लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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North_South_Transport_Corridor_(NSTC)डा. राधेश्याम द्विवेदी
सोवियत संघ का विखंडन:- भारत की आजादी के बाद से ही भारत और रूस के सम्बन्ध बहुत अच्छे रहे हैं। शीत युद्ध के समय भारत और सोवियत संघ में मजबूत रणनीतिक, सैनिक, आर्थिक, एवं राजनयिक सम्बन्ध रहे हैं।1991 में सोवियत संघ के विखंडन के बाद रूस उसका उत्तराधिकारी बना जो आर्थिक दृष्टि से काफी कमजोर था। शीतयुद्ध की समाप्ति हो चुकी थी और अब पूरे विश्व में दो देशों के बीच संबंधों का मुख्य आधार आर्थिक हो चुका था। 1991 से ही भारत ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करते हुए अमेरिका, पश्चिमी यूरोप के देशों, जापान एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की तरफ भी अपना रुख किया। हालांकि इस काल के दौरान भी भारत-रूस के मध्य संबंध काफी मधुर बने रहे, विशेष कर रक्षा क्षेत्र में।सोवियत संघ के विघटन के बाद भी दोनों के सम्बन्ध पूर्ववत बने रहे। रूस के प्रधानमंत्री व्लादीमिर पुतिन ने 11 मार्च, 2010 को एक दिन की भारत यात्रा की। भारत की स्वतंत्रता के समय से ही दोनों देशों के संबंध अत्यंत मधुर रहे हैं, हालांकि सोवियत संघ के विखंडन के बाद से दोनों देशों ने एक बार फिर से अपने रिश्तों को पुनब्र्याख्यायित किया है। पुतिन के दौरे के दौरान भारत व रूस ने व्यापक परमाणु समझौते सहित कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये।
भारत-रूस : प्रमुख समझौते
1.नागरिक परमाणु समझौता:- पुतिन की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए। नागरिक परमाणु के क्षेत्र में तीन समझौते किए गए। इसके तहत रूस तमिलनाडु के कुडनकुलम में और पश्चिम बंगाल के हरीपुर में छह-छह परमाणु प्लांट लगाएगा। भारत के साथ इस समझौते के साथ ही रूस ने इस मामले में अपने अन्य परमाणु सम्पन्न प्रतिद्वंद्वियों, अमेरिका और फ्रांस को पीछे छोड़ दिया। लंबे समय से नागरिक परमाणु ऊर्जा के मामले में रूस, भारत के साथ सहयोग करता रहा है और इस मामले में वह भारत का चिर-परिचित सहयोगी है। भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने और परमाणु ईंधन की सप्लाई में रूस ने हमेशा पूरा सहयोग दिया है और यह सिलसिला इस समझौते के साथ और भी आगे बढ़ा है।चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना के बाद रूस ने परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा के लिए काफी पुख्ता इंतजाम किए हैं जिसकी वजह से रूसी रिएक्टर दुनिया में सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। रूस ने अगली पीढ़ी के रिएक्टर विकसित किए हैं।
2.रक्षा समझौता:- भारत-रूस के मध्य रक्षा संबंध काफी पुख्ता रहे हैं। पुतिन की इस यात्रा के दौरान यह फैसला लिया गया कि दोनों देश वर्ष 2016 तक संयुक्त रूप से पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का विकास शुरू कर देंगे। इस विमान का उपयोग भारतीय वायुसेना द्वारा किया जाएगा। इसके अतिरिक्त भी कई रक्षा समझौते किए गये। रूसी विमानवाहक पोत गोर्शकोव के अंतिम मूल्य संबंधी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए।
3.गैस के क्षेत्र में सहयोग:- भारत-रूस की तेल कंपनियां एक-दूसरे के साथ साझीदारी के द्वारा हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी सहमत हुई। ओएनजीसी और गैजप्रोम के बीच समझौता हुआ।
नए संदर्भ में भारत-रूस संबंध शीतयुद्ध के दौर में भारत और सोवियत संघ के बीच काफी घनिष्ठ संबंध थे। दूसरी ओर भारत का पारंपरिक प्रतिद्वन्द्वी पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में था। अगस्त 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शांति, मित्रता एवं सहयोग संबंधी एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गये जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के मध्य रक्षा संबंधों को पुख्ता करना था। दोनों देशों ने आड़े वक्त में एक-दूसरे का जमकर सहयोग किया।
4.सेना, ऊर्जा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान और फार्मा जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग।
5.2015 तक 20 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य पाने का समझौता।
6.सालाना शिखर सम्मेलन में अहम द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर चर्चा।
7.कुंडनकुलम में रूस निर्मित अतिरिक्त परमाणु रिएक्टरों के लगाए जाने पर चर्चा।
8.पांचवी पीढी के लड़ाकू विमान तैयार करने के लिए प्रारंभिक डिजाइन अनुबंध।
9.हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में सहयोग।
10.परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए रिएक्टर प्रौद्योगिकी एवं इससे जुड़े क्षेत्रों में साथ मिलकर अनुसंधान एवं विकास।
11.व्यापारियों सहित कुछ वर्गों के लिए वीजा प्रक्रिया का सरलीकरण।
12 .तेल एवं गैस क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा।
13 .फार्मा क्षेत्र में सहयोग।
14 .अनियमित पलायन की रोकथाम।
15 .आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग।
21वीं शताब्दी में भारत-रूस संबंध:- व्लादिमिर पुतिन के राष्ट्रपति बनने के बाद से एक बार फिर से रूस ने अपने पुराने तेवर दिखाने शुरू कर दिये थे। पुतिन ने आक्रमक विदेश नीति का प्रदर्शन करते हुए कई बार अमेरिकी विदेश नीति को चुनौती दी। हाल के वर्र्षों में नाटो के विस्तार के नाम पर अमेरिका पूर्वी यूरोप के देशों में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जिसे रूस अपनी सम्प्रभुता पर सीधे आक्रमण मानता है। रूस हाल के वर्र्षो में एक बार फिर से भारत जैसे अपने समय की कसौटी पर परखे हुए मित्रों की तरफ आकृष्ट हुआ है। रूस की अर्थव्यवस्था में भी काफी सुधार हुआ है। भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ रही है, जिसकी वजह से रूस अब रक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त आर्थिक क्षेत्र में भी सहयोग करने का इच्छुक है। पेट्रोलियम और गैस के क्षेत्रों में तो दोनों देशों के मध्य सहयोग काफी आगे बढ़ चुका है।
सुरक्षा परिषद के लिए समर्थन:-रूस ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट संघ की सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य के रूप में सदस्यता के भारतीय दावे का पुरजोर समर्थन किया है। रूसी राष्टपति ने स्पष्टï रूप से कहा है कि यदि सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाता है तो भारत के दावे पर गंभीरता से विचार जरूरी है। रूस का मानना है कि भारत स्थाई सीट का शक्तिशाली दावेदार है।रूस के समर्थन के बाद इस पद के लिए भारतीय दावा और भी अधिक पुख्ता हो गया है क्योंकि संयुक्त राष्टï्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों में से तीन फ्रांस, ब्रिटेन और रूस भारत के दावे के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
संबंध हुए और पुख्ता:-रूसी राष्टपति दिमित्री मेदवेदेव की भारत यात्रा के दौरान वेसे तो कई समझौते हुए हैं लेकिन सबसे अहम बात पांचवी पीढ़ी के युद्घक विमान एवं सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पर सहमति की है। रूस के राष्टपति दिमित्री मेदवेदेव की दो दिवसीय यात्रा के दौरान यह बात फिर से प्रमाणित हो गई है कि रूस भारत के साथ न केवल पूर्व जैसे दोस्ताना संबंध चाहता है बल्कि उन्हें नई मंजिलों पर भी ले जाने का इच्छुक है। इस यात्रा में 30 ऐसे महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं जिनका दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर सकारात्मक असर पडऩा तय है। रूस से 65 साल पहले भारत के गहरेरिश्ते की शुरुआत हुई. राजनयिक स्तर पर 17.04.1974 को. मित्रता, सहयोग का नया दौर.’हिंदी, रूसी, भाई-भाई’ का मुहावरा, महज प्रतीकनहीं था. गुजरे 20-25 वर्षो में रूस ने भी अनेकउतार चढ़ाव देखे हैं. सोवियत रूस, बिखरा. बोरिसयेल्सतीन युग में रूस खुद कई गंभीर सवालों से,चुनौतियों से घिरा रहा. लोकतंत्र के प्रयोग औरबाजारवाद के साथ नये प्रयोग के परिणाम भी, ‘90 के दशक में रूस ने झेला. अब रूस की जनता उस दौर का दोहराव नहीं चाहती. वह सुरक्षित और स्थायी सरकारचाहती है. बेहतर, समृद्ध और सुखी भविष्य भी.फिलहाल ब्लादिमीर पुतिन, भारत के लिए खास महत्व रखते हैं. वर्ष 2000 में हीभारत से विशेष रिश्ते के लिए उन्होंने पहल की. रूस पहला देश था, जिसने 11 वींशिखर वार्ता के दौरान,2010 में भारत के साथ ‘स्ट्रेटिजिक पार्टनरशिप’ (रणनीतिकसाझेदारी) की. भारत रूस ने अपने रिश्ते को एक नया मुकाम दिया, ‘स्पेशल एंडप्रिविलेज्ड स्ट्रेटिजिक पार्टनरशिप’ (विशेष व खास रणनीतिक साझेदारी) दर्जा देकर.दुनिया के तमाम देशों से भारत के संबंध हैं, पर इस बीच भी यह खास रिश्ता,रूस भारत के बीच ही है. इस विशेष दर्जा या संबंध का यही आशय था.दोनों देश, धार्मिक उन्माद के अनुभव, आतंकवाद पाबंदी अवैध नशा दवाओं कीतस्करी, अफगानपाक सीमा के अनुभव साझा करते ही रहे हैं. दुनिया के अनेकसवालों पर भी एक तरह हैं. ईरान की परमाणु संयंत्र की योजना,अरब देशों के हालात वगैरह पर , जिन्हें सेना के बदले राजनयिक प्रयासों से बदलनेकी रणनीति पर दोनों भरोसा करते हैं. पर सबसे गहरा रिश्ता हथियारों के बाजारका है. आज भी भारतीय रक्षा द्वारा प्रयोग होनेवाली इक्विपेमेंट (हथियार), 60फीसदी रूस मूल के ही हैं. भारत-रूस में कई महत्वपूर्ण रक्षा सौदों में आपसी सहयोग चल रहा है.
