लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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नारियांे का परिवार और देश के विकास में योगदान कैसे हो, इस पर लोगों के अलग-अलग मत हैं। कुछ उनका स्थान घर बताते हैं, तो कुछ ‘लड़का-लड़की एक समान’ की बात कहते हैं।

पिछले दिनों महिलाओं को वायुसेना में लड़ाकू विमान उड़ाने की अनुमति मिली है। यद्यपि विमान तो वे काफी समय से उड़ा रही हैं; पर लड़ाकू विमानों को युद्ध के समय शत्रु सीमा में जाना होता है। ऐसे में विमान नष्ट भी हो सकता है। चालक की मृत्यु और गिरफ्तारी का भी खतरा रहता है। युद्धबंदियों के लिए यद्यपि ‘जेनेवा समझौते’ के अन्तर्गत नियम बने हैं; पर उनका पूरा पालन नहीं होता। 1965 और 1971 युद्ध के कई भारतीय बंदी आज भी पाकिस्तानी जेलों में शारीरिक और मानसिक यातना भोग रहे हैं। यद्यपि पाकिस्तान इसे नहीं मानता। फिर युद्ध के समय यदि महिला सैनिक गर्भवती हुई, तो उसकी तथा गर्भस्थ शिशु की रक्षा का क्या होगा ? बंदी होने पर मारपीट के साथ उनका यौन उत्पीड़न भी हो सकता है। अग्रिम मोर्चे पर तो शत्रुओं से प्रत्यक्ष हाथापाई करनी पड़ती है। क्या महिलाएं आमने-सामने की लड़ाई में पुरुष सैनिकों से लड़ेंगी ?

ये प्रश्न बड़े संवेदनशील हैं। किसी महिला से पूछें, तो वह ‘हम किसी से कम नहीं’ कहकर आपका मुंह बंद कर देगी। हो सकता है आप नारी विरोधी या पुरुषवादी घोषित कर दिये जाएं। यदि यह प्रश्न राजनीतिक रूप ले ले, तो किसी भी दल को लेने के देने पड़ सकते हैं। आंकड़े बताते हैं कि नीतीश बाबू को बिहार में इस बार महिलाओं के सर्वाधिक वोट मिले हैं। क्योंकि उन्होंने छात्राओं को साइकिलें दीं। पंचायत चुनाव में आधे स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कियेे तथा अपने सप्तसूत्री घोषणापत्र में सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत स्थान महिलाओं को देने की बात कही थी।

जहां तक शारीरिक शक्ति की बात है, तो लड़के और लड़कियों में कुछ अंतर होता ही है। इसीलिए उनकी खेलकूद प्रतियोगिताएं भी अलग होती हैं; पर बौद्धिक क्षमता में दोनों समान हैं। इसलिए कैसी भी शिक्षा पाने का उनका हक है। उसमें वे प्रायः लड़कों से टक्कर लेती और आगे निकलती दिखायी देती हैं। अर्थात वे कोई भी नौकरी या कारोबार कर सकती हैं। आजकल शिक्षा, चिकित्सा आदि बहुत महंगी हो गयी है। दिखावे में भी लाखों रुपये उठ जाते हैं। अतः बड़े शहरों में तो महिलाओं का काम करना जरूरी जैसा हो गया है; पर प्रकृति ने उन्हें संतानोत्पत्ति एवं बच्चों के पालन का विशेष काम और भी दिया है, जो पुरुष नहीं कर सकता। पैसा महत्वपूर्ण है, उसके बिना काम नहीं चलता; पर क्या बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल को छोड़ा जा सकता है ? ये प्रश्न प्रायः चर्चा में आते हैं।

