कविता इक दिवाली ये भी है November 12, 2012 / November 12, 2012 by श्यामल सुमन | Leave a Comment बिजलियों से जगमगाई, इक दिवाली ये भी है रोशनी घर तक न आई, इक दिवाली ये भी है दीप अब दिखते हैं कम ही, मर रही कारीगरी मँहगी है दियासलाई, इक दिवाली ये भी है थी भले कम रोशनी पर, दिल बहुत रौशन तभी रीत उल्टी क्यों बनाई, इक दिवाली ये भी है […] Read more » इक दिवाली ये भी है
कविता मेरा वतन वही है …………. November 8, 2012 / November 7, 2012 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on मेरा वतन वही है …………. राकेश कुमार आर्य शौर्य और साहस जिसका अद्वितीय है । विज्ञान ज्ञान जिसका विश्व में अवर्णनीय है ॥ ताप त्याग साधना भी जिसकी अकथनीय है । संदेश सत्य का जिसकी पठनीय है ॥ मेरा वतन वही है ,मेरा वतन वही है …॥ १ ॥ मनु सा संविधानज्ञ जिसकी अमर है ख्याति । गौतम कणाद […] Read more »
कविता असंगतिओं का जलप्रलय November 5, 2012 / November 5, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on असंगतिओं का जलप्रलय गतिमय प्रिय स्मृतिओं की बढ़ती बाढ़ की गति ढूँढती है नए मैदानों के फैलावों को मेरे भीतर, पर यहाँ तो कोई निरंक स्थान नहीं है छोटा-सा कुछ भी और लिखने को…स्मृतिओं की नदी को मेरे मृदु अंतरतम में तुम अब और कहीं बहने दो । स्मृतिओं की नदी के तल प्रतिपल हैं ऊँचे चढ़ते, […] Read more »
कविता कविता – अवशेष November 3, 2012 / November 3, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल आग जब सबकुछ जला देगी कुछ तिलिस्म जिंदगी भर के वास्ते धुंधला जाने के लिए उम्मीद को छोड़ कर कहीं से भी चलकर निरर्थक परिक्रमा नहीं करेगी । तय शुदा सुरक्षा के अर्थ जब बंद हो जाएंगें सूरज के साथ-साथ हम मध्यांतर के उल्लास सा अर्थपूर्ण यात्रा की दुआ लेते हुए मोक्ष की […] Read more » कविता - अवशेष
कविता मानव हो मानव बने रहो November 3, 2012 / November 3, 2012 by बीनू भटनागर | 1 Comment on मानव हो मानव बने रहो हर जड़ चेतन का उद्गम प्रकृति, हमने उसको भगवान कहा, तुमने उसको इस्लाम कहा या केश बांध ग्रंथ साब कहा, या फिर प्रभु यशु महान कहा। पशु पक्षी हों या भँवरे तितली, वट विराट वृक्ष हो चांहे हो तृण, या हों सुमन सौरभ और कलियाँ, हाथी विशाल हो या सिंह प्रबल या हों जल […] Read more » मानव हो मानव बने रहो
कविता चौराहा October 31, 2012 / October 31, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on चौराहा विजय निकोर अनचाहे कैसे अचानक लौट आते हैं पैर उसी चौराहे पर जिस चौराहे पर समय की आँधी में हमारे रास्ते अलग हुए थे, तुम्हारी डबडबाई आँखों में व्यथाएँ उभरी थीं, और मेरी ज़िन्दगी भी उसी दिन ही बेतरतीब हो गई थी । जो लगती है स्पष्ट पर रहती है अस्पष्ट शायद कुछ ऐसी […] Read more »
कविता मैने फूलदान सजाया October 30, 2012 / October 30, 2012 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैने फूलदान सजाया उपवन मे जो पुष्प खिले थे, पवन सुगंधित कर देते थे, सुमन सुन्दर अति मनोहारी, कुसुम यही शोभा बगिया के। इन्हें तोड़ डाली से काँटे काटे, फिर एक प्यारा सा गुलदस्ता रत्न जटित एक फूलदान मे, उन्हें संवारा और सजाया। मैने अपना कक्ष सजाया, तन मन मेरा अति भरमाया , दो दिन तक […] Read more » मैने फूलदान सजाया
कविता यंत्रणा October 24, 2012 / October 25, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on यंत्रणा तुम्हारा मेरा साथ एक आत्मिक यात्रा, तुम्हारा संतृप्त स्नेह दिव्य उड़ान और अब तुम्हारा अभाव भी एक आध्यात्मिक साधना है जो मेरे अन्तर में प्रच्छ्न्न, मंदिर में दीप-सी और मंदिर के बाहर सूर्य की किरणों-सी मेरे पथ को सदैव दीप्तिमान किए रहती है । हमारे इस अभौतिक पथ पर कोई पगडंडी पथरीली, कोई कँटीली, […] Read more » poem by vijay nikor
कविता निहितार्थों का समुद्र October 24, 2012 / October 24, 2012 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on निहितार्थों का समुद्र बहते संबंधों की जलधार में कहीं कुछ था जो अछूता सा था ह्रदय की गहराइयों में नहीं डूब पाया था वो और न ही छू पाया था उन अंतर्तम जलधाराओं को जो बहते चल रही थी मन के समानांतर. मन करता था चर्चाएं तुमसे पता है. पता है यह भी कि शिलाओं पर लिखे जा […] Read more » निहितार्थों का समुद्र
कविता ईश्वर का अंश लिए आँखें चिड़िया की October 20, 2012 / October 20, 2012 by प्रवीण गुगनानी | 2 Comments on ईश्वर का अंश लिए आँखें चिड़िया की शहर से बड़ी दूर ढलती शाम में सचमुच ही कोलाहल जहां हो गया था निराकार और निर्विकार कहीं दूर दूर होती ध्वनियों पर बैठ जाया करती थी जहां एक चिड़िया चिड़िया के पंखों पर लटक जाते थे शब्द वे शब्द खो देते थे अपने अर्थों को और हो जाते थे भारहीन. मुझे याद है वो […] Read more »
कविता मै गुमशुदा हूँ October 18, 2012 / October 18, 2012 by बीनू भटनागर | 3 Comments on मै गुमशुदा हूँ बीनू भटनागर मै कौन हूँ? कहाँ हूँ ? अंधेरी रातों मे गुमशुदा हूँ। कुछ साये अंजाने से, डराने लगे हैं। कुछ दर्द पुराने से याद आने लगे हैं। लेकिन, ये तो साये हैं, इनका वजूद ही, कहाँ है! इन अंधेरी रातों की, सुबह होगी, उजाले मे ये साये डूब जायेंगे, क्योंकि, निराशा और आशा, के […] Read more »
कविता मजदूर की जिंदगी October 17, 2012 / October 17, 2012 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं | मेहनतकश मजदूर मगर हम भूखे ही मर जाते हैं | धन की चमक के आगे हम कहीं ठहर न पाते हैं | बाग खेत खलिहान हमारे हमसे छीने जाते हैं | सारी धरती हम सबकी है हम फिर भी सताए जाते हैं […] Read more » मजदूर की जिंदगी