंबर 2016 हिंदी दिवस पर विशेष हिंदी शब्द है हमारी आवाज का हमारे बोलने का जो की हिन्दुस्तान मैं बोली जाती है। आज देश में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं उन सबकी जननी हिंदी है। और हिंदी को जन्म देने वाली भाषा का नाम संस्कृत है। जो की आज देश में सिर्फ प्रतीकात्मक रूप… Read more »

अब लडाई अंग्रेजी को हटाने की नहीं हिंदी को बचाने की है

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युवा ही लाएंगे हिंदी समय ! संजय द्विवेदी सरकारों के भरोसे हिंदी का विकास और विस्तार सोचने वालों को अब मान लेना चाहिए कि राजनीति और सत्ता से हिंदी का भला नहीं हो सकता। हिंदी एक ऐसी सूली पर चढ़ा दी गयी है, जहां उसे रहना तो अंग्रेजी की अनुगामी ही है। आत्मदैन्य से घिरा… Read more »

झिझक मिटे तो हिंदी बढ़े …!!

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तारकेश कुमार ओझा एक बार मुझे एक ऐसे समारोह में जाना पड़ा, जहां जाने से मैं यह सोच कर कतरा रहा था कि वहां अंग्रेजी का बोलबाला होगा। सामान्यतः ऐसे माहौल में मैं सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। लेकिन मन मार कर वहां पहुंचने पर मुझे अप्रत्याशित खुशी और सुखद आश्चर्य हुआ। क्योंकि ज्यादातर वक्ता… Read more »

उनकी नजर में शायद हिंदी शासितों की भाषा है,और अंग्रेजी शासकों की भाषा है।

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श्रीराम तिवारी वेशक दुनिया के अधिकांस प्राच्य भाषा विशारद ,व्याकरणवेत्ता ,अध्यात्म -दर्शन के अध्येता और भाषा रिसर्च- स्कालर समवेत स्वर में उत्तर वैदिक संस्कृत वांग्मय के ही मुरीद रहे हैं। जिसका वैचारिक चरमोत्कर्ष उस वेदांत दर्शन में झलकता है,जिसके प्रतिवाद स्वरूप अनेक ‘अवैदिक’ भारतीय दर्शनों का यहाँ निरंतर उदभव होता रहा है। जिसका भाषाई चरमोत्कर्ष… Read more »

हिंदी का अलख कैसे जगाएं ?

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हम अपनी मातृभाषा बोलने में ठीक वैसे ही शर्माते हैं जैसे कि एक मजदूर औरत के खून पसीने कि कमाई से पढ़ लिखकर बाबू बना बेटा अपनी उसी मजदूर माँ को, माँ कहते हुए शर्माता है ।हिंदी उस रानी की तरह है जिसे बाहर के राष्ट्र अपनी पटरानी बनाना चाहते हैं और उसका अपना राज्य… Read more »