पिछले दिनों रेल यात्रा में मेरे आसपास की कुछ महिलाएं यही चर्चा कर रही थीं। एक ने कहा कि वह और उसके पति बैंक में हैं। दोनों का कुल वेतन एक लाख से अधिक है। उन्होंने घरेलू काम के लिए अपने गांव के एक दम्पति को रखा हुआ है। वे बच्चों की देखभाल भी कर लेते हैं और बुजुर्गों की भी। हम उन्हें 30,000 रु. मासिक देते हैं। हमारे घर के पास ही उन्होंने किराये का मकान ले रखा है। शहर में रहने से उनके बच्चे ठीक से पढ़ रहे हैं। सुख-दुख में हम दोनों एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। हमारे बच्चे भी उन्हें चाचा-चाची कहते हैं। जब हम दोनों काम पर जाते हैं, तब उन दोनों में से कोई एक हमारे यहां जरूर रहता है। हमारे गांव के ही होने के कारण वे विश्वस्त भी हैं। इस प्रकार हमारी और उनकी, दोनों परिवारों की गाड़ी ठीक से चल रही है। यदि मैं नौकरी छोड़ दूं, तो उन्हें दिये जा रहे तीस हजार रु. तो बचेंगे; पर मेरे पचास हजार रु. भी मारे जाएंगे। इसलिए इस व्यवस्था से हम लाभ में ही हैं।

दूसरी महिला व्यापारी परिवार से थी। वह अपने बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल खुद करती थी। उसने कहा कि उसके यहां बर्तन, कपड़े और सफाई के लिए तीन महिलाएं अलग-अलग समय पर आती हैं। उन पर लगभग पांच हजार रु. महीना खर्च होता है। बर्तन वाली दो बार आती है, बाकी दोनों एक बार। ये तीनों महिलाएं कई घरों में जाती हैं। उनके पति मजदूर हैं। घरेलू काम से हम उन्हें रोजगार दे रहे हैं। इससे उन्हें दस-बारह हजार रु. महीना मिल जाते हैं, जिससे वे अपनी और परिवार की कई जरूरतें पूरी कर लेती हैं।

तीसरी महिला एक सरकारी विद्यालय में पढ़ाती थी। वेतन उसका भी अच्छा था। उसने कहा कि उसका विद्यालय घर से 25 कि.मी. दूर एक गांव में है। बस की व्यवस्था खराब होने से विद्यालय पहुंचने में देर हो जाती है; लेकिन ये हाल सभी अध्यापकों का है। सब शहर में रहते हैं और प्रायः देर से आकर जल्दी चले जाते हैं। वह भी सुबह का नाश्ता बनाकर ही घर से चलती है। विद्यालय में बच्चों को मिलने वाले दिन के भोजन की व्यवस्था भी देखनी पड़ती है। पढ़ाई तो बस नाम की है। सब बच्चे गरीब हैं। वे भोजन के लिए ही वहां आते हैं। उनके जाते ही हम भी चल देते हैं।

इस महिला का पति एक दुकान पर काम करता है। उसका वेतन काफी कम है। फिर भी दोनों मिलकर गुजारा कर लेते हैं; पर इसे अपने बच्चों और सास-ससुर की चिन्ता भी रहती है। जब वह घर पहुंचती है, तब जाकर खाना बनाती है। पति दिन में दस बजे जाकर रात को नौ बजे लौटता है। अतः सबके दिन के खाने की बड़ी अव्यवस्था है। उसने एक रहस्य की बात बताते हुए कहा कि विद्यालय में प्राचार्य सहित हम चार लोग हैं। हमने आपस में दिन बांट रखे हैं। इसके अनुसार दो लोग विद्यालय में जरूर रहते हैं। इस तरह सबको सप्ताह में चार दिन छुट्टी मिल जाती है। गांव सड़क से दूर है। जिला विद्यालय निरीक्षक को हर महीने एक निश्चित राशि पहुंच जाती है, जिससे कोई निरीक्षण करने न आये।

