कविता साहित्य आजादी पर गर्व हमें है August 15, 2016 by शालिनी तिवारी | Leave a Comment आजादी पर गर्व हमें है और सदा तक बना रहेगा, जिन लोगों ने कुर्वानी दी उनका नाम अमर रहेगा, पर अन्तिम जन को आजादी कब तक मिल पाएगी ? दुपहरिया में मजदूरों की मेहनत कब रंग लाएगी ? उनकी सोच बदल जाए तो सच्ची आजादी होगी, भुखमरी पर पाबन्दी ही सच्ची खुशहाली होगी, झुग्गी झोपड़ियों […] Read more » poem on Independence Day आजादी आजादी पर गर्व हमें है
कविता साहित्य विश्वास- विश्वशान्ति का August 12, 2016 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment हर दिशा से शान्ति की पुरवाइयाँ बहें । विश्व है परिवार सबका,यही जन जन कहें । प्रेम का जल द्वेष की ज्वाला बुझाए । विश्वप्रेम की प्रतिपल ज्योति जगाए।। हिंसा तो बस प्रतिहिंसा को है बढ़ा रही । जग को है भयभीत और अशान्त कर रही ।। है विश्वास यही मन में ,एक दिवस वह […] Read more » Featured poem on Independence Day विश्वास- विश्वशान्ति का
कविता साहित्य कौन…… July 28, 2016 / July 30, 2016 by आकाश कुमार राय | Leave a Comment चुप-चाप खड़े हैं हम दोनों, सवाल यही कि बोले कौन ? बीच हमारे घोर खामोशी, चुप्पी के कान मरोड़े कौन ? सर-सर बह रही हवाएं, कानों से मफलर खोले कौन ? शब्द फंसे सब मुख के अंदर, सन्नाटे को तोड़े कौन ? कटुता इतनी भरी है हममें, मिसरी सी बातें घोले कौन ? लाख मानू […] Read more » कौन
कविता साहित्य तन्हाई July 27, 2016 by चारु शिखा | Leave a Comment तन्हाई छोड़ देती हूँ सिलवटे अब ठीक नहीं करती, मन सुकून चाहता , जो शायद मिल पाना मुश्किल, मुस्कान भी झूठी लगती, अच्छी थी कच्ची मिट्टी की मुस्कान, वक्त के साथ, सोच बदल गयीं। पर हकीकत कुछ और हैं. सहारा नहीं साथ की दरकार हैं, अब उसकी भी नहीं आस है, ढूंढती नजरें पर सब […] Read more » तन्हाई
कविता साहित्य वक्त July 20, 2016 / July 20, 2016 by चारु शिखा | Leave a Comment वक्त ने वक्त के साथ बहुत कुछ सिखा दिया वक्त ने “चलना” सिखा दिया वक्त ने “मुस्कुराना”सिखा दिया वक्त ने “आसूओं” को छुपा ना सिखा दिया वक्त ने हर “जख्म” को भरना सिखा दिया वक्त -वक्त की बात है…. कभी “तितली” की तरह मंडराना, कभी “भवरें”की तरह गंजन । कभी “बेले” की तरह महकती थी […] Read more » वक्त
कविता साहित्य कविता : खुशियाँ July 5, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment ये चंद घड़िया ही तो है, जो हमें अनगिनत खुशियाँ देती हैं। छोटी-छोटी बातें ही हमें यादगार पल देती है । चलती तेज हवाए देती हमे मंजिल का पता वक्त चला जा रहा उम्मीद का सहारा दिए । अपनों को खुश देखना , यही आस लगा तुम चलो या हम चले “दोनों” रास्ते पर […] Read more » खुशियाँ
