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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-अशोक मालवीय

सरकार हो या पूँजीवादी ताकतें, इन्होंने कभी भी आदिवासियों को उनका हक नहीं देना चाहा है? लेकिन जब जनाक्रोश एक सैलाब का रूप धारण कर लेता तो इसकी दहशत की वजह से इनके हक को दर्शाने वाले कानून तो बना दिये जाते है। परन्तु इसके सही क्रियान्वयन न करने की निरन्तर प्रक्रिया के चलते ऐसे कानून का थोड़ा-बहुत लाभ देकर इन्हें खत्म कर दिया जाता है। ठीक इस तरह की दोगली सोच के साथ लागू हुआ वनाधिकार कानून 2006 की असलियत अब जगजाहिर होने लगी हैं। आदिवासियों और परम्परागत वन वासियों को इस कानून का सही मायने में लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस कानून की गड़बडी के चलते क्रियान्वयन की डमामोल स्थितियां बनी हुई है। 1927 में बने पहले वन कानून के बाद से आजतक आदिवासियों को कई उलझनों में उलझाकर उनका शोषण का सिलसिला चलता ही जा रहा है।

पिछले महिने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के गृह क्षेत्र बुधनी का दौराकर एक मामला उछला कि आदिवासियों को पट्टे नहीं मिल रहे है। इसके लिये कई जगह गुहार ला दी पर कोई सुनता ही नहीं है। मसला सिर्फ राजनैतिक मुद्दा बन ही नहीं हैं, सोचने की बात है कि प्रदेश के राजा के क्षेत्र में यह वनअधिकार के यह हाल है तो दूर-दराज के आदिवासी अंचलों में स्थितियां होगी?? मुख्यमंत्री के गृह जिला सीहोर में पट्टे के लिये 12284 दावे आये थे जिनमें से प्रशासन ने 9151 दावों को निरस्त कर दिया। निरस्त दावों का कोई जबाब भी नहीेंं मिला और मिला भी तो गुमराह करने वाला। इस कानून में अहम भूमिका ग्रामसभा को दी गई है। गा्रम सभा और वन अधिकार समिति स्तर पर तो अधिकतर दावों को मंजूरी दे दी जाती है परन्तु बढ़ते क्रम में उपखण्ड स्तरीय व जिला स्तरीय समिति में बडी संख्या में दावे खारिज कर दिये जाते है। इन समितियों जनप्रतिनिधि व प्रशासकीय अमला होता है। इस तरह देखे तो इस प्रक्रिया में ग्रामसभा की भूमिका महत्वपूर्ण नजर ही नहीं आती है। जबकि इस कानून की धारा 2 (छ) में स्पष्ट कहा गया है कि औपनिवेशक काल से चली आ रही वन प्रशासन को प्रजातांत्रिकरण करने के लिये ग्राम सभा को सशक्त एवं सर्वमान्य बनाना होगा। प्रदेश में वनविभाग और अन्य शक्तिशाली नुमाईनदो ने इस कानून के प्रमुख लक्ष्यों को धराशायी कर दिया हैं, साथ ही ग्रामसभा को सशक्त होने की प्रक्रिया को खत्म कर दिया हैं, कई जगह तो वन अधिकार समितियां आज तक नहीं बनाई गई हैं। कुलमिलाकर अभी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वन विभाग की दादागिरी ही कारगार साबित हो रही है। दूसरा सरकारी आंकड़ो से ज्ञात ही नही होता कि जिन लोगो को व्यक्तिगत पट्टा दिया गया है, इन्होंने कितने एकड़ जमीन के लिये आवेदन किया था। और कितने एकड़ जमीन का पट्टा दिया गया है।

वास्तव में तो सरकार की इच्छा इस कानून को लागू करने ही नहीं थी तभी तो इस विधेयक को लागू करने में आनाकानी करते हुये ढेड़ वर्ष की देरी कर दी। ऊपरी मन से दी गई मान्यता का ही नतीजा है कि ना ही इस कानून का प्रचार-प्रसार किया गया, ना ही लोगों को इसकी ठीक-ठीक जानकारी दी गई। इस कानून के लागू होने के डेढ़ वर्ष बाद आज भी न ग्राम सभा का,े ना ही वनअधिकार समिति को इस संबंध में कुछ पता है और ना ही इनके प्रस्ताव कही लिए गये। आज भी आधे से अधिक आदिवासी इस कानून के नाम, लक्ष्य व प्रक्रिया से अनभिज्ञ है। कानून का प्रमुख लक्ष्य है कि आदिवासियों को उनके गांव की पारम्परिक सीमा में सामुदायिक अधिकार देना है। हमारी सरकार मात्र व्यक्तिगत पट्टा देना ही आपनी पूर्ण जिम्मेदारी से मुक्त होना ही समझ रही है। वन संसाधन पर सामूदायिक अधिकार लोगों को मिलना इस कानून का प्रमुख प्रावधान हैं। वन संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार ही तो आदिवासी की अस्मिता को बचाऐ रखने का मूल आधार है। यह महत्वपूर्ण इसलिये और भी हैं कि वन संसाधनों पर अभी दावा करके अधिकार स्थापित नहीं किया गया तो फिर समुदायिक उपयोग और संरक्षण का अधिकार नहीं मिल पायेगा। वन संसाधन का उपयोग प्रदेश की आबादी के 20 प्रतिशत आदिवासी के अलावा जंगलों से लगे 18 प्रतिशत गांव के लोग भी इस का उपयोग करते है। परन्तु सरकारें इन संसाधनों पर लोगों को अधिकार देना ही नहीं चाहती हैं, इसी वजह से आज तक सामुदायिक अधिकार के दावा फार्म बिल्न्कुल नहीं भरवाये जा रहे है। कानून के अनुसार दो फार्म भरवाऐं जाने चाहिये थे, एक व्यक्तिगत अधिकार का दावा फार्म और दूसरा सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार के लिए, पर सामुदायिक अधिकार का फार्म क्यों नहीं भरवाऐं जा रहे हैं? जिसके चलते अभी तक कहीं भी वनसासियों को सामुदायिक अधिकार नहीं दिये गये है।

इस कानून में अन्य परम्परागत वन निवासियों के लिये उनके पूर्वजों की तीन पीढ़ियों के रहने का प्रमाण साबित करने का प्रावधान रखा गया है इन दोनों तरह के दस्तावेजों को जुटाने की शर्त ने पारम्परिक आदिवासी व जंगलवासी को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। इन प्रमाणों को प्रशासन के सामने पेश करने के लिये इन्हें लोहे के चने चबाने पड़ रहे है। और सरकार भी इन लोगों को सबूत मोहिया कराने में कोई मदद नहीं कर रही है। जिस जगह पट्टा देने की प्रक्रिया चल रही है वहां पर इनकी जमीन नपाई पारम्परिक रूप से चैन के जरिये होना चाहिये था जबकि मषीन के जरिये से हो रही है। मषीन का खेल इन लोगों को समझ नहीं आता हैं। कई जगह तो नपाई के दौरान मषीन खराब हो गई तो वह मशीन वापिस चली गई। और यहां के लोग आज तक इन्तजार कर रहे हैं कि कब आयेगी मशीन और आगे की प्रक्रिया पूरी होगी और हमें पट्टा मिलेगे। दावा फार्म भरने के लिये एक समय सीमा तय की गई थी, पर कई जगह इसकी जानकारी लोगों को देरी से दी गई,, तब प्रमाण पत्र जुटाने में देर हो गई। तथा बहुत से लोग इस दौरान रोजगार के लिये पलायन कर गये थे। ऐसी स्थितियों में ये कैसे आवेदन कर पाते। कानून में स्पस्ट है कि परिवार जितने एकड़ जमीन पर खेती करता है उसे उतनी जमीन दी जायेगी जो कि अधिकतम 10 एकड़ तक हो सकती है। पर लोगों ने जितने एकड़ जमीन पर हक के लिये दावा किया है, उसमें से आधी-अधूरी जमीन का ही पट्टा मिल रहा हैं। वन विभाग को साफ निर्देश दिया गया है कि जब तक भूमि अधिकारों का सत्यापन पूरा नहीं हो जाता तब तक किसी को बेदखल नहीं करें। इसके लिये म.प्र. सरकार ने इस प्रक्रिया का स्वरूप और उसकी समयअवधि तय की हैं। परन्तु इसका भी सरे आम उल्लखन हो रहा है। लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। दमोह में 30 आदिवासियों को पट्टे देने का कहकर पुलिस चौकी में बुलाया और उन्हें जंगल से लकड़ी चुराने के नाम पर बन्द कर दिया गया, जमीन अतिक्रमण के नाम पर उनके झोपड़ो में आग लगा दी गई। इसी तरह बैतूल, शिवपुरी, गुला, झाबुआ, अशोकनगर, मण्डला सहित प्रदेश में ऐसी घटना आये दिन हो रही है।

