कविता बहिर-बधिर March 5, 2026 / March 5, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment “सूर्यअपने तपते आदर्शों कानिरंतर प्रवचन करता है—आकाश के ऊँचे मंच से। काले बादलअपनी गरम चुप्पियों मेंबिजली की भाषा लिखते हैं,और बारिशधरती की जड़ों तकधीरे-धीरे उतरती है। पर एक मनुष्य है—जो केवल इन्हीं को सुनने के लिएअपने कान खुले रखता है,मानो संसार की बाकी आवाज़ेंउसके लिएमूक हो चुकी हों। समयरेत-घड़ी की छाया मेंउँगलियों से फिसलतीक्षणिक रेत […] Read more » deaf and dumb बहिर-बधिर
धर्म-अध्यात्म लेख दिल से दिल तक March 5, 2026 / March 5, 2026 by डा. शिवानी कटारा | Leave a Comment भारत उत्सवों की भूमि है, तीज-त्योहारों की पावन धरा है। किसी समाज में पर्वों की निरंतरता उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और सामूहिक उल्लास का संकेत मानी जाती है। होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि Read more » होली
लेख विधि-कानून मनुस्मृति और भारत का संविधान अध्याय – 6 ख March 5, 2026 / March 5, 2026 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment मनुस्मृति और भारत का संविधान Read more » मनुस्मृति और भारत का संविधान
लेख विधि-कानून मनुस्मृति और भारत का संविