लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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ललिता नायडू

बढ़ती जनसंख्या की आर्थिक एवं सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रस्तावित समाधानों में कृषि में जैवप्रौद्योगिकी का प्रयोग भी शामिल होना चाहिए। आईएसएएए ब्रीफ 44 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2013 में 27 देशों के 1.8 करोड़ किसानों ने 17.5 करोड़ हैक्टेयर भूमि पर बायोटैक फसलें उगायीं, जो कि विश्व स्तर पर बायोटैक क्रॉप हेक्टरेज में 50 लाख अथवा तीन प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

अब समय आ गया है कि देश में किसानों, विज्ञान और आर्थिक प्रगति के लिए समेकित प्रयास किये जाएं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी बड़ी ही सटीक होती है, इसके बारे में राय विषय के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसीलिए यह जरूरी है कि इन मामलों में वैज्ञानिक तथ्यों को जान लिया जाये।

आइए कुछ  तथ्यों पर नजर डालते हैं।

1. देश में जीएम नियामक प्रोसेस ईपीए के नियम 1989, 1986 द्वारा परिभाषित हैं और दुनिया में सबसे अच्छे नियमों में गिने जाते हैं। भारतीय कानून द्वारा परिभाषित विधि के अनुसार, खेतों में परीक्षण से पहले, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत गठित रिव्यू कमेटी ऑन जेनेटिक मोडिफिकेशन -आरसीजीएम- तथा पर्यावरण मंत्रालय के तहत गठित जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रेजल कमेटी -जीईएसी- द्वारा जैव सुरक्षा एवं पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से व्यापक परीक्षण किया जाता है। इन दोनों समितियों में स्वास्थ्य मंत्रालय समेत कई मंत्रालयों से जुड़े वैज्ञानिक एवं नीति निर्माता शामिल रहते हैं। क्या भारत सरकार के लिए यह सही है कि अपने कानून और अपनी शीर्ष नियामक संस्थाओं को नजरअंदाज कर वो वैज्ञानिक परीक्षण के लिए सिर्फ राजनीतिज्ञों, गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निर्भर करे? फील्ड ट्राइल्स सहित सभी वैज्ञानिक परीक्षण एक नियामक तरीका है जिसके बाद जीईएसी तय करती है कि किसी फसल में कोई खास जीएम ईवेंट भारत में खेती के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं। उस संदर्भ में, फील्ड ट्राइल्स रोकने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। अगर हम ट्राइल डाटा तैयार नहीं करते, तो किसी प्रौद्योगिकी का प्रोफाइल कैसे जांच पाएंगे और कैसे निर्णय लेने का अपना तरीका सुधार पाएंगे?

श्री जयराम रमेश ने 2010 में बीटी बैंगन पर मोरेटोरियम लागू करते वक्त जीईएसी से कहा था कि प्रौद्योगिकी के और अधिक मूल्यांकन के लिए अतिरिक्त परीक्षण तय करे। चार वर्षों से ये अतिरिक्त परीक्षण तय नहीं किये जा सके हैं। दुख की बात है कि तीन वर्षों में जीईएसी की सिर्फ एक बैठक  बुलाई गयी। नतीजा यह हुआ कि पिछले चार वर्षों से जीएम क्रॉप्स पर अनुसंधान एवं विकास का कार्य एकदम से ठप पड़ा हुआ है। मुझे ताज्जुब होता है कि जीएम क्रॉप्स का एप्रूवल स्वीकार्य नहीं है, जबकि उसी जीईएसी की एप्रूव की हुई जीएम दवाइयां और वैक्सीन इस देश की जनता के लिए ठीक मान ली गयीं। उद्योग तो सिर्फ प्रेडिक्टेबल रैगुलेटरी रिजीम चाहता है।