बैंक वाली महिला ने पूछा, ‘‘सरकार तुम्हें जिस काम का वेतन दे रही है, तुम उसे पूरा नहीं करती। इससे बच्चों का भविष्य भी बिगड़ता है। तुम्हें ये खराब नहीं लगता ?’’ अध्यापिका बोली, ‘‘खराब तो लगता है; पर क्या करें ? घर भी देखना है और नौकरी भी। काम न करें, तो पेट कैसे भरे और अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएं ? हमारे यहां सड़क से दूर के सब विद्यालयों में ऐसा ही होता है।’’women power

फिर इस अध्यापिका ने एक बड़ा मौलिक सुझाव दिया। उसने कहा कि आजकल लड़कियां कैरियर के चक्कर में शादी देर से करती हैं। यदि कक्षा आठ तक की शिक्षा पूरी तरह 38 से 40 वर्ष की महिलाओं को दे दी जाए, तो परिवार और विद्यालय दोनों के साथ न्याय हो सकता है। उसने इसे एक उदाहरण से समझाया।

माना गीता ने 20 वर्ष की अवस्था में स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की। फिर उसका विवाह हो गया। अगले दस साल में उसके तीन बच्चे हुए। 38 की आयु तक उसने बच्चों की ठीक से देखभाल की। इस समय तक सब बच्चे विद्यालय जाने लगेंगे। सबसे बड़ा कक्षा नौ या दस में तथा सबसे छोटा चार या पांच में होगा। अर्थात वे इतने बड़े हो जाएंगे कि दो-चार घंटे मां के बिना रह सकें। सबसे बड़ा लड़का या लड़की मां की अनुपस्थिति में बाकी दोनों को संभाल लेगा।

38 वर्ष की अवस्था में गीता आवेदन करे और उसे किसी निजी या सरकारी विद्यालय में काम मिल जाए; पर इतने साल पढ़ाई से दूर रहने के कारण पहले वह एक साल का बी.टी.सी. या बी.एड. जैसा कोई प्रशिक्षण ले। अगले 20 साल, अर्थात 60 वर्ष की अवस्था तक वह पढ़ाये। 20 साल परिवार की देखभाल से बच्चे संस्कारित हो जाएंगे और अगले 20 साल नौकरी से आर्थिक स्थिति भी ठीक हो जाएगी। अभी तो लड़कियों को लगता है कि जल्दी शादी करने से उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी; पर यदि 40वें वर्ष में भी इसकी गारंटी हो, तो वे समय पर विवाह कर सकती हैं। महिलाओं के लिए 20 से 30 वर्ष तक गर्भधारण का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। इसके बाद नौकरी के कारण मातृत्व अवकाश की भी जरूरत नहीं होगी।

इस प्रकार महिलाएं परिवार और नौकरी दोनों में संतुलन बना सकती हैं। यद्यपि महिलाएं सब कुछ कर सकती हैं; पर बच्चों को पढ़ाने का काम उनसे अच्छा कोई नहीं कर सकता। क्योंकि बच्चों से प्रेम का गुण उन्हें प्रकृति ने ही दिया है। बच्चे भी महिला अध्यापक से पढ़ने में सहज अनुभव करते हैं।

यह सुझाव मुझे बहुत अच्छा लगा; पर मेरे एक मित्र का कहना है कि इससे अपने बच्चों की देखरेख तो हो जाएगी; लेकिन जब महिला काम पर जाने लगेगी, तो बुजुर्ग उपेक्षित हो जाएंगे। फिर कक्षा आठ तक यदि केवल महिला अध्यापक ही नियुक्त होंगी, तो बड़ी संख्या में पुरुष बेरोजगार रह जाएंगे। व्यस्क पुरुष की बेरोजगारी वयस्क महिला की बेरोजगारी से अधिक दुखदायी है। इससे अनेक सामाजिक समस्याएं उठ खड़ी होंगी।

खैर, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। फिर भी यह विषय विचारणीय है। हमारी मानव संसाधन मंत्री भी एक महिला हैं। यदि वे इस पर देशव्यापी चर्चा कराएं, तो कुछ सुपरिणाम निकल सकता है।

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