लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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प्रवीण दुबे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अगर समझना है तो पूर्व सरसंघचालक श्री कुप्प. सी. सुदर्शन के व्यक्तित्व और कृतित्व का अध्ययन कीजिए, उनके जीवन में वह सारी बातें निहित हैं जो संघ में हैं। कई बार संघ पर तरह-तरह के आरोप लगते रहते हैं। कोई संघ को सांप्रदायिक कहता है तो कोई कट्टरवादी कोई इसे एक खास राजनैतिक दल के लिए कार्य करने वाला संगठन निरुपित करता है। इन सारे आरोपों का जवाब अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सुदर्शन जी ने दिया वे कभी भी इस विवाद में नहीं पड़े कि संघ पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं परन्तु उन्होंने एक-एक आरोप का जवाब अपने कार्यों से दिया। अभी कुछ ही दिन पूर्व की घटना है जब भोपाल में र्ईद के दिन सुदर्शन जी ने ईद की नमाज पर मस्जिद में जाकर मुसलमानों को ईद की बधाई देने की इच्छा जाहिर करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। इतना ही नहीं संघ में सुदर्शन ही जी थे जिन्होंने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह प्रसंग कोई मामूली घटनाक्रम नहीं कहा जा सकता वह भी संघ के परिपेक्ष्य में, यह जवाब है उन लोगों को जो संघ को सांप्रदायिक और कट्टरवादी कहकर उसे अछूत मानते रहे हैं और संघ को समाज से काटने का प्रयास करते रहे हैं। वास्तव में संघ न तो सांप्रदायिक है न कट्टरवादी वह तो सभी देशवासियों को राष्ट्रप्रेम जागृत करने का संदेश देता है। यदि संघ सांप्रदायिक होता तो संघ के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्त होने वाले सुदर्शन जी न तो ईद की नमाज पर मस्जिद में जाकर मुसलमानों को बधाई देने की बात करते और न ही राष्ट्रीय मुस्लिम मंच जैसे संगठन का वे निर्माण करते। सुदर्शन जी का तर्क था कि ईश्वर की इबादत से कौन सा मजहब रोकता है। इसके बाद सुदर्शन जी ने शहरकाजी और कुछ अन्य मित्रों के घर जाकर ईद की मुबारकवाद दी। मुझे अच्छी तरह याद है 15 अगस्त 2010 का वह दिन जब सुदर्शन जी ग्वालियर प्रवास पर थे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच द्वारा अखंड भारत दिवस के अवसर पर ‘मादरे वतन हिन्दुस्तान से मोहब्बत मुसलमानों का दिली जज्बाÓ विषय पर सुदर्शन जी का व्याख्यान था। इस व्याख्यान का एक-एक शब्द आज भी याद आता है कितना गहरा अध्ययन और चिंतन था उनका वे विषय पर एक घंटे बोले और वे जो बोले शायद ऐसे लोगों को पसंद न आया जो संघ को सांप्रदायिक और कट्टरवादी से ज्यादा कुछ नहीं मानते। सुदर्शन जी ने उस व्याख्यान में कहा था भारत विभाजन के लिए लोग मोहम्मद अली जिन्ना को दोष देते हैं लेकिन यह आधा सच है। जानकार यह आश्चर्य होगा कि भारत विभाजन में महात्मा गांधी की भूमिका थी। अगले दिन समाचार पत्रों में सुदर्शन जी के इस व्याख्यान का तरह-तरह से विश्लेषण छपा और सभी ने इस बात के लिए सुदर्शन जी की सराहना की कि उन्होंने इतने संवेदनशील विषय को इतने सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया। वह सुदर्शन जी ही थे जिन्होंने कई मौकों पर अपनी बेबाक राय से हलचल पैदा की और तमाम विरोधों के बावजूद अपनी बात पर कायम ही नहीं रहे बल्कि अपने तर्कों और तथ्यों से उसे सही भी ठहराया।

सुदर्शन जी एक महान चिन्तक और लेखक भी थे शायद ही कोई विषय ऐसा हो जिस पर सुदर्शन जी का गहरा अध्ययन न हो। तथ्यों के साथ वे अपनी बात को रखते थे और जो सही होता था वह कहने में नहीं घबराते थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उनका जीवन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि एक संघ को सच्चे और निष्ठावान स्वयंसेवक का जीवन कैसा होता है। उनके जीवन परिचय को पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से टेलीकम्युनिकेशन में बीटेक की डिग्री हासिल की। वे चाहते तो एक प्रतिभाशाली इंजीनियर बनकर आराम की जिंदगी जी सकते थे परन्तु उन्होंने भारतमाता की सेवा का कंटकाकीर्ण मार्ग चुना और अपनी सारी प्रतिभा राष्ट्र और संघ को समर्पित कर दी।

उनकी दिनचर्या स्वयंसेवकों के लिए ही नहीं सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायी थी। अंतिम सांस लेने से पूर्व भी सुदर्शन जी ने अपने नित्य कार्य यथावत पूर्ण किए वह प्रात: सैर पर गए लौटकर शाखा पर प्रार्थना की और योगासन, प्राणायाम करते समय अपनी देह त्याग दी। वास्तव में उनका जीवन व्यक्ति निर्माण की कुंजी था जो युगों युगों तक समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा।

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1 Comment on "संघ दर्शन की तरह है सुदर्शन जी का व्यक्तित्व"

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vinod
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