7 अगस्त से रूस और भारत के बीच रेल सेवा:-बहुत जल्द रूस और भारत के बीच रेल सेवा शुरू हो रही है। खबरों की मानें तो यह रेल सेवा रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से भारत में मुंबई के बीच होगी। शुरुआत में इस रूट पर मालगाड़ियों को चलाया जाएगा। इन मालगाड़ियों को अगले महीने से चलाए जाने की संभावना है। इस रेल रूट से चार देश रूस, अजरबैजान, ईरान और भारत जुड़ेंगे। यह उतरी-दक्षिणी प्रोजेक्ट का रूट हेलसिंकी से मुंबई तक सात हजार किमी की दूरी तय करेगा। एक अंग्रेजी अखबार की मानें तो रूस रेलवे के प्रथम अलिक्सान्दर मिशारीन ने बताया, शुरू में हम इस नए रेलमार्ग पर मालगाडियां चलाकर देखेंगे। इस रूट पर पहली मालगाड़ी मुंबई से आगामी 7 अगस्त को मास्को के लिए रवाना होगी।अजरबैजान रेलवे के अध्यक्ष जावेद गुरबानफ ने कहा, आने वाले हफ्तों में ऐसी पहली ट्रेन अपनी मंजिल की तरफ रवाना होगी। उन्होंने बताया कि इस नए रेलमार्ग का रास्ता मुंबई से ईरान के बेन्देर-अब्बास बन्दरगाह तक पहुंचेगा। उसके बाद यह रेल ईरान के रेश्त नगर तक जाएगी। ईरान की उत्तरी सीमाओं पर बसे रेश्त नगर और अजरबैजान के सीमावर्ती नगर अस्तारा के बीच रेल लाइन बिछाने का काम पूरा नहीं हुआ है। इसलिए इस मालगाड़ी पर लदे सारे कंटेनर सड़क के रास्ते से अस्तारा ले जाए जाएंगे। जहां से इन कंटेनरों को फिर से रेलगाड़ी पर लादकर उन्हें मास्को रवाना किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि साल 2000 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग नगर में रूस, ईरान और भारत ने अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे ‘उतरी-दक्षिणी’ का निर्माण करने के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। यह समझौता 21 मई 2002 से लागू हो गया। बाद में साल 2005 में अजरबैजान भी इस समझौते में शामिल हो गया।इस ‘उतरी-दक्षिणी’ गलियारी परियोजना के अंतर्गत रेल लाईन बिछाने का काम पूरा होने के बाद यह गलियारा अन्य वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय परिवहन मार्गों के मुकाबले बड़ा फायदेमंद होगा। इसकी वजह से फारस की खाड़ी से यूरोप तक मालों की ढुलाई बहुत कम समय में और बहुत कम लागत पर होने लगेगी। इसे सभी देशों को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा ।
इस परियोजना में शामिल सभी देशों के विशेषज्ञों का यह मनना है कि उतरी-दक्षिणी गलियारे के बन जाने से इससे जुडें चारों देशों (रूस, अजरबैजान, ईरान, भारत) को बड़ा फायदा होगा, जब मुंबई से सेण्ट पीटर्सबर्ग और हेलसिंकी तक जाने वाले इस रास्ते पर मालगाड़ियों के साथ-साथ यात्री गाड़ियां भी चलने लगेंगी तो यह सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला एक लोकप्रिय रास्ता बन जाएगा.
भारत के हाई स्पीड ट्रेन प्रोजेक्ट में शामिल होना चाहता रूस:-भारत में हो रही तेज रफ्तार रेल योजना (हाई स्पीड ट्रेन प्रोजेक्ट) की तैयारी को लेकर सिर्फ देश ही नहीं बल्‍िक दुनिया के दूसरे देश भी तैयार है।रूस के रेल अधिकारी भारत हाई स्पीड ट्रेन प्रोजेक्ट पर साझेदारी के लिए बातचीत कर रहे हैं। इस बात की पुष्टि स्वयं रेलवे के अध्यक्ष ब्लादिमीर याकुनिन ने की है। वह अब पिछली दो चरणों में भारत के साथ हुई वार्ता को सफल बनाकर हकीकत के धरातल पर उतारना चाहते हैं।वर्तमान में इन दिनों भारत में तेज रफ्तार रेल योजना (हाई स्पीड ट्रेन प्रोजेक्ट) शुरू करने की तैयारी काफी तेजी से की जा रही है। इतना ही नहीं इस योजना के साथ ही देश की रेल व्यवस्था को और ज्यादा आधुनिक बनाई जाएगी। जिससे इसके लिए केंद्र सरकार व रेलमंत्रालय हर संभव प्रयास कर रही हैं। ऐसे में अब इस परियोजना को लेकर एक बड़ी बात सामने आई है। जिसमें यह साफ हो गया है कि इसमें अब रूस भी साझेदारी करना चाहता है। रूस रेलवे के अध्यक्ष ब्लादिमीर याकुनिन का कहना है कि इस रेलवे की बेहतर सुविधा और टेक्नोलॉजी में रूस काफी आगे है। जिससे तेज रफ्तार रेल लिंक पर भारतीय रेल के साथ साझेदारी होने पर वह उसे बेहतर बना देंगे। उनका मानना है कि भारत से पिछले दो चरणों में हुई विफल वार्ता को अब सफल बना देना चाहिए। सेंट पीट्सबर्ग इंटरनैशनल इकनॉमिक फोरम के इतर मौके पर प्रेसवार्ता में याकुनिन ने बताया कि भारतीय रेल को सुरक्षित बना देंगे। वह भारतीय नेताओं और अधिकारियों के साथ भारत में सिग्नलिंग और अवसंरचना सुरक्षा बेहतर करने का जिक्र पहले ही कर चुके हैं। जिससे भारतीय रेल मार्गों पर होने वाली दुर्घटनाएं काफी हद तक टाली जा सकेंगी। पिछले 10 से रूसी रेल के प्रमुख याकुनिक रूस रेल सेवा को काफी बेहतर बना चुके हैं।रूस का रेलमार्ग करीब 85 हजार किलोमीटर लंबा है और इसमें करीब 12 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत है। इतना ही नहीं सालम में करीब एक अरब यात्रियों को सेवा देने वाला रूसी रेलवे 1.2 अरब टन माल ढुलाई भी करता है। आज रूस इस मामले में दुनिया की रेल सेवाओं में चौथे नंबर पर शामिल है।

