मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

मैकाले-पद्धति को शीर्षासन कराता महर्षि अरविन्द का शिक्षा-दर्शन

“ वास्तविक शिक्षण
का प्रथम सिद्धान्त है- ‘कुछ भी न पढ़ाना’ , अर्थात् शिक्षार्थी के
मस्तिष्क पर बाहर से कोई ज्ञान थोपा न जाये । शिक्षण प्रक्रिया द्वारा
शिक्षार्थी के मस्तिष्क की क्रिया को सिर्फ सही दिशा देते रहने से उसकी
मेधा-प्रतिभा ही नहीं, चेतना भी विकसित हो सकती है, जबकि बाहर से ज्ञान
की घुट्टी पिलाने पर उसका आत्मिक विकास बाधित हो जाता है ।”

भगवा योगी की जय ! अर्थात, सफेद-आतंकियों की पराजय

खुद ‘सफेद आतंक’ बरपाते रहे इन समाजवादियों-कांग्रेसियों
द्वारा मुस्लिम-वोटबैंक पर अपनी पकड बनाये रखने के लिए साम्प्रदायिक
तुष्टिकरण-आधारित विभेदकारी शासन से बहुसंख्यक समाज में उत्त्पन्न
असंतोष-अक्रोश ने योगी आदित्यनाथ के हिन्दूत्ववादी तेवर को धार देने और
पूरे प्रदेश में उसे चमकाने का काम किया ।

ऋषि-द्वय कह गए दुनिया से,युग-परिवर्तन नियति की नीयत है

दोनों उच्च कोटि के पत्रकार-सम्पादक
थे । अंग्रेजी शासन के विरूद्ध अरविन्द अंग्रेजी में ‘वन्देमातरम’
निकालते थे , तो श्रीराम हिन्दी में ‘सैनिक’ । किन्तु बाद में किसी
दिव्यात्मा के सम्पर्क से दोनों योग-साधना के बदौलत चेतना के उच्च शिखर
पर पहुंच कर दैवीय योजना के तहत अपनी-अपनी भूमिका को तदनुसार नियोजित कर
राष्ट्रीय चेतना जगाने-उभारने के आध्यात्मिक उपचार में संलग्न हो गए ।

अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम , अर्थात बेरोक-टोक धर्मान्तरण

मनोज ज्वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ दुनिया भर के देशों को छडीबाज मास्टर की तरह…

अमेरिकी संस्थाओं के निशाने पर हिन्दू धर्म, कुछ करेंगे ट्रम्प ?

मनोज ज्वाला हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज और हिन्दू राष्ट्र अभूतपूर्व संकटों और अंतर्राष्ट्रीय…