2. हमें इस सवाल का जवाब खोजना चाहिए कि हम सुरक्षा को कैसे परिभाषित करते हैं। दुनिया भर में जो नियामक विधि अपनायी जाती है वो सब्सटेंशियल इक्विवेलेंस पर आधारित है। सब्सटेंशियल इक्विवेलेंस की कांसेप्ट इस सिद्धांत पर बनी है कि हम जीएम फूड की तुलना नॉन-जीएम फूड से करके देखते हैं कि इनकी संरचना में कोई फर्क है या नहीं। यदि उनकी बनावट एक जैसी है तो हम उसे सुरक्षित श्रेणी में रख लेते हैं। इन मूल्यांकनों का एक वैज्ञानिक तरीका भी है। जीएम फूड्स सुरक्षित हैं या नहीं इसका निर्णय राजनीतिज्ञ, किसान या अन्य कोई सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता। जीईएसी हमारी सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था है जो कि ऐसा निर्णय लेने के लिए अििधकृत है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि रैगुलेटरी जरूरतें बढ़ाते जाने से वैश्विक स्तर पर रेगुलेटरी एप्रूवल की लागत प्रति ईवेंट 100 मिलियन डॉलर से भी अधिक हो चुकी है। ऐसे में यह काम सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट की कर पाएंगे क्योंकि इतना अधिक खर्च सिर्फ वे ही वहन कर सकते हैं।

हमें यह समझ लेना चाहिए कि आरसीजीएम और जीईएसी फील्ड ट्राइल्स की अनुमति देने से पहले बहुत अधिक आंकड़े चाहती है, और तभी संतुष्ट होती हैं। भारत एवं अन्य देशों में यह साबित हो चुका है कि ओपन फील्ड ट्राइल्स से भयभीत होने की जरूरत नहीं है।

3. जीएम टैक्नोलॉजी मानव, पशु और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है यह बात भारत सहित उन सभी देशों में साबित हो चुकी है जहां इसे अपू्रवल मिल चुका है। जो लोग यह कहते हैं कि यूरोप  जीएम टैक्नोलॉजी का समर्थन नहीं करता, उन्हें यूरोपियन फूड सेफ्टी कमीशन की वेबसाइट चैक करनी चाहिए जिसमें यह दिया गया है कि यूरोप ने निर्यात एवं अपने नागरिकों के उपयोग हेतु 25 जीएम ईवेंट्स वाले जीएम फूड्स को स्वीकृति दी हुई है। वैज्ञानिक संगठनों ने बहुत सारे अध्ययन किये हैं जिनसे यह साबित हुआ है कि जीएम फूड्स सुरक्षित हैं। जो एक्टिविस्ट फ्रांसीसी वैज्ञानिक सेरालिनी द्वारा 2012 में प्रकाशित उस प्रसिद्ध अध्ययन का अक्सर जिक्र करते आये हैं जिसमें कहा गया था कि जीएम मक्का खिलाने से चूहों में ट्यूमर उत्पन्न हो गये, वो अध्ययन अधूरा था, जिसे बाद में 2013 में उसी जर्नल- एल्सवीयर ने वापस ले लिया। इसी जर्नल ने सबसे पहले यह अध्ययन प्रकाशित किया था।

4. प्रत्येक प्रौद्योगिकी विकसित होने में समय लेती है। प्रौद्योगिकी के विकास में अनुसंधान का महत्वपूर्ण स्थान है। अनंत काल तक इंतजार करते रहने की बजाय हमें नयी प्रौद्योगिकियां प्रयोग में लानी चाहिए क्योंकि इनमें सुधार होते रहते हैं। भारत जैसा देश जहां कृषि उत्पादन को निरंतर बढ़ाने और ग्रामीण गरीबी को दूर करने पर जोर रहता है, उपयोगी प्रौद्योगिकियों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। खुद भारत में ही एकमात्र एप्रूव्ड ट्रेट- बीटी कॉटन ने किसानों को शानदार परिणाम दिये हैं। कीटनाशकों पर उनकी निर्भरता कम हुई है और पैदावार बढ़ी है। वर्ष 2002 में शुरू होने के बाद कपास की खेती 90 लाख हेक्टेअर से बढक़र 1.2 करोड़ हेक्टेअर हो गयी, जबकि कपास का उत्पादन 1.3 करोड़ बेल्स से बढक़र 3.4 करोड़ बेल्स हो गया, यानी कि 165 प्रतिशत की वृद्धि। भारत में कपास की पैदावार वर्ष 2000 में 200 किलोग्राम प्र्रति हेक्टेअर थी, जो 2005-06 में 362 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर और 2010-11 में बढक़र 510 किलोग्राम तक जा पहुंची। वर्ष 2002 में भारत कपास का आयात किया करता था, जबकि अब यह दुनिया में कपास का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत के 60 लाख किसान अच्छे परिणाम न देने वाली प्रौद्योगिकी थोड़े ही प्रयोग करते।

