धर्म-अध्यात्म श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय January 13, 2016 / January 17, 2016 by मनमोहन आर्य | 4 Comments on श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय संसार के इतिहास में सबसे प्राचीन इतिहासिक ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रामयण है। इस ग्रन्थ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सहित भरत जी के पावन जीवन का भी चरित्र चित्रण है। राम के अनुज भरत जी ने भी भ्रातृत्व वा भ्रातृ-प्रेम की ऐसी मर्यादायें स्थापित की हैं कि उसके बाद संसार के इतिहास में अन्य कोई […] Read more » भरत जी श्री राम श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय
धर्म-अध्यात्म संन्यास आश्रम की महत्ता पर संन्यासी स्वामी दयानन्द का उपदेश January 11, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment महर्षि दयानन्द के प्रसिद्ध ग्रन्थों में से एक ग्रन्थ संस्कारविधि है। इस ग्रन्थ में उन्होंने वेदों पर आधारित 16 संस्कारों का व्याख्यान किया है। इस व्याख्यान में सभी संस्कारों के स्वरूप का वर्णन करने के साथ उनकी विधि वा पद्धति भी दी गई है। संस्कारविधि से ही हम उनके संन्यास आश्रम पर उपदेश को पाठकों […] Read more » संन्यास आश्रम संन्यास आश्रम की महत्ता संन्यास आश्रम की महत्ता पर संन्यासी संन्यासी स्वामी दयानन्द का उपदेश स्वामी दयानन्द का उपदेश
धर्म-अध्यात्म एक ईश्वर, एक संसार और एक ही मनुष्य जाति विषय पर कुछ विचार January 11, 2016 by मनमोहन आर्य | 2 Comments on एक ईश्वर, एक संसार और एक ही मनुष्य जाति विषय पर कुछ विचार यह संसार पृथिवी, अग्नि, जल, वायु और आकाश का जीवों के सुख-दुःख के उपयोग की दृष्टि से समुपयुक्त मिश्रित रूप है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार संसार को बने हुए 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 115 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस अवधि में हमने संसार को बांट-बांट कर इस पर दो सौ […] Read more » एक ईश्वर एक संसार एक ही मनुष्य जाति
धर्म-अध्यात्म ईश्वराधीन कर्म-फल व तद् आश्रित सुख-दुःख व्यवस्था पर विचार January 8, 2016 by मनमोहन आर्य | 2 Comments on ईश्वराधीन कर्म-फल व तद् आश्रित सुख-दुःख व्यवस्था पर विचार संसार में मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त जड़-चेतन जगत क्रियाशील हैं। सृष्टि पंचभौतिक पदार्थों से बनी है जिसकी ईकाई सूक्ष्म परमाणु है। यह परमाणु सत्व, रज व तम गुणों का संघात है। इन्हीं परमाणुओं से अणु और अणुओं से मिलकर त्रिगुणात्मक प्रकृति व सृष्टि का अस्तित्व विद्यमान है। परमाणु में इलेक्ट्रान कण भी […] Read more » ईश्वराधीन कर्म-फल सुख-दुःख व्यवस्था पर विचार
धर्म-अध्यात्म नित्य, अजर अर्थात अमर है जीवात्मा January 5, 2016 by अशोक “प्रवृद्ध” | Leave a Comment अशोक “प्रवृद्ध” वेद, उपनिषद, दर्शनादि ग्रन्थों के अनुसार शरीरी अर्थात जीवात्मा शरीर से पृथक है । सुन्दर वृद्ध होने वाले शरीर में इसका भोग करने वाला बैठा है । जीवात्मा देह बदलता रहता है । सुख- दुःख शरीर को प्राप्त होते हैं, परन्तु जो सदा से है, शरीर के साथ नष्ट नहीं होता, वह […] Read more » Featured अजर अमर है जीवात्मा नित्य
धर्म-अध्यात्म वेदों और आर्यसमाज का प्रचार और प्रभाव January 2, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment स्वाध्याय करते समय आज मन में विचार आया कि महर्षि दयानन्द ने गुरु विरजानन्द जी की आज्ञा से अज्ञान व अन्धविश्वासों का खण्डन-मण्डन और वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रचार किया था। क्या कारण है कि इसका वह प्रभाव नहीं हुआ जो वह चाहते थे व होना चाहिये था? क्या महर्षि दयानन्द की वेदों पर […] Read more » Featured वेदों और आर्यसमाज का प्रचार और प्रभाव
