लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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संसद के मानसून सत्र को शुरू हुए लगभग पंद्रह दिन से ज्यादा हो चुके है। पर इन पंद्रह दिनो में संसद में क्या हुआ हम सब लोग जानते है। लोकसभा में जहा मानसून सत्र के पहले सप्ताह में विपक्ष के हंगामे के चलते कोर्इ कार्यवाही न हो सकी जिस के कारण लोकसभा का 47 प्रतिशत समय बरबाद हुआ। दूसरी ओर इसी हंगामे के कारण राज्यसभा का एक चौथार्इ यानी 36 प्रतिशत समय हंगामे और शोरगुल की भेट चढ गया। आज किसी भी सांसद को किसी भी राजनीतिक पार्टी को इस बात की जरा भी चिंता नही कि इन पंद्रह दिनो में देश का कितना नुकसान हुआ। इन माननीय सांसदो को संसद के एक एक मिनट की कीमत समझनी चाहिये क्यो कि देश की संसद की एक दिन की कार्यवाही पर लगभग 7.65 करोड रूपये का खर्च आता है। अंदाजा लगाया जा सकता कि इस मानसून सत्र में संसद में हंगामा कर विपक्षी दलो ने देश का फायदा किया या नुकसान। विपक्षी दलो के हंगामे से न केवल संसद के समय की बरबादी हुर्इ बलिक कर्इ महत्तवपूर्ण विधेयक समय पर पेश नही हो पाने के कारण देशवासियो की एक बडी गाढी कमार्इ पर इस हंगामे ने पानी फेर दिया। हमारे देश के माननीय सांसद आखिर क्यो हिंसा, बंद, शोर, शराबे पर विश्वास रखते है ये लोग तो बुद्विजीवी है फिर क्यो अपनी तर्क क्षमता का इस्तेमाल करना नही चाहते है।

अगर आप लोगो को याद हो तो विपक्ष के हंगामे के कारण 9 नवम्बर 2010 से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में भी कोर्इ खास कामकाज भी नही हुआ था। संसद के दोनो सदनो में 22 दिनो तक विपक्ष द्वारा केवल एक ही सीन दोहराया जाता रहा था ”हंगामा और शोर शराबे के इस सीन की देश को लगभग डेढ अरब कीमत चुकानी पडी थी। हमारी आने वाली पीढी इस से क्या सबक लेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर इस का क्या असर पडेगा ये विचारणीय मुद्दा है। माननीयो द्वारा संसद में बिना बात शोर शराबा मारपीट एक दूसरे पर अशोभनीय टिप्पणी ने जनता की उम्मीदो और विश्वास का हमेशा मखौल उडाया है। जनता के ये प्रतिनिधि भारतीय कानून और सरकार के दावा की किस प्रकार खुले आम धजिज्या उडाते है हम सब लोग टीवी पर लार्इव संसद से इस का रोज सीधा प्रसारण देखते है। ये लोग लोकतंत्र के मंदिर में बैठ कर जिस तरह से लोकतंत्र की मर्यादाओ को अपने पैरो तले रौदते है देख कर दुख होता है। शीतकालीन सत्र और इस मानसून सत्र के न चलने से देश को जो करोडो रूपये का नुकसान हुआ आखिर इस की जिम्मेदारी किस पर जाती है ये एक ऐसा सवाल है जो आने वाले दिनो में देश की जनता कांग्रेस और विपक्षी दलो से पूछ सकती है और देश के करोडो रूपये यू इस तरह बरबाद होने की जिम्मेदारी जरूर तय होनी चाहिये।

टु-जी स्पेक्ट्रस आवंटन, राष्ट्रमंडल खेलो में घोटाले के विरूद्व विपक्ष द्वारा संसद ठप किये जाने का मुद्दा कितना सफल या असफल रहा ये राजनीतिक दलो के बीच विवाद और प्रशंशा पाने का विषय जरूर हो सकता है। लेकिन देश की आम जनता और देश के लिये ये सरासर घाटे का मुद्दा साबित हो रहा। ये बात बुनियादी तौर पर एक दम सही है कि लोकतंत्र में विपक्ष को संसद में राजनैतिक कार्यवाही के जरिये सत्ता पक्ष के द्वारा किये गये गलत कार्या पर विरोध जताने का जायज हक है। क्यो कि इस से देश की आम जनता का कोर्इ खास ताल्लुक नही होता पर संसद ठप करने से देश और देश की जनता पर फर्क जरूर पडता है संसद ठप होने से देश की जनता की भावनाए अभिव्यक्त नही होती बलिक विपक्ष सत्ता पक्ष को अपनी ताकत का अहसास कराता है। आखिर ये हंगामा ये शोर शराबा विपक्ष द्वारा किस के लिये किया जा रहा है, देश के आम आदमी के लिये या फिर देशहित में शायद दोनो में से किसी के लिये नही, बिल्कुल नही।