5. बीज पेटेंट कराने का मुद्दा अनुचित है। भारतीय पेटेंट अधिनियम के तहत किसी पौधे या उसके भाग, जैसे कि बीज, का पेटेंट नहीं कराया जा सकता। बीजों का पेटेंट नहीं होता। हमें बीजों और बायोटैक ट्रेट्स में फर्क समझना होगा। बीज तो ट्रेट्स के वाहक होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि कम्प्यूटर में चिप होती है। जो कंपनियां अपने अनुसंधानों के जरिये बीज विकसित करती हैं वे इन्हें प्लांट वैराइटी प्रोटैक्शन एक्ट, 2002 के तहत सुरक्षित कराती हैं। इस अधिनियम के तहत किसानों को बीज बचाने और दोबारा इस्तेमाल करने का अधिकार होता है।। यदि कोई बीज मांगा जाये और कंपनी उसे उपलब्ध न कराये तो सरकार को दखल देने का पूरा हक है। इसके लिए एक्ट में पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं। बायोटैक ट्रेट्स को पेटेंट एक्ट के अंतर्गत पेटेंट कराया जा सकता है। इससे किसी तरह का फूड सीक्योरिटी इश्यू पैदा नहीें होगा क्योंकि बीज तो बायोटैक ट्रेट के बिना भी उपलब्ध रहते हैं। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि बायोटैक ट्रेट किसी कंपनी को किसी डोनर बीज के जरिये एक ही बार दिया जाता है और इस प्रोसेस को उल्टा नहीं किया जा सकता। हमें यह समझ लेना चाहिए कि बीज का आयात नहीं किया जाता। बीटी कॉटन के सभी बीज भारत में ही तैयार हुए हैं।

6. भारत और अन्य देशों में दो लोकप्रिय जीएम ट्रेट्स – कीटों से बेअसर रहने और खर-पतवार को झेलने की क्षमता- के  सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों तथा इनके सुरक्षित होने संबंधी लिखित प्रमाण हंै।

वर्ष 1996 और 2012 के बीच, बायोटैक क्रॉप्स ने सकारात्मक योगदान दिया है, जैसे कि उत्पादन लागत में कमी और उत्पादकता में वृद्धि – अनुमानत: 37.7 करोड़ टन और 117 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर। इनसे पर्यावरण को लाभ हुआ, क्योंकि 49.7 करोड़ किलोग्राम कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ी। कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन घटा- अकेले 2012 में ही 27 अरब किलोग्राम कमी, जोकि 1.2 करोड़ कारों को सडक़ पर एक साल तक चलाते रहने के बराबर है। जैव विविधता बरकरार रही- 1996 से 2012 के दौरान 12.3 करोड़ हेक्टेअर भूमि को बचाया। 1.65 करोड़ छोटे किसानों और कृषक परिवारों की गरीबी दूर हुई, यानी कुल मिलाकर 6.5 करोड़ लोगों का भला हुआ। स्रोत: आईएसएएए

7. यदि लोगों को प्रभावित करने वाली प्रत्येक प्रौद्योगिकी लागू करने से पहले एक सामाजिक बहस शुरू करनी है तो फिर उन तमाम टैक्नोलॉजीज का क्या जो शहरी लोग इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ  एक ऐसी प्रौद्योगिकी को ही अलग क्यों किया जाये जो कि 60 प्रतिशत उस आबादी की मददगार है जो खेती पर निर्भर है? उस टैक्नोलॉजी पर ही सवाल क्यों जो हमारे किसानों के परिश्रम और कठिनाइयों को कम करती है? यह हमारी सरकार के लिए एक अच्छा आइडिया होगा कि विभिन्न भागीदारों को शामिल करके एक ऐसा मंच तैयार किया जाये जहां देश के लिए जरूरी प्रौद्योगिकियों पर आंकड़ों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर बहस करायी जाये।

