लेखक परिचय

संचित पुरोहित

संचित पुरोहित

स्वतंत्र लेखक एवं ब्लॉगर

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भारत में मोबाईल के उपयोगकर्त्ताआंे की संख्या में लगातार बढोतरी हो रही है । जून, 2017 तक भारत में 42 करोड से भी अधिक मोबाईल उपभोक्ता हो चुके हैं । प्राथमिक तौर पर देखने और सुनने में ऐसा लगता है कि हमारे वतन में एक संचार क्रांति जन्म ले चुकी है और उसका निरंतर विकास हो रहा है । लेकिन इसके पीछे जारी ऑंकडों पर एक नजर डालने से पता चलेगा कि वास्तव में विकास की धारा उतनी अनुकूल नहीं है । एक समाचार पढकर काफी हैरानी हुई कि हमारे वतन के मोबाईल उपयोगकर्त्ताओं का एक बडा वर्ग जिसमें अधिकतर अवयस्क हैं, इस संचार क्रांति का दुरूपयोग पॉर्न साहित्य देखने में कर रहे हैं । यह ऑंकडा काफी तेजी से आगे बढ रहा है क्योंकि टेलीकॉम इंडस्ट्री में परस्पर गलाकाट स्पर्धा के चलते डाटा काफी सस्ता हो चला है । अवयस्क तत्वों की मोबाईल पर आसानी से उपलब्धता इस मनोरंजन को कई गुना लोकप्रिय बना चुकी है, जिसका सीधा असर दूरसंचार कंपनियों के राजस्व पर पड रहा है । टेलीकॉम सेक्टर में इसी प्रकार के बढते राजस्व से हम सबको संचार क्रांति की गलतफहमी का बोध होता है और हम विकास का ढिंढोरा पीटने लग जाते हैं ।

वास्तव में हमारे वतन के नादान हाथों में एक ऐसा खिलौना पकडा दिया गया है, जिससे चाहकर भी मोह छूटना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है । हमने प्रारंभ से ही देखा है कि हमारे मनोरंजन और उपयोग के लिये आसानी से सुलभ होने वाली वस्तुओं के उपयोग के परिणाम प्रतिकूल ही रहे हैं । इतिहास गवाह है कि नादान को यदि स्वच्छंदता दी जाय तो वह सर्वप्रथम अनीति की राह पर ही कदम उठाते हैं ।

संचार क्रांति के पक्ष में लंबे-चौडे व्याख्यान देने वाले जानकार तो अपनी बातों में मोबाईल के सदुपयोग और दुरूपयोग की बातें बताते ही हैं, जिनको अमल मंे लाकर वास्तव में संचार क्रांति लाई जाना संभव है, लेकिन जन-साधारण का नादान मन छोटे से मोबाईल उपकरण में केवल अपना मनोरंजन ही खोजता है । हो सकता है टेलीविजन देखने वालों की संख्या में इसी वजह से कमी आई हो । क्योंकि नादान जनता अपनी निजता के हनन से बचने के लिये एक कोने में बैठकर मोबाईल के उपयोग में सिद्धहस्त है । यह ऑंकडा महानगरों की तुलना में गॉंवों और छोटे-छोटे कस्बों में बडी तेजी से बढ रहा है ।

दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा फ्री मंे दिये जा रहे डेटा का इस्तेमाल इस कदर बढ गया है कि लोग अपने जरूरी ऑडियो और वीडियो को डाउनलोड करके जरूरत पडने पर उसे दोबारा देखने-सुनने की बजाय बार-बार ऑनलाईन देखना पसंद कर रहे हैं । क्योंकि उनके पास देखने लायक इतना अधिक मटेरियल उपलब्ध है कि वे उसे डाउनलोड कर अपने छोटे से मोबाईल की स्टोरेज कैपेसिटी को खराब नहीं करना चाहते । फ्री डेटा जो उपलब्ध है, जब चाहा दोबारा देख लिया ।

आखिर हम किस विकास की गति पर दौड रहे हैं और कैसा विकास चाहते हैं । इस तरह से वतन के भूभाग का एक बडा वर्ग जिसको उपभोक्ता कहते हैं, वह ऑंखें मूॅंदे स्वप्न की अंधी दुनिया में विचरित हो रहा है और अपने आपको अच्छी तकनीक का जानकार समझने की गलतफहमी पाले हुए है । ऐसा वर्ग एक हिसाब से अपने आप में मगन रहकर दीन-दुनिया से अलग-थलग ही होता है, जिसे वतन की आबादी में जोडने का मतलब है, वतन के लिये अनुत्पादक बोझ जोडना ।

डेटा की बढती खपत में वतन का ग्रामीण इलाका महानगरों को पछाडता जा रहा है । चूॅंकि फ्री डेटा की कीमत में बढोतरी होना फिलहाल संभव नहीं दिखता, इसलिये यह अवधारणा और मजबूत होने वाली है ।

मजे की बात यह है कि व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सभी प्लेटफार्म पर देखे जाने वाले वीडियो कंटेंट के उपयोगकर्त्ताओं पर कडी नजर रखी जा रही है । इसी तकनीक के उपयोग के चलते सघन छान-बीन से यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आये कि मार्च, 2017 के अंत में डेटा की खपत 13 अरब जीबी तक पहुॅंच गई जो कि पिछले साल जून के ऑंकडों से नौ गुना अधिक है । डेटा के उपयोगकर्त्ताओं की संख्या और उसकी विविधता, गुणवत्ता, स्थानवार तथा वर्गवार ठीक-ठीक पता लगा पाना इसी तकनीक के कमाल की वजह से संभव हो सका है । जब यह सभी प्लेटफार्म डेटा के उपयोगकर्त्ताओं पर इतनी बारीक और कडी नजर रख सकते हैं तो इसे जनता की मानसिक और सामाजिक जासूसी की संज्ञा क्यों नहीं दी जा सकती है । क्या ये सभी एजेंसियॉं भारत की जनता पर अप्रत्यक्ष रूप से नजर नहीं रखे हुए है तथा हमारे वतन की जनता जिनको हम इन डेटा के उपयोगकर्त्ता का नाम देते हैं, इन व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म के सामाजिक गुलाम बनकर नहीं रह गये हैं ।

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