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3 Comments on "रूस और भारत के बीच पुख्ता संबंध व ट्रेन सेवा"

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Himwant
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विगत में रूस भारत का अच्छा मित्र साबित हुआ है. दुसरी ओर युएसए की कथनी और करनी में हमेशा से बड़ा अंतर रहा है. रूस आज भी सामरिक रूप से विश्व का एक निर्णायक शक्ति केंद्र है. आज भारत जिस गति से अमेरिका के निकट जा रहा है उसी अनुपात में रूस से दूरी बढ़ रही है. यह ठीक नही, रूस और भारत की मित्रता अटूट बने मेरी यही इच्छा है.

Himwant
Guest

भारतीय डिप्लोमैसी में गहरी घुसपैठ है. 10 वर्ष के युपीए शाषण में यह घुसपैठ गहरी हुई है. लाल गड्ढे से निकले राष्ट्र निरपेक्ष लोग भारतीय कूटनीति के उच्च स्थान पर अवस्थित है. वे भू राजनीति की गतिशीलता को आत्मसात नही कर पा रहे है. रूस और भारत के सम्बन्ध अटूट है. अन्य देशों से भी हमारे सम्बन्ध विकसित हो रहे है. भावना नही, यथार्थ हमारे सम्बन्धो का मार्ग प्रशस्त करे.

Dr Ashok kumar Tiwari
Guest
Dr Ashok kumar Tiwari

महान रूस के साथ ट्रेन सेवा शुरू करके दोस्ती को और मज़बूत किया जा सकता है , सामाजिक-सांंस्कृतिक संबंध भी प्रगाढ़ होने चाहिए ———————————-

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