कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म वसंत पंचमी : सरस्वती तत्व के जागरण का पर्व January 23, 2026 / January 23, 2026 by संदीप सृजन | Leave a Comment संदीप सृजन वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है जो केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव अंतःकरण में सरस्वती तत्व के जागरण का गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति की बहार के साथ-साथ आत्मा की प्रज्ञा, बुद्धि और सृजनात्मक ऊर्जा के उदय का प्रतीक है। जब सर्दी की सुस्ती टूटती है और चारों ओर पीले सरसों के फूल खिल उठते हैं, तब यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अज्ञान के अंधकार के बाद ज्ञान की किरणें कैसे फूटती हैं। यह पर्व सरस्वती तत्व के जागरण का उत्सव है, वह तत्व जो हमें मूक से वाग्मी, अंधेरे से प्रकाशित और स्थिर से सृजनशील बनाता है। सरस्वती तत्व केवल विद्या या ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह वह दिव्य शक्ति है जो वाणी, बुद्धि, प्रज्ञा, स्मृति, संगीत, कला और सृजन की मूल ऊर्जा है। यह वह चेतना हैं जो सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुईं। देवी भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची तो उन्हें वाणी की आवश्यकता महसूस हुई। उनकी इच्छा से सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ। वे सफेद वस्त्रों में, वीणा लिए, हंस पर सवार होकर प्रकट हुईं। उनका यह रूप बताता है कि सरस्वती तत्व शुद्धता, सरलता और गहन अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। हंस उनका वाहन इसलिए है क्योंकि हंस दूध और पानी को अलग कर सकता है, ठीक वैसे ही सरस्वती तत्व सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान को अलग करता है। सरस्वती तत्व का जागरण अर्थात् व्यक्ति के भीतर वह क्षमता जागृत होना जब वह केवल जानकारी इकट्ठा करने से आगे बढ़कर समझने, विश्लेषण करने, सृजन करने और अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाता है। यह तत्व जागृत होने पर व्यक्ति की वाणी में मधुरता आती है, बुद्धि में स्पष्टता, हृदय में करुणा और जीवन में सृजनात्मकता। वसंत पंचमी का नामकरण दो भागों से हुआ, वसंत (ऋतु का राजा) और पंचमी (पांचवीं तिथि)। यह वह दिन है जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है। सर्दी की जड़ता के बाद कोपलें फूटती हैं, फूल खिलते हैं, पक्षी गाते हैं और हवा में मादक सुगंध फैलती है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन अंतःकरण में सरस्वती तत्व के जागरण का प्रतीक है। जब सर्दियों की ठंडक में सब कुछ स्थिर और निष्क्रिय हो जाता है, तब वसंत की पहली किरण अज्ञान की उस ठंडक को पिघलाती है। पीला रंग, जो सरसों के फूलों, सूर्य की किरणों और सरस्वती के वस्त्रों का रंग है, प्रकाश, उल्लास और प्रज्ञा का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करना, पीले व्यंजन बनाना और पीले फूल चढ़ाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि सरस्वती तत्व को आमंत्रित करने का सूक्ष्म संदेश है। आध्यात्मिक व्याख्या में वसंत पंचमी को विद्या जयंती भी कहा जाता है। यह वह दिन है जब देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ और उन्होंने संसार को अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दी। कई विद्वान इसे गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन से जोड़ते हैं, जहां साधना के दौरान प्रज्ञा का अवतरण होता है। पौराणिक कथाओं में वसंत पंचमी का उल्लेख विविध रूपों में मिलता है, जिनमें ब्रह्मा और सरस्वती की कथा के अनुसार सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी को वाणी की आवश्यकता पड़ी। उनकी इच्छा से सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने वेदों का उच्चारण किया और संसार को ज्ञान दिया। इसीलिए इस दिन को उनका जन्मदिन माना जाता है। एक और पौराणिक कथा कामदेव की पुनर्जीवन कथा है, जब शिव जी ने क्रोध में कामदेव को भस्म कर दिया था। रति की प्रार्थना पर वसंत पंचमी को कामदेव पुनर्जीवित हुए। यह कथा बताती है कि सरस्वती तत्व केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि प्रेम और सृजन की ऊर्जा को भी जागृत करता है। ये कथाएं दर्शाती हैं कि सरस्वती तत्व सृष्टि का आधार है, बिना इसके न रचना संभव है, न अभिव्यक्ति। इस दिन की पूजा विधि स्वयं सरस्वती तत्व के जागरण को प्रेरित करती है, जैसे पीले वस्त्र और फूल, प्रज्ञा के प्रकाश का प्रतीक है। वीणा, पुस्तक और कलम की पूजा, सृजनात्मक अभिव्यक्ति के साधनों का सम्मान है। ज्ञान के प्रति समर्पण का भाव बनाए रखने को प्रेरित करता है। सरस्वती वंदना, भजन, वाणी को शुद्ध