वनअधिकार कानून के क्रियान्वयन में हो रही इन गड़बड़ियों को देखकर प्रदेशभर के आदिवासी लाभबंद हो रहे है। जिसको देखते हुऐ और केन्द्र सरकार की टिप्पणी के आधार पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने एक बैठक में कहा कि निरस्त हुये दावों पर पुन: गौर किया जायेगा। परन्तु स्वयं व सरकार को बचाते हुये, उन्होंने कहा है कि ग्राम सभाओं के झगड़े व गांवों की आपसी गुटबाजी के कारण गड़बड़ संभव हैं। यह कहां तक उचित है कि ग्रामसभा और गांव को गुनाहगार ठहराकर स्वयं बचा जाये। उनको शायद नहीं मालूम हैं कि वनविभाग की दादागिरी व जबरन की दखलअंदाजी की चलते दिक्क्तें पैदा हो रही है जबकि वनविभाग को इसका कोई अधिकार नहीं हैं तथा इस कानून के लागू करने की मंशा सरकार की नही थी? पर ऊपरी मंशा से इसे लागू करना ही पड़ा और इस विधेयक की प्रस्तावना में स्वीकार किया गया है कि आदिवासियों पर ऐतिहासिक रूप से अन्याय हुआ हैं और जंगल पर उनके अधिकार सही स्थापित नहीं किये गये इसलिये अन्याय को दूर करने के लिये यह कदम उठाया गया हैं। पर हमारी सरकार भी एक कठपूतली की भूमिका में ही है। और इसी नचाने वाले और कोई हैं, सरकार उन्हें प्रसन्नचित रखने के लिये उनके इशारे को वरदान मानकर उन पर नाचने को अपना सौभाग समझती है। इसी तरह इस कानून के पीछे कि वास्तविक मंशा तो विष्वबैंक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुश करने की है, जो कि भारत की वन सम्पत्ति पर अपनी नियत लगाये हुये बैठे है। विष्वबैंक ने अपने कई प्रस्तावों व घोषणाओं में स्वष्ट रूप से आदिवासियों को अधिकार देने की बात बड़ी चलाकी से कही है। ऐसे ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियो तो भारत के वनो पर अपनी मालकियत जमाना ही चाहती हैं परन्तु वह यह भी नहीं चाहते है कि इस मंशा के चलते अदिवासियों के हक छुडाऐ जाऐं। क्योंकि इस तरह करने से मानवअधिकार हनन का शोर मचेगा, और उन्हें कटघरे में खडा होना पड़े। अत: विश्‍वबैंक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों इतनी चालक है कि उन्होंने इस कानून के रूप में छुट-पुट अधिकार देने का समर्थन किया है, ताकि यह आदिवासी अपने हक की मांग नहीं उठाऐंगे तथा चुप रहेंगे तो उन्हें इस वन सम्पदा का बाजारीकरण करने में दिक्‍कतें नहीं आयेगी।

आदिवासी व अन्य वनवासियों ने लम्बे संघर्ष के बाद इस कानून को लागू करवाया है तथा इस कानून से मिले अधिकार के रूप में पट्टे मिलने मात्र से पूर्ण अधिकार नहीं मिल सकते। क्योंकि जंगल से संबंधित जो भी कानून अभी तक आये हैं, उनका मकसद समाज के एक खास तबके को लाभ पहुंचाना ही रहा है। सरकारें, विश्‍वबैंक, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों इन्हें हथयाने के लिये कुछ भी कर ले पर वन सम्पदा हमारी रही है और रहेगी, इनकी चालों को नाकाम करना ही पडेगा। इस कानून के तहत आदिवासी केवल जमीन का एक टुकडा नहीं चाहते है वे जमीन सहित संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग व संरक्षण का सम्पूर्ण हक चाहते है। इन आदिवासियों की मंशा व्यक्तिगत स्वार्थ की नहीं बल्कि जंगल, खनिज संसाधन, वन्य जीव, पानी पर संरक्षण करते हुये अपना जीवन जीना चाहते है।

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2 Comments on "सोचो, करो कुछ भी…जमीन हमारी ही है !!"

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डॉ. महेश सिन्‍हा
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कौन चाहता है सत्ता का विकेंद्रीकरण
राडिया मामला तो केवल एक बूंद है सागर की

sunil patel
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नियम बनाने वाले समान्य व्यक्ति तो होते नही है। वे न तो जगल मे रह्ते है। बडे बडे नेता मन्त्रि और आए ए एस अधिकरि नियम बनाते है। उन्हे आम व्यक्ति से क्या। सर कार ने वनो से आम लोगो को दूर कर दिया है। जगल अमीरो के लीये रेसेर्वे हो गये है

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