बुनियादी बात यह है की हमारी संसद और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी ही इस लिये है कि तमाम मुद्दो पर सभ्य और लोकतांत्रिक तरीको से बैठ कर चर्च हो और फैसले लिये जाये। विधायी संस्थाए हमारे लोकतंत्र की सर्वोच संस्थाए है क्योकि यहा वे लोग होते है जिन्हे जनता चुनती है और जो जनता के प्रतिनिधि होने के नाते उस के प्रति जवाबदेह होते है। जाहिर है जनता यह कतर्इ नही चाहगी कि उन के प्रतिनिधि संसद भवन या विधान सभाओ में कुर्सिया, मार्इक, और जूते चप्पल फैके। दरअसल जनता जिस विश्वास के साथ अपना प्रतिनिधि चुनती है आजकल कुछ जनता के प्रतिनिधि उस विश्वास का खून कर रहे है। इन के इस अषोभनीय व्यवहार, शोर शराबे और हंगामे और घोटालो कें चलते लोकतंत्र का मनिदर मानी जाने वाली हमारी संसद का कीमती वक्त और जनता का करोडो रूपया रोज रोज संसद की कार्यवाही के नाम पर बर्बाद हो रहा है। वही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा भी संसद के ठप होने से आहत होती रहती है।

जिस देश का आम नागरिक मात्र 20 रूपये रोज कमाता हो उस देश की संसद की एक दिन की कार्यवाही पर करीब 7.65 करोड रूपये का खर्च आता है। संसद के दोनो सदनो और संसदीय कार्य मंत्रालय का वर्ष 2010-11 के लिये कुल बजट अनुमानत: 535 करोड रूपये है। और एक साल में संसद तीन बार यानी बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र के लिये बैठती है। सुखराम के संचार घोटाले को पीछे छोड शीतकालीन सत्र 2010 ने संसद ठप होने का दूसरा सब से बडा रिकार्ड बना था। पूर्व संचार मंत्री स्व सुखराम के कार्यकाल में 21 दिन संसद ठप रहने का रिकार्ड था। वही बोफोर्स कांड पर सब से ज्यादा 47 दिन संसद ठप रहने का सब से बडा रिकार्ड है। हर्षद मेहता के शेयर घोटाले पर संसद 17 दिन व केतन मेहता पारिख के स्टाक घोटाले ने 14 दिनो तक लोकतंत्र के मंदिर यानी हमारी संसद भवन का चीरहरण किया गया था। जब की विपक्ष द्वारा 7 दिन के हंगामे के बाद शीतल पेय में जहरीले तत्व के मामले पर जेपीसी बन गर्इ थी।

भ्रष्टाचार के कारण आज त्राही-त्राही मची है। देश और देशवासियो के हित और देश से भ्रष्टचार मिटाने के लिये अन्ना हजारे आमरण अनषन कर पहले और अब 16 अगस्त से सरकार को अपना विरोध भी दर्ज कर चुकने के साथ ही अन्ना देश हित में जान देने का भी ऐलान कर चुके है। पर जिन जनप्रतिनिधियो को संसद भवन में कुर्सी मिलने के साथ ही हर माह एक मोटी रकम वेतन के रूप में मिलती है, लाल बत्ती की गाडी, मुफ्त सफर, सुरक्षाकर्मी,केवल जनता की आवाज संसद में उठाने की एवज में मिले हो वो लोग गाधी जी के तीनो बंदरो की तरह आज व्यवहार कर रहे है। आज देश में फैला भ्रष्टचार और देश में दिन रात बढती मंहगार्इ इन्हे नजर नही आ रही, आज आम आदमी की आवाज इन्हे सुनार्इ नही दे रही। मुह इन्होने चुनाव जीतने के बाद से ही बन्द कर रखा है।

देश की संसद कुछ भ्रष्ट राजनेताओ के कारण हर रोज षर्मसार हो रही है जनता की खून पसीने की कमार्इ दिल खोलकर लुटार्इ जा रही है। संसद भवन आज राजनेताओ के लिये पिकनिक स्र्पोट बन चुका है। जनता की खून पसीने की गाढी कमार्इ जहा ऐशपरस्ती के लिये इस्तेमाल होती है। देश के सब से पुराने और आधार वाले राजनीतिक दल कांग्रेस के राज में इस प्रकार लूट मचार्इ हैरत में डालने वाली है। विपक्षी दलो को भी सोचना होगा कि इस प्रकार के हंगामं के कारण देश का कितना करोड रूपया व्यर्थ जा चुका है। संसद में हंगामे से देश का भला और कोर्इ हल निकलने वाला नही। हमारे देश के माननीय सांसद आखिर क्यो हिंसा, बंद, शोर, शराबे पर विश्वास रखते है ये लोग तो बुद्विजीवी है फिर क्यो अपनी तर्क क्षमता का इस्तेमाल करना नही चाहते इस मुद्दे पर अभी से हमे गंभीरता से सोचना होगा ताकि आने वाले समय में संसद कि गरिमा और देश का करोडो रूपया बचाया जा सके।

 

 

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