कविता साहित्य गौरवान्वित हो अपना भारत June 19, 2016 / June 19, 2016 by शकुन्तला बहादुर | 1 Comment on गौरवान्वित हो अपना भारत अपना भारत कभी रहा था , आर्यों की संस्कृति का देश । ज्ञान लिये वेदों,गीता का , ऋषियों का देता संदेश ।। मुस्लिम आए, मंदिर तोड़े , प्राच्य संस्कृति नष्ट करी । लादा तब इस्लाम सभी पर, बर्बरता उनमें थी भरी ।। अत्याचारी अंग्रेज़ों ने , देशभक्त फाँसी लटकाए । समृद्धि लूट कर भारत की,सब […] Read more » गौरवान्वित हो अपना भारत -
कविता साहित्य योग करो भई योग करो June 17, 2016 / June 17, 2016 by विमलेश बंसल 'आर्या' | Leave a Comment -विमलेश बंसल ‘आर्या’ यदि चाहो कल्याण विश्व का, योग करो सब योग करो| यदि चाहो नित खुशियाँ पाना|| योग करो भई योग करो|| योग ही सत है , योग ही ऋत है, योग ही रस, अमृत, मधु, घृत है | योग प्रेम है, योग क्षेम है, योग ही संबल प्रभु श्रुति पथ है॥ यदि चाहो […] Read more » योग करो भई योग करो
कविता साहित्य मेरे अस्तित्व का आलिंगन करती कुछ रेखाएँ ! June 6, 2016 / June 6, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | 1 Comment on मेरे अस्तित्व का आलिंगन करती कुछ रेखाएँ ! मेरे अस्तित्व का आलिंगन करती कुछ रेखाएँ; असीम से आती हैं; आकाश से आ मुझे झाँक जाती हैं, आँक कर कहीं चली जाती हैं ! मैं अंतस में उनकी ऊर्जा का आलोड़न अनुभव करता हूँ, तरता हूँ; तैरता हूँ, तरंगों में भर उठता हूँ, तड़पन से निकलता हूँ ! वह मेरे पास है, मुझ में […] Read more » नियति के नाटक मुझे ! मेरे अस्तित्व का आलिंगन करती कुछ रेखाएँ ! रंग में कुछ हैं तरंगें
कविता साहित्य बाल हकीकत राय May 20, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment धन्य-धन्य हे बाल हकीकत, धन्य-धन्य बलिदानी। देगी नवजीवन जन-जन को, तेरी अम र कहानी।। प्राण लुटाए निर्भय होकर, धर्म प्रेम की ज्वाला फूंकी। तुझे प्रलोभन देकर हारे, सकल क्रूर मुल्ला अज्ञानी।। नश्वर तन है जीव अमर यह, तत्व ज्ञान का तूने जाना। तेरी गौरव गाथा गा गा, धन्य हुई कवियों की वाणी।। गूंज उठे धरती […] Read more » बाल हकीकत राय
कविता साहित्य रजनीगन्धा हूँ मैं, May 8, 2016 by के.डी. चारण | Leave a Comment के डी चारण रजनीगन्धा हूँ मैं, रंगोआब खुशबू से शेष जी, हां रजनीगंधा ही हूँ मैं, वह रंगोआब, खुशबू वाला पुष्प नहीं, जो जीवन में भाव भरता है, नयापन लाता है। समय रंगकर होठों की लाली बढाने वाली, पीक के लाल छर्रों वाली, मुलायम-कठोर कणों के गुण धर्म वाली रजनीगन्धा ही हूँ मैं। एक पतली […] Read more » रजनीगन्धा हूँ मैं
कविता साहित्य मां, पर पीर तो होती होगी May 3, 2016 by अरुण तिवारी | Leave a Comment गांव की सबसे बङी हवेली उसमें बैठी मात दुकेली, हवेली से बाते करते, दीवारों से सर टकराना, ईंट सरीखा मन हो जाना, दूर बैंक से पैसा लाना, नाज पिसाना, सामान मंगाना, हर छोटे बाहरी काम की खातिर दूजों से सामने गिङगिङ जाना, किसी तरह घर आन बचाना, शूर हो, मज़बूर हो मां, पर पीर तो […] Read more » Featured poem on mother पर पीर तो होती होगी मां