कविता हिंदी भाषा के हृदय का दर्द September 10, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मैं भारत से हिन्दी बोल रही हूँ अपने ह्रदय की पीड़ा खोल रही हूँ मेरी आवाज कोई नही यहाँ सुनता है अंग्रेजी भाषा का जाल यहाँ बुनता है मेरे देश में ही मेरा बुरा हाल है विदेशी भाषा पर ठोकते ताल है कोई नहीं करता मेरा ख्याल है यही मेरे मन में बड़ा मलाल है […] Read more » अंग्रेजी भाषा अछूत श्राद्ध मना हिंदी भाषा
कविता है ज्ञान औ अज्ञान में ! September 8, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १८०८२७ ब) रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ है ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का ! लख परख औ अनुभव किए, जो लक्ष हृदयंगम किए; परिणिति क्रिया की पा सके, फल प्राप्ति परिलक्षित किए ! जो मिला वह कुछ भिन्न था, सोचा था वह वैसा न था; कुछ अन्यथा उर लग रहा, पर प्रतीति सुर दे रहा ! आभोग का सागर अगध, उपलब्धि की गागर गहन; जिमि ब्रह्म में मिल फुरके मन, जग बोध करता सहज क्षण ! जो अजाने को जानता, उसका जगत पहचानता; ‘मधु’ के रचयिता रासता, उनकी प्रभा सब भासता ! Read more » लक्ष सागर अगध है ज्ञान औ अज्ञान में !
कविता प्रकृति का समीकरण September 8, 2018 / September 13, 2018 by डॉ छन्दा बैनर्जी | Leave a Comment डॉ. छन्दा बैनर्जी प्रकृति ने हमें मौके दिए हैं हर बार लेकिन , हम बुद्धिजीवी कहलाने वालों ने उसी प्रकृति पर प्रहार किये है बार-बार , चारों तरफ दो-दो गज ज़मीन पर चढ़ा कर कई-कई मंज़िलें सब कुछ सहने वाली धरती मां पर हम जुल्म पर जुल्म क्यों कर चले ? हम क्या सोच रहे […] Read more » धरती प्रकृति बरसने बुद्धिजीवियों
कविता हिंदुस्तान में हिंदी का हाल व भविष्य September 7, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on हिंदुस्तान में हिंदी का हाल व भविष्य आर के रस्तोगी मेरे देश में मेरा ही बुरा हाल है विदेशी भाषा पर ठोकते ताल है मेरे देश में मेरा ही सम्मान नहीं फिर विदेशो में मेरा क्या होगा ? जब अपने ही बोलने में कतराते है विदेशी मुझको क्यों अब बोलेगा ? इंगलिश स्कूलों की भरमार यहाँ हिंदी स्कूलों का क्या यहाँ […] Read more » अंग्रेजी भाषा राष्ट्रभाषा हिंदुस्तान में हिंदी
कविता चन्द्र का प्रतिविम्ब ! September 7, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment चन्द्र का प्रतिविम्ब, ज्यों जल झिलमिलाए; पुरुष का प्रतिफलन, प्राणों प्रष्फुराए ! विकृति आकृति शशि की, जल-तल भासती कब; सतह हलचल चित्र, सुस्थिर राखती कहँ ! गगन वायु अग्नि जल थल, थिरकते सब; द्रष्टि दृष्टा चित्त पल-पल, विचरते भव ! फलक हर उसकी झलक, क्षण क्षण सुहाए; देख पाए सोंप जो हैं, अहं पाए ! महत में सत्ता डुबाए, बृह्म भाए; ‘मधु’ के प्रभु अहर्निश, हर हिय सुहाए ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु Read more » गगन वायु अग्नि जल थल चन्द्र का प्रतिविम्ब ! पुरुष
