लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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vasantबाजार द्वारा हर मौसम की कमी पूरी किए जाने के बाद भी पता नहीं वसंत का कई दिनों से वैसे ही इंतजार क्यों कर रहा था जैसे कोई पागल कवि कई दिनों से अपनी भेजी रचना की स्वीकृति आने का इंतजार करता है। दरवाजे पर जरा सी भी आहट होती है तो कवि को लगता है कि किसी पत्रिका के सुसंपादक से उसकी कविता की स्वीकृति आ गई। और वह मन ही मन कविता से मिलने वाले पारिश्रमिक के आने की प्रसन्नता के स्वागत के गीतों की रिहर्सल करने में मग्न हो जाता है , खराशे हुए गले से। तब वह कविता के पारिश्रमिक में खोया, आंखे बंद कर कृष्ण हो पोस्टमैन रूपी सुदामा से मिलने नंगे पांव ही दौड़ पड़ता है। पर जब गली में बच्चों द्वारा पत्थर मार कर तोड़ी स्ट्रीट लाइट के शीशे उसके पांव में चुभते हैं तो उसे अहसास होता है कि वह द्वापर  का नहीं कलिजुग का कवि है ,जहां कृष्ण सुदामा से मिलने नहीं आते। कृष्ण कंस से ही सब कुछ छोड़ गले मिलते रहते हैं।

दफ्तर  से मार कर लाए कैलेंडर में वसंत के आने की तारीख वाला सूरज ज्यों ही फैक्टिरियों के धुएं के बीच से आधा-पौना मेरे घर में झांका तो मत पूछो मुझे कितनी खुशी मिली। मैं तो शाम को ही नहा धो कर चेहरे पर देवताओं वाली फेअरनेस क्रीम छोड़ अप्सराओं वाली फेअरनेस क्रीम चार बार मल उसके स्वागत के लिए तैयार हो गया था कि बंदे को ऐसा न लगे कि उसके आने का अब मनचलों को छोड़ और किसी को इंतजार नहीं। …… कि तभी सेल पर काॅल आई तो मैं चैंका। सोचा, वसंत की ही होगी। हाईटैक जमाना है। शायद वह भी मेरे रिश्तेदारों की तरह अपने आने की पूर्व सूचना मोबाइल पर काॅल कर पूछ रहा हो कि मैं घर पर हूं कि नहीं। असल में क्या है न कि जब  मेहमान के आने की संभावना हो तो अक्सर मेजबान घर से नदारद पाए जाते हैं। महंगाई के दौर में जिसे देखो अपने दरवाजे पर ताला लगाए औरों के बंद दरवाजों पर दस्तक दे रहा है।

 

‘कौन?? वसंत??कितने बजे की टेªन से आ रहे हो?? ट्रेन लेट तो नहीं?’ मैं वसंत से मिलने को कुछ अधिक ही आतुर था। पता नहीं क्यों?

‘हां यार, वसंत ही बोल रहा हूं। और कैसे हो? कोयल आई कि नहीं?’

‘नहीं अभी तो कहीं कूकती नहीं दिखी! मैं ठीक हूं। कब जैसे आ रहे हो? घर में मैंने तुम्हारे स्वागत के लिए सारे इंतजाम करके रखे हैं। बस, अब तुम्हारा आना बाकि है। तुम आओ तो…. अबके तुम्हारा ऐसा स्वागत करूंगा कि… खूब जमेगा रंग, जब मिल बैठंेगेे यार, हम तुम और…….’

‘पर यार! अबकी बार आना जरा मुष्किल लग रहा है।’

‘ क्यों?? विदेस घूमने का प्रोगाम तो नहीं बना लिया? राजा और ऋतुराज घर में टिकते ही कहां हैं?’

‘बुरा तो नहीं मानोगे जो सच कहूं तो?’

‘खुदा कसम! बड़े दिनों से किसीके मुख से सच सुना ही नहीं वसंत। अब तो सच सुनने को मुए कान तरस गए हैं। लोगबाग झूठ इन दिनों यों ताल ठोंक कर कहते हैं कि झूठ को शर्म आ जाए तो आ जाए,  पर उनके चेहरे पर रत्ती भर शिकन नहीं। मानों भगवान ने उनके मुंह ही झूठ बोलने को चिपकाया हो। ऐसे में तुम सच कहो तो मन वसंत हो जाए वसंत।’

‘तो सुनो यार, तुम्हारे शहर में फैली गंदगी से बीमारियां इतनी फैली हंै कि… माफ करना! पर मुझे ये कहते हुए भाई साहब शर्म आ रही है कि बड़े बेकार के बंदे हो तुम भी। ऐसी गंदगी में ऋतुराज तो क्या? नरकासुर को बुलाओ तो वह भी तुम लोगों का निमंत्रण टाल जाए जहां अपनी ही सफाई के लिए सरकार को अभियान चलाना पड़ रहा है। जहां देखो, गंदगी ही गंदगी। आखिर तुम ऐसी गंदगी में कैसे रह लेते हो? मुझे तो डर लगा रहा है कि तुम्हारे शहर आ कहीं किसी बीमारी की चपेट में आ गया तो??? हद है यार, ईष्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति होने के बाद भी तुमने धरा का ये हाल कर रखा है तो दूसरे जीवों से क्या अपेक्षा की जाए? वैसे आजकल मेरी सेहत कुछ ढीली ही चल रही है यार।’

‘मतलब?? यार, हम तो जिंदा हैं न इस गंदगी के बीच, विश्वास नहीं हो रहा तो ये देख, ये देख, सब अपने- अपने गंद में कितने मस्त हैं? देखो तो, हमें तो इस गंदगी में आजतक  कोई बीमारी नहीं हुई, उल्टे फले-फूले ही। सच कहूं तो हम उस दिन बीमार जरूर हो जाएंगे जिस रोज गंदगी से दूर रहने लगेंगे। तुम कोई हमसे अलग हो क्या?? हो तो इसी माटी की प्राॅडक्ट न?’

‘ पर साॅरी यार! माफ करना। राजा और रंक में फर्क होता है कि नहीं?’

‘ ठीक है! जा संसद में जाकर बैठ जा उनके साथ। पांच साल बाद भी मन करे तो आ जाना। पर ये स्वागत की तैयारियां किसके लिए? अब इस सारे ताम झाम का क्या करूं? कहां डालूं ये मालाएं? पड़ोसन के गले में डालूं क्या??’ अजीब बंदे हैं यार मेरे आसपास के। इन पर विश्वास करो तो मरवा कर रख दें। न करो तो कहते हैं, हम पर ये विश्वास नहीं करता।

‘किसी और को बुला लो। यहां माला पहनने वाली गरदनों की कमी है क्या? एक को बुलाओ तो पचास हाजिर हो जाएं। ’

‘तो तुम्हारे बिन मां सरस्वती की पूजा कैसे करेंगे? जीवन में लय कैसे आएगी?’

‘ डीजे- डूजे लगा लो यार! साॅरी!’

अशोक गौतम

 

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2 Comments on "अबके नहीं आ पाऊंगा यार"

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ashok gautam
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singh ji. aap ki kavita is bahane padne ka su avsar mila. mera soubhagay . Ashok gautam

आर.सिंह
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इस व्यंग्य का अवलोकन करके,अपनी एक पुरानी कविता की याद ताजा हो गयी.लिंक यह है:
http://www.pravakta.com/r-singhs-poetry-drain-keedeh/

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