8. दस वर्ष पहले डॉ. एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित एक समिति द्वारा तैयार मसौदे के आधार पर भारत सरकार ने एक लिखित बायोटैक पॉलिसी तैयार की, जो सीधे-सीधे तौर पर कहती है कि फूड क्रॉप्स सहित हर तरह की फसलों के लिए जीएम टैक्नोलॉजी के पक्ष में है, सिर्फ  बासमती चावल को छोडक़र। पॉलिसी डॉक्युमेंट में इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर अन्य किसी तरह के प्रतिबंध की बात नहीं है। वर्ष 2010 से पॉलिसी और उसके अमल करने के बीच एक बड़ा गैप रहा है, जिससे कोई प्रौद्योगिकी लागू करने, निवेश और वैज्ञानिक काम को आगे बढ़ाने पर असर पड़ा है। भारत सरकार जीएम टैक्नोलॉजी संबंधी जन संस्थानों पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करती है। यदि सरकारी नीति और उसका निवेश एक दिशा में हो रहा है और उसको अमल में लाने की दिशा दूसरी है तो हम शोधकर्ताओं, निवेशकों, कॉर्पोरेट्स और बायोटैक छात्रों को क्या संदेश दे रहे हैं जो कि इस टैक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। समाज के इस वर्ग का तो पूरी तरह से हतोत्साहन ही हो रहा है। यदि हम जेनेटिक मॉडिफिकेशन या कृषि में बायोटैक्नोलॉजी के प्रयोग पर रोक लगाते हैं तो यह इस क्षेत्र संबंधी शिक्षा, अनुसंधान और कॉमर्स के लिए मौत का संदेश है, क्योंकि यह बायोटैक पॉलिसी के विरुद्ध है।

9. फिर तो यह प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में आईसीएआर की स्थापना दिवस पर दिये गये भाषण के भी विपरीत है जिसमें उन्होंने टैक्नोलॉजी को किसानों तक सरल तरीके से पहुंचाने का आह्वान किया था और प्रति बूंद अधिक फसल का नारा भी दिया था। श्री मोदी ने कहा था, हमें ऐेसे तरीके खोजने होंगे जिससे कि कम जमीन पर और कम समय में अधिक उत्पादन संंभव हो और वो भी बिना क्वालिटी से समझौता किये।

जीएम स्पेस में कई ऐसे टैक्नोलॉजिकल ट्रेट मौजूद हैं जो कि सूखा, लवणता, खाद पर उच्च सब्सिडी, कृषि उत्पादन में सुधार जैसे विषयों में आगामी वर्षों में भारत के लिए काफी उपयोगी हो सकते हैं। बढ़ती आबादी की बदलती भोजन संबंधी आदतों को पूरा करने के दौरान अगले 10-15 वर्षों में भारत में दालों और तैलीय बीजों की भारी कमी होने जा रही है। फार्म लेबर में भारी कमी होने जा रही है जिससे कम मेहनत के काम करने वाली टैक्नोलॉजीज की जरूरत महसूस होगी। धान की रोपाई में हम बहुत अधिक मात्रा में पानी प्रयोग करते हैं सिर्फ खरपतवार दूर रखने के लिए। पानी जल्द ही एक लगजरी बनने जा रहा है जो हमारी पहुंच से दूर होता जायेगा। हमें धान की खेती के अन्य तरीके खोजने होंगे और खरपतवार दूर करने के लिए टैक्नोलॉजी विकसित करनी होंगी ताकि पानी को हम दूसरी फसलों में प्रयोग कर सकें। देश में पैदा की जाने वाली फसलों, जीएम टैक्नोलॉजी की मदद से पैदा होने वाली प्राथमिक फसलों, प्रमुख जीएम ट्रेट आदि के बारे में गंभीर रूप से बहस कराये जाने की जरूरत है। उन क्षेत्रों की भी चर्चा होनी चाहिए जहां जीएम टैक्नोलॉजी की जरूरत ही नहीं है या जहां यह प्रतिबंधित रहनी चाहिए।

10. देश के प्रतिष्ठित संस्थानों को नीचा दिखाने से किसी को भी अपने गलत मंसूबों में कामयाबी नहीं मिलने वाली। तथ्यों का महत्व है, न कि किसी संगठन की मनमानी का। जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी, बायोटैक्नोलॉजी विभाग, कृषि मंत्रालय और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति सभी ने देश में जीएम टैक्नोलॉजी अपनाने की संस्तुति की है। वैज्ञानिक परीक्षण वैज्ञानिकों और सरकार द्वारा स्थापित वैज्ञानिक संगठनों को करना चाहिए।

11. किसी भी किसान या जीएम टैक्नोलॉजी की वकालत करने वाले किसी वैज्ञानिक को किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का एजेंट नहीं बताना चाहिए। वैश्वीकरण के चलते अधिकांश कार्पोरेट अन्य देशों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एजेंट होने जैसे आरोप सिर्फ कृषि मामलों में ही क्यों, अन्य सेक्टर्स में क्यों नहीं?