कविता अदाकारी September 7, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ज़िंदगी के रंग मंच पर आदमी है सिर्फ़ एक कठपुतली । कठपुतली अपनी अदाकारी में कितने भी रंग भर ले आख़िर; वह पहचान ही ली जाती है, कि वह मात्र एक कठपुतली है । ऐसे ही आदमी चेहरे पर कितने ही झूठे-सच्चे रंग भरे अंत में, रंगीन चेहरे के पीछे असली चेहरा पहचान ही लिया जाता है | Read more » अदाकारी असली चेहरा ज़िंदगी के रंग मंच पर
कविता भयावह सपना September 7, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -विनोद सिल्ला सपने में नित देता है दिखाई समाज का उधड़ता ताना-बाना घुलता फिजां में जहर साम्प्रदायिक कहर दलितों की रुकती घुड़चढ़ी खाप-पंचायतों की ललकार ऑनर कीलिंग की चीख-पुकार ढलता नैतिक मूल्यों का सूरज लुप्त होती संवेदना नित-नया भयावह सपना लगा डर लगने सोने से भयावह सपनों से Read more » खाप पंचायतों भयावह सपना समाज
कविता हिंदुस्तान में हिंदी का हाल व भविष्य September 6, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मेरे देश में मेरा ही बुरा हाल है विदेशी भाषा पर ठोकते ताल है मेरे देश में मेरा ही सम्मान नहीं फिर विदेशो में मेरा क्या होगा ? जब अपने ही बोलने में कतराते है विदेशी मुझको क्यों अब बोलेगा ? इंगलिश स्कूलों की भरमार यहाँ हिंदी स्कूलों का क्या यहाँ होगा ? अगर ऐसा […] Read more » राष्ट भाषा विदेशी भाषा हिंदुस्तान में हिंदी
कविता ‘क्या मौन में छुपा है कोई हल’ September 6, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रीति सुराना आजमा के देख ये भी कुछ पल क्या मौन में छुपा है कोई हल हल न भी मिले तो लाभ ही है क्रोध की आग हो कुछ शीतल कुछ घड़ी शरीर को दे विश्राम कुछ घड़ी क्लेश ही जाए टल दे आराम भावों के आवेग को आवेश हो जाए शायद विफल क्षमा, चिंतन […] Read more » 'क्या मौन में छुपा है कोई हल' क्षमा चिंतन शरीर
कविता शिक्षक दिवस September 6, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment माँ ही मेरी पहली शिक्षक है क्यों न उसे मै शीश निवाऊ पढ़ा लिखा कर बड़ा किया है क्यों न शिक्षक दिवस मनाऊ पहले जैसे गुरु नही अब रहे पहले जैसी नहीं अब दीक्षा पहले जैसे शिष्य नहीं रहे पहले जैसे नहीं अब शिक्षा गुरु शिष्य में पहले जैसा अब रहा नहीं अब नाता समय […] Read more » गुरु माँ शिक्षक दिवस शिक्षा दिवस
कविता आज हिंदी भाषा की दशा September 5, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment भाषाओं की डारि पर,हिंदी फल की कैसी चाहत हैं जब छोटे से पौधे को,इंगलिश दी जावत है उत्तर से लेकर दक्षिण तक,केवल भाषा ही एक अदावट है कोई हिंदी को बोलन चाहत है,कोई तमिल बोलन चाहत है हिंदी का कैसे विकास होगा,जब इसको हीन द्रष्टि से देखत जावत है जब बड़े नेता अपने बच्चो को,इंगलिश […] Read more » अंग्रेजी भाषा आज हिंदी भाषा की दशा तमिल
कविता क्यों मौन है आवाम September 4, 2018 / September 4, 2018 by डॉ छन्दा बैनर्जी | Leave a Comment – डॉ. छन्दा बैनर्जी जाने अख़बार क्या कहता है, पढ़कर, पूरा आवाम क्यों मौन रहता है ? हां, बस्तर का यही है वह गांव पहचान थी जिसकी, तेंदू और महुआ का छाँव, उल्लास झलकता था जहाँ मांदर की थाप में खुशियां बयान होती थी पहाड़ी मैना के आलाप में … […] Read more » क्यों मौन है आवाम गांव तेंदू महुआ मौत झांकती