और प्रभावशाली बनाने की साधना है। वहीं संगीत, नृत्य और कला कार्यक्रम सरस्वती के विभिन्न रूपों का उत्सव है। बच्चे इस दिन पहली बार अक्षर लिखते हैं (विद्या आरंभ संस्कार), जो उनके भीतर सरस्वती तत्व के प्रथम जागरण का क्षण होता है। वसंत पंचमी हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास बाहरी नहीं, भीतरी है। जब सरस्वती तत्व जागृत होता है, तब व्यक्ति केवल जीवित नहीं रहता, जीवन को सार्थक और सुंदर बनाता है। वसंत पंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सरस्वती तत्व के जागरण का महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि हर सर्दी के बाद वसंत आता है, हर अज्ञान के बाद ज्ञान की किरण फूटती है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने भीतर की उस दिव्य शक्ति को जागृत करें जो हमें अंधकार से प्रकाश, मौन से वाणी और स्थिरता से सृजन की ओर ले जाती है। संदीप सृजन Read more » वसंत पंचमी
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म श्रीराम मंदिर: युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय January 23, 2026 / January 23, 2026 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment – डॉ. लोकेन्द्र सिंह भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं […] Read more »
धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन January 21, 2026 / January 21, 2026 by ललित गर्ग | Leave a Comment मौनी अमावस्या- 18 जनवरी, 2026-ललित गर्ग-मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है, वह आत्मा की सबसे सघन भाषा है। 18 जनवरी 2026 को आने वाली मौनी अमावस्या इसी मौन की महत्ता को जीवन के केंद्र में प्रतिष्ठित करने का पावन, सिद्ध एवं पवित्र अवसर है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मौन को जितना ऊँचा स्थान दिया […] Read more » मौनी अमावस्या
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव January 21, 2026 / January 21, 2026 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment बसंत पंचमी विशेष : डॉ घनश्याम बादल भारतीय परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में वसंत को ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं। तिथि मात्र नहीं बसंत वसंत पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा, प्रकृति और समाज तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है। धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ वसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-कार्य का पूजन होता है। या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश। आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है । प्रकृति और विज्ञान का संगम वैज्ञानिक दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है। मौसम विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे। मनोविज्ञान और आत्मिक चेतना मनोवैज्ञानिक रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान (केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए आगे बढ़ो,सीखो और रचो।” भौगोलिक परिवर्तन और जीवन भौगोलिक दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती हैं, सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का स्वागत गीतों के माध्यम से होता है- फागुन आयो रे, रंग बरसाओ रे, सरसों फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे जैसे लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है। वसंत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा वसंत पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की श्रृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और साधक का ब्रह्म से प्रेम है। आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी आज के यांत्रिक और तनावग्रस्त जीवन में वसंत पंचमी हमें रुककर देखने, महसूस करने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है। यह पर्व याद दिलाता है कि ज्ञान केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और प्रकृति-संगति में भी निहित है। यदि हम वसंत पंचमी को केवल रस्म न बनाकर, आत्मचिंतन का दिन नई सीख शुरू करने का संकल्प, भीतर की नकारात्मकता त्यागने का अवसर बना लें, तो यह पर्व वास्तव में आत्मिक पुनर्जन्म का उत्सव बन सकता है। यह पर्व संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर नवीनता, विवेक और करुणा का वसंत ला सकता है। वसंत पंचमी शाश्वत संदेश है- तम से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर, और अस्तित्व से आत्मबोध की ओर बढ़ना , दुखों के पुराने पत्तों को त्याग कर प्रसन्नता एवं नवीनता के नए अंकुरण को धारण करना। डॉ घनश्याम बादल Read more » बसंत पंचमी