12. जीएम टैक्नोलॉजी के पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रभावों के बारे में यूके के ब्रूक्स एवं बारफुट ने कई अध्ययन किये हैं। उनके अनुसार इससे 1.44 करोड़ छोटे किसानों को बहुत अधिक लाभ हुआ है। कीटनाशकों के प्रयोग में 9 प्रतिशत कमी हुई है। इसके अलावा भी कई लाभ हुए हैं। पिछले साल, ब्राजील एवं चीन ने नवीन टैक्नोलॉजीज को हरी झंडी दी है – जो कि उत्पादन और फूड प्रोसेसिंग संबंधी हैं। अमेरिका और सब-सहारन अफ्रीका में किसानों को अगले 12 माह में सूखा रोधी मक्का के बीज मिल जायेंगे, जबकि भारत में सूखा पीडि़त किसानों के सामने कोई विकल्प नहीं है।

13. भारत में बीटी कॉटन की पांच टैक्नोलॉजी अमल में लायी जा रही हैं, जिसमें से एक मोनसेटो की है, दो भारतीय कंपनियों की, एक चीन की और एक सीआईसीआर की है। जीन का मार्केट शेयर कई बातों पर निर्भर करता है जिनमें जमीन पर इसकी क्रियाशीलता जैसा फैक्टर भी शामिल है। इस पर बाजार की ताकतों का भी प्रभाव होता है। भारत में बीटी दो रूपों में मिलती है- हाइब्रिड और ओपन पॉलिनेटेड वैराइटी। यहां हम स्पष्ट कर दें कि बीटी कॉटन सीड या कुछ सब्जियों को छोडक़र किसी भी तरह के बीज आयात नहीं किये जाते और इनका उत्पादन भारत में ही होता है। बीटी कॉटन के बीज शत प्रतिशत भारत में ही पैदा होते हैं। करीब 95 प्रतिशत बीटी कॉटन सीड भारत की छोटी और मंझोली कंपनियों द्वारा विकसित किये जाते हैं। सिर्फ पांच प्रतिशत बीज भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां तैयार करती हैं।

यह टैक्नोलॉजी रोजगार पैदा करती है, कृषि उत्पादन बढ़ाती है और भारतीयों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाती है। यह एक मिथ्या धारणा है कि टैक्नोलॉजी प्रदाता को किसी तरह की रॉयल्टी मिलती है फिर चाहे वो आईटी हो, फार्मा सेक्टर हो या जीएम टैक्नोलॉजी हो। असली परीक्षा तो बाजार में होती है, जहां ग्राहक तय करता है कि उसे किसी उत्पाद के लिए कितनी राशि देनी चाहिए।

14. जन संस्थानों में काफी अधिक रिसर्च हो चुकी है। नौ फसलों और 50 से अधिक ईवेंट्स में से 50 प्रतिशत पब्लिक इंस्टीट्यूशंस से ही हैं। यदि हम भारतीय पब्लिक सेक्टर को इस क्षेत्र में प्रोत्साहित करना चाहते हैं, जैसा कि चीन में होता है, तो हमें उनको अपना प्रोडक्ट डीरेगुलेट करने के मामले में पूरा सहयोग देना होगा। यदि हमेंं शोषण और एकाधिकार जैसी बातों का भय है तो भविष्य की फसलों और ट्रेट्स के बारे में हमें उचित नीतियां बनानी चाहिए। इसक ा मुकाबला करने का अच्छा तरीका यह है कि बाजार में कम्पीटीशन को बढ़ावा दिया जाये।

