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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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girl -सोम पाटीदार-
संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा – सभी लड़कों और लड़कियों का स्कूलों में नामांकन एवं नियमित स्कूल जाना प्राप्त करना है लेकिन तमाम प्रयासों के बावजुद यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है। खासकर उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया इस लक्ष्य से काफी दूर हैं। संयुक्त राष्ट्र के आकड़ों की मानें तो दक्षिण एशिया के तीन सबसे बड़े देश भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में दो करोड़ बीस लाख से अधिक प्राथमिक स्कुल जाने वाली उम्र के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।
बीते दशक में किए गए विधायी सुधार और शिक्षा को लेकर आई जागृति से स्कूलों में नामांकन में काफी सुधार आया है लेकिन स्कूल में नामांकन होने और स्कूल जाने में काफी अंतर है। अब बच्चों को नियमित तौर पर स्कूल में लाने एवं रोकने के लिए मिड-डे मील, लड़कियों को साइकिल वितरण, छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं कि अहम भूमिका है। भारत ने इन योजनाओं के माध्यम से बच्चों को स्कूलों की तरफ खींचने में कुछ हद तक सफलता पाई है।
अभी भी भारत में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। वहीं बांग्लादेश में यह प्रतिशत 45 एवं पाकिस्तान में 55 है। इन आकड़ों के आधार पर यह आसानी से समझा जा सकता है कि लगभग आधे दक्षिण एशियाई बच्चे प्राथमिक स्तर तक ही पढ़े होते और इन बच्चों में लड़कियों का प्रतिशत ज्यादा है।
दक्षिण एशिया में लड़कियों की शिक्षा की स्थिति और भी खराब हैं। इन देशों में एक तरफ शिक्षा के लिए आधारभूत संरचना के अभाव, जैसे सरकारी स्कूलों की कम संख्या, गांवों से स्कूलों की दूरी, स्कूलों में शौचालय और पानी की व्यवस्था न होना समस्या है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में तालिबानी खोफ, बांग्लादेश में बाल विवाह और भारत में स्कूली छात्राओं के बढ़ते यौन शोषण के मामले लड़कियों की शिक्षा में रूकावट पैदा कर रहे हैं।
पाकिस्तान कि 16 वर्षीय छात्रा मलाला युसुफ जई ने तालिबान कि परवाह न करते हुए बालिका शिक्षा के लिए कार्य किया जिसके लिए तालिबानी लड़ाकों ने उन पर जानलेवा हमला भी किया। इस साहस के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित भी किया गया और वे दुनिया भर की उन मलालाओं के लिए काम कर रही, जिन्हें शिक्षा पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
अगर बालिका शिक्षा की उपयोगिता की बात की जाये तो हम लड़कियों को शिक्षित किये बिना देश का सही मायने में विकास नहीं कर सकते हैं। लड़कियों को शिक्षित करने से न सिर्फ एक परिवार का विकास होता है बल्कि समाज भी लाभान्वित होता है। महिला शिक्षा का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि एक शिक्षित मां से जन्मी बालिका के पांच वर्ष से अधिक जीवित रहने की 50 प्रतिशत संभावनाए ज्यादा होती हैं।
वहीं, बालिका शिक्षा बाल विवाह जैसी समस्या से समाज को बचा सकती है। पिछले साल 1 .4 करोड़ बाल विवाह हुए, जो प्रतिदिन 38,000 होता है। यानी प्रति 26 मिनट में एक बाल विवाह। एक आंकड़े के अनुसार आठ साल तक स्कूल जाने से एक लड़की के बाल विवाह कि संभावनाएं चार गुना से भी कम हो जाती है। लड़कियों के शिक्षित होने से न केवल जन्म दर में गिरावट, शिशु के स्वास्थ एवं पोषण में सुधार, घरेलु कमाई में बढ़ोतरी होती है बल्कि घरेलु हिंसा एवं यौन प्रताड़ना में कमी दर्ज संभव है।
अमेरिका, यूरोप, जापान और चीन के विकसित होने में सफल हुए है, क्योंकि इन देशों में शिक्षा में लिंग भेदभाव कभी नहीं रहा। वही दक्षिण एशिया कि स्थिति बिल्कुल विपरीत रही है और अभी भी क्रांतिकारी प्रयासों कि आवश्यकता है।

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