धर्म-अध्यात्म सुख और दुःख जीवन में साथ चलते हैं December 29, 2015 by ललित गर्ग | Leave a Comment दुनिया का हर इंसान सुख चाहता है। दुःख कोई नहीं चाहता। वह दुःख से डरता हैं इसलिए दुःख से छुटकारा पाने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न करता है। मतलब दुःख को खत्म करने और सुख को सृजित करने के लिए हर इंसान अपनी क्षमता के मुताबिक हमेशा कुछ-न-कुछ करता है। सुख और दुःख धूप- छाया […] Read more » सुख और दुःख जीवन में साथ चलते हैं
धर्म-अध्यात्म सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग की भावना December 28, 2015 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग की भावना से सर्व मत-पन्थों का समन्वय ही मनुष्यों के सुखी जीवन एवं विश्व-शान्ति का आधार मनुष्य के व्यवहार पर ध्यान दिया जाये तो यह सत्य व असत्य का मिश्रण हुआ करता है। जो मनुष्य सत्य व असत्य को जानता भी नहीं, वह भी सत्य व असत्य […] Read more » सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग की भावना
चिंतन धर्म-अध्यात्म व्रत, तप, तीर्थ व दान का वैदिक सत्य स्वरूप December 25, 2015 by मनमोहन आर्य | 1 Comment on व्रत, तप, तीर्थ व दान का वैदिक सत्य स्वरूप मनमोहन कुमार आर्य भारत में सबसे अधिक पुरानी, आज भी प्रासंगिक, सर्वाधिक लाभप्रद व सत्य मूल्यों पर आधारित धर्म व संस्कृति ‘‘वैदिक धर्म व संस्कृति” ही है। महाभारत काल के बाद अज्ञान व अंधविश्वास उत्पन्न हुए और इसका नाम वैदिक धर्म से बदल कर हिन्दू धर्म हो गया। हम सभी हिन्दू परिवारों में उत्पन्न हुए […] Read more » Featured तप तीर्थ व दान का वैदिक सत्य स्वरूप व्रत
धर्म-अध्यात्म ईश्वर के कृतज्ञ सभी मनुष्यों को वैदिक विधि से ईश्वर-स्तुति करनी चाहिये December 22, 2015 by मनमोहन आर्य | 4 Comments on ईश्वर के कृतज्ञ सभी मनुष्यों को वैदिक विधि से ईश्वर-स्तुति करनी चाहिये मनुष्य विज्ञान की नई-नई खोजों के वर्तमान युग में ईश्वर व अपनी जीवात्मा के मूल स्वरुप को भूल बैठा है। आज ईश्वर को मानना व नाना प्रकार के मत-मतान्तरों प्रचलित विधि से उसकी स्तुति व प्रार्थना करना एक प्रकार का फैशन सा लगता है। कोई भी काम करने से पहले उसका यथेष्ट ज्ञान व विधि […] Read more » ईश्वर के कृतज्ञ सभी मनुष्यों को वैदिक विधि से ईश्वर-स्तुति करनी चाहिये
धर्म-अध्यात्म वैदिक धर्म व संस्कृति के सर्वाधिक प्रेमी December 22, 2015 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द वैदिक धर्म व संस्कृति के सर्वाधिक प्रेमी ऐतिहासिक देशवासी मनमोहन कुमार आर्य धर्म व संस्कृति के इतिहास पर दृष्टि डालने पर यह तथ्य प्रकट होता है कि महाभारत काल में ह्रासोन्मुख वैदिक धर्म व संस्कृति दिन प्रतिदिन पतनोन्मुख होती गई। महाभारत युद्ध का समय लगभग पांच हजार वर्ष एक सौ […] Read more »
धर्म-अध्यात्म निःस्वार्थ भाव से कर्म करने की प्रेरणा देती है गीता December 22, 2015 by अशोक “प्रवृद्ध” | 1 Comment on निःस्वार्थ भाव से कर्म करने की प्रेरणा देती है गीता अशोक “प्रवृद्ध” महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अपने कर्तव्य से विमुख अर्जुन को उसके कर्तव्य का भान कराने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का प्रवचन किया था । श्रीमद्भगवद्गीता वैराग्य अर्थात भक्तिप्रधान अवतारवाद का ग्रन्थ नहीं अपितु कर्मयोग का ग्रन्थ है , हाँ इसमें अध्यात्म का समावेश अवश्य है । कलियुग के प्रारंभ होने के […] Read more » holy book gita गीता