15. अंत में हम अपने रेगुलेटरी सिस्टम की बात करते हैं। अरुणा रोड्रिग्स बनाम भारत सरकार के हालिया मामले में केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दिये शपथपत्र के मुताबिक, सरकार का मानना है कि फील्ड ट्राइल्स नियंत्रित करने और सुरक्षा नियमों को लागू करने की मौजूदा प्रणाली विज्ञान आधारित है, मजबूत है और अंतर्राष्ट्रीय चलन के अनुरूप है। इसके अलावा, रेगुलेटरी सिस्टम में सुधार एक डायनेमिक प्रोसेस है जो कि विज्ञान की प्रगति पर निर्भर करती है। भारत सरकार वैज्ञानिक प्रगति को नियमित तौर पर निगाह में रखने और रैगुलेटरी सिस्टम को अपडेट करने के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन देश में बिना अनुसंधान और विकास रोके। यह स्पष्ट है कि रेगुलेटरी सिस्टम का सुधार एक सतत प्रक्रिया है क्योंकि अनुसंधान निरंतर चलता रहता है। हमारा रेगुलेटरी सिस्टम दुनिया में लागू सर्वश्रेष्ठ सिस्टम्स के समकक्ष है।

खुली बहस का समर्थन करते हुए हमारा कहना यह है कि टैक्नोलॉजी के वैज्ञानिक असेसमेंट को खुली बहस के दायरे में नहीं लाना चाहिए। यह कार्य सरकार द्वारा गठित वैज्ञानिक संगठनों को करने देना चाहिए। आरसीजीएम और जीईएसी जैसे वैज्ञानिक संगठनों की अवहेलना करने की बजाये उनको मजबूती देनी की जरूरत है। वैज्ञानिक असेसमेंट पूरा होने के बाद बहस हो सकती है।

बैंगन भारत में काफी अधिक खाई जाने वाली एक सब्जी है। इसमें फल व तने को छेदने वाला कीड़ा अधिक लगता है। इसे कीटनाशकों की अत्यधिक आवश्यकता होती है- 20-25 स्पे्र प्रति सीजन और पश्चिम बंगाल में तो 75 स्पे्र तक। इस फसल में बीटी जीन डालने का मकसद यह था कि कीड़ा लगने से रोका जाये। बीटी ब्रिजाल किस्म उगाने पर कीटनाशकों में 70 प्रतिशत तक बचत होती है। इससे किसानों को अधिक फसल मिल पाती है और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी समाप्त होता है। इससे उनकी माली हालत बेहतर होती है। ग्राहकों को भी ऐसे बैंगन मिलते हैं जिन पर कीटनाशक नहीं छिडक़े होते हैं और जिनमें कीड़े भी नहीं होते।

श्री जयराम रमेश ने 2010 में बीटी बैंगन पर मोरेटोरियम लागू करते वक्त जीईएसी से कहा था कि प्रौद्योगिकी के और अधिक मूल्यांकन के लिए अतिरिक्त परीक्षण तय करे। यह जीईएसी द्वारा बीटी ब्रिंजाल को पर्यावरणीय सहमति देने के बाद की बात है। चार वर्षों से ये अतिरिक्त परीक्षण तय नहीं किये जा सके हैं। इसके विपरीत अीईएसी ने बायोसेफ्टी टैस्टिंग की परख पहले ही कर ली थी। अधिक आंकड़े मांगना गलत नहीं है लेकिन अतिरिक्त ट्रायल को डिफाइन न करना टैक्नोलॉजी विरोधी है। नतीजा यह हुआ कि पिछले चार वर्षों से जीएम क्रॉप्स पर अनुसंधान एवं विकास का कार्य एकदम से ठप पड़ा हुआ है। यदि अब भी टैस्ट किये जाने बाकी हैं तो क्या जीईएसी इन्हें डिफाइन करेगी या 2014 में हुए परीक्षणों की उपयोगिता पर बयान जारी करेगी?

 

आइए, श्री जयराम रमेश के  उन चार मूल मुद्दों  पर निगाह डालें, जो उन्होंने मोरेटोरियम लागू करते वक्त उठाये थे:

 

1. राज्य सरकारें अपनी अपनी पार्टियों के हिसाब से निर्णय ले रही हैं और बाजारीकरण में मदद नहीं कर रही हैं। यह जान लेना रोचक होगा कि केंद्र सरकार ने राज्यों से वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित एक डायलॉग पर बात करते समय क्या प्रयास किये थे, जबकि राज्य सरकारें एकतरफा तरीके से राजनीतिक आधार पर काम रही थीं और विरोध करने वालों की मिथ्या बातों को महत्व दे रही थीं।

2. दूसरे, इस मामले में घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक समुदायों में एकराय नहीं बन पा रही है। हम सदियों से देखते आये हैं कि अक्सर किसी आविष्कार, अनुसंधान या एप्लीकेशन पर संपूर्ण एकमत नहीं बन पाता है। रेगुलेटरी बॉडीज द्वारा लिये गये किसी निर्णय में वैज्ञानिक समुदाय का पूर्ण बहुमत देखना जरूरी नहीं है, वो भी जीएम टैक्नोलॉजी जैसे मामले में जहां कि मतभेद होना स्वाभिक है। हमारी रेगुलेटरी बॉडीज में अनुभवी वैज्ञानिक हैं। सवाल यह उठता है कि आप किस पर भरोसा करते हैं?

बांगलादेश ने बीटी ब्रिंजाल उगाने की अनुमति दे दी है। क्या हम जानते हैं कि वहां स्थानीय या अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जगत की आम सहमति को तरजीह दी गयी या नहीं?

3. इस बात पर चिंता कि बीजों की आपूर्ति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी एक ही बहुराष्ट्रीय कंपनी का एकाधिकार तो नहीं हो जायेगा? बीटी ब्रिंजाल एप्लीकेशन एक भारतीय कंपनी – मेहिको ने विकसित की थी। इस प्रोजेक्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, धारवाड़ तथा तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, कोयम्बटोर की भागीदारी थी। हाइब्रिड और ओपी वैरायटीज के बीटी जीन जारी किये जाने का प्रस्ताव था। जीन भले ही विदेशी था, परंतु बीज उत्पादन का पूरा कार्य भारतीय कंपनी और यहां के दो विश्वविद्यालयों के पास था। ऐसे में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का एकाधिकार होने का कोई खतरा नहीं था।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हमारी कृषि को कब्जे में लेने का हौवा जनता को भ्रमित करने के लिए दिखाया जाता रहा है और इसका कोई तार्किक आधार नहीं है। भारत में कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी बीजों या बायोटैक्नोलॉजी संबंधी व्यापार नहीं करेगी ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। जब कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी किसी स्थानीय बीज कंपनी को किसी जीन का लाइसेंस देती है तो ऐसा सिर्फ  एक बार किया जाता है वो भी डोनर सीड के जरिये। ऐसे में जीन देनी वाली विदेशी कंपनी के हाथ में हमारी बीज उत्पादन प्रणाली को नियंत्रित करने का कोई खतरा नहीं होता। बांगलादेश पहला ऐसा देश हो गया है जिसने एनसीबी के जरिये बीटी ब्रिंजाल की चार वैरायटी को कमर्शियल लेवल पर उगाने की पहल की है। बांगलादेश एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने मेहिको के प्रोप्राइटरी राइट्स वाले जीन से 30 अक्टूबर 2013 को ऐसा किया।

4. इस केस में एक सहमति वाले प्रोटोकॉल के तहत और एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी की निगरानी में और अधिक टैस्ट और ट्राइल्स किये जाने की जरूरत है ताकि बड़े स्तर पर एकमत हुआ जा सके।

यदि अधिक ट्राइल्स की जरूरत थी तो पिछले चार वर्षों में इसके बारे में बात क्यों नहीं की गयी? ऐसा क्यों कहा गया कि जीईएसी एक स्वतंत्र संस्था नहीं है और किसी अन्य स्वतंत्र नियामक संस्था की जरूरत है? यदि ऐसा है तो जीईएसी द्वारा अनुमोदित जीएम वैक्सीन एवं अन्य दवाओं पर हम कैसे भरोसा करें? जीईएसी को सिर्फ कृषि जैव प्रौद्योगिकी एप्लीकेशंस के लिए ही स्वतंत्र नहीं माना गया?

आखिर में श्री रमेश ने कहा, भारत को इस क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए पब्लिक सेक्टर आरएंडडी तथा पब्लिक सेक्टर सीड इंडस्ट्री को मजबूत करना जरूरी है। अमेरिकी एप्रोच परमीशन की है तो यूरोपीय एप्रोच रोक लगाने वाली है। सावधानी के नाते मोरेटोरियम बीच का रास्ता है। – इसमें कोई संदेह नहीं कि पब्लिक इंस्टीट्शंस 2010 के पहले जीएम टैक्नोलॉजी के विकास में काफी अधिक निवेश करते आये हैं। सरकार ने जीएम पर अनुसंधान पर रु. 8,000 करोड़ का निवेश किया है। रेगुलेटरी प्रोसेस में 50 प्रतिशत से अधिक ईवेंट्स पब्लिक इंस्टीट्यूशंस की हैं। यह पहले से ही चला आ रहा है। अगर सरकार पब्लिक इंस्टीट्यूट्स को इस मामले में प्रोत्साहित ही करना चाहती है तो उसे रेगुलेटरी सपोर्ट देनी चाहिाए और इनके  उत्पाद को बाजार में लाने में मदद करनी चाहिए। इंडस्ट्री इसका स्वागत करेगी। यूरोप की मिथ्या धारणा को प्रचारित नहीं करना चाहिए। पांच यूरोपीय देशों ने जीएम क्रॉप्स उगाने की मंजूरी दी हुई है। यूरोपीय लोग हर साल विविध जीएम फूड प्रयोग में लाते हैं जैसा कि यूरोपियन फूड सेफ्टी कमीशन की वेबसाइट पर एप्रूव्ड जीएम फूड्स की सूची देखने से पता चलता है।

श्री जयराम रमेश ने डॉ. स्वामीनाथन के जिन पत्रों का जिक्र किया, इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं मिल सका है कि सरकार ने उन पर ध्यान दिया कि नहीं। यदि डॉ. स्वामीनाथन जैसे एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक ने बीटी ब्रिंजाल को एप्रूव किये जाने से पूर्व कुछ कदम उठाये जाने की सलाह दी थी तो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को उस पर अमल करना चाहिए था।

यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक भाषण में भी जिक्र था कि जीएम फूड्स को पुख्ता वैज्ञानिक आधार पर एक उचित नियामक संस्था के नियंत्रण में प्रयोग किया जाना चाहिए।

डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. मनमोहन सिंह दोनों ने ही तथ्य जुटाने और जीएम फूड क्रॉप्स पर निर्णय लेने से पहले पूरी तसल्ली कर लेने की वकालत की थी। इस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती। यहां तक कि इंडस्ट्री भी नहीं चाहती कि बिना परीक्षण और आम राय के जीएम टैक्नोलॉजी लागू की जाये। लेकिन ये कदम पूरी पारदर्शिता, स्पष्ट उद्देश्य और तीव्रता से उठाये जाने चाहिए। इस संदर्भ में पिछले चार वर्षों की रुकावट और ट्राइल्स की मंजूरी में मौजूदा सुस्ती को सही नहीं माना जा सकता। यदि हम ट्राइल नहीं करेंगे तो प्रौद्योगिकी खत्म हो जायेगी।

श्री रमेश को भी यह पता होगा कि फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए टैक्नोलॉजी और पारंपरिक प्लांट ब्रीडिंग को मिलाना जरूरी है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि जीएम टैक्नोलॉजी के प्रयोग से हाई प्रायोरिटी ट्रेट्स विकसित किये जायें, क्योंकि पारंपरिक प्लांट ब्रीडिंग में शायद बहुत अधिक समय लगे या उसमें इसका समाधान न मिले। हम जीएम को एक सिल्वर बुलेट की तरह नहीं चाहते। यह हमारी खाद्य सुरक्षा के समाधानों के पैकेज का महज एक हिस्सा है।

 

एबलएजी के बारेमें

एबल-एजी यानी एसोसिएशन ऑफ बायोटेक लैड एंटरप्राइजेस – एग्रीकल्चल ग्रुप भारत की प्रमुख बायाटेक कंपनियों की एक एसोसिएशन है, जोकि सरकार, उद्योग, शैक्षणिक व अनुसंधान संस्थाओं, तथा घरेलू एवं विदेशी निवेशकों के बीच एक मंच का कार्य करती है। एबल-एजी अनुसंधानकर्ताओं, सरकार तथा बायोटैक इंडस्ट्री के साथ गठजोड़ से भारत में बायोटैक्नोलॉजी की गति को तेज करना चाहती है। एबल-एजी के सदस्यों में भारतीय कंपनियां -एडवांटा, जेके, मेहिको, मेटाहेलिक्स, रासी सीड्स, बायोसीड्स, नाथ, तथा विदेशी कंपनियां -बेयर, बीएएसएफ, डेवजेन, डॉव, डूपोंट पायोनियर, मोंसेंटो, सिंजेंटा आदि शामिल हैं, जिनका फोकस आज कृषि का महत्व बढ़ाने और कल को लैब-टू-फार्म हेतु नये कदम उठाने पर है।

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