खान-पान धर्म-अध्यात्म लोक पर्वों में समता का उत्सव: मकर संक्रांति January 14, 2026 / January 14, 2026 by बाबूलाल नागा | Leave a Comment मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक चेतना, कृषि संस्कृति और सामाजिक समता का प्रतीक है। यह त्योहार सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव है, जो अंधकार से प्रकाश, ठंड से ऊष्मा और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का संकेत देता है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में मकर संक्रांति अलग- Read more » मकर संक्रांति
खान-पान धर्म-अध्यात्म तिल-गुड़ और पतंगें : संक्रांति का वह दर्शन, जो सिखाता है समरसता और उड़ान January 14, 2026 / January 14, 2026 by उमेश कुमार साहू | Leave a Comment मकर संक्रांति का आधार पूर्णतः वैज्ञानिक और खगोलीय है। यह वह संधि काल है जब सूर्य दक्षिणायन की यात्रा पूर्ण कर 'उत्तरायण' की ओर अग्रसर होते हैं। भारतीय दर्शन में उत्तरायण केवल दिशा का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है। भीष्म पितामह का इस काल की प्रतीक्षा करना प्रमाणित करता है कि यह समय आत्मिक उन्नति औ Read more »
धर्म-अध्यात्म सूर्य आराधना, सांस्कृतिक एकता और नव संकल्प का महापर्व: मकर संक्रांति January 14, 2026 / January 14, 2026 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment मुगल काल में यह अक्सर 10-11 जनवरी को मनाई जाती थी। हमारे पौराणिक ग्रंथों ऋग्वेद और यजुर्वेद में सूर्य की उपासना और उत्तरायण को शुभकाल बताया गया है। मकर संक्रांति से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। दरअसल,मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणासनय से उत्तरायण की ओर बढ़ता है। इसका वैज्ञानिक कारण है। Read more » मकर संक्रांति
धर्म-अध्यात्म मकर संक्रांति : भारतीय संस्कृति का शाश्वत महापर्व January 14, 2026 / January 14, 2026 by सुरेश गोयल धूप वाला | Leave a Comment भारतीय संस्कृति पर्वों और उत्सवों की संस्कृति है। यहां प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, प्रकृति से संवाद और आत्मचिंतन का माध्यम है। इन्हीं पर्वों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व सूर्य, प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंधों को दर्शाता है। मकर संक्रांति केवल एक तिथि या धार्मिक अनुष्ठान नहीं Read more » मकर संक्रांति
धर्म-अध्यात्म ऋतु परिवर्तन का लोकउत्सव: लोहड़ी और नई ऋतु की दस्तक January 12, 2026 / January 12, 2026 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment लोहड़ी का उत्सव प्रकृति के उस चक्र का उत्सव है, जिसमें हर ठहराव के बाद गति और हर कठिनाई के बाद संभावना जन्म लेती है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं है, Read more »
खान-पान धर्म-अध्यात्म नच्च वे जट्टा लोहड़ी आई वे … January 12, 2026 / January 12, 2026 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में खिचड़वार और दक्षिण भारत के पोंगल पर भी--बेटियों को भेंट जाती है। कभी लोहड़ी से कई दिन पहले ही लोहड़ी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे किए जाते थे । इससे चौराहे या मुहल्ले Read more » लोहड़ी
धर्म-अध्यात्म जीवन में यदि उन्नति करनी है तो मनन शक्ति को उत्पन्न करना होगा और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय भी करना होगा: आचार्य राहुल आर्य January 5, 2026 / January 5, 2026 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment आचार्य राहुल आर्य जी ने कहा कि कि वेदों को श्रुति इस लिये कहा जाता है कि सृष्टि के आदि काल में वेदों की रक्षा, अध्ययन, अध्यापन व प्रचार सुन सुनाकर किया जाता रहा। श्री आर्य ने कहा कि मन्त्र उसे कहा जाता है जिसका मनन किया जाता है। उन्होंने कहा कि मन्त्र के दो प्रकार के अर्थ होते हैं प्रथम प्रकट अर्थ तथा द्वितीय गुप्त अर्थ। Read more »
धर्म-अध्यात्म धर्म का स्वरूप: सेवा या स्वार्थ? January 2, 2026 / January 2, 2026 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment आज का यथार्थ यह है कि धार्मिक परंपराओं का एक बड़ा हिस्सा अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है। जिन कर्मकांडों का उद्देश्य मनुष्य को आत्मिक संतुलन देना था, वे अब आर्थिक लेन-देन और दिखावे से जुड़ गए हैं। तीर्थस्थल, जो कभी तप, त्याग और साधना के केंद्र हुआ करते थे, आज कई बार बाजार का रूप धारण कर चुके हैं। श्रद्धालु की भावना से अधिक उसकी आर्थिक स्थिति को महत्व दिया जाने लगा है। Read more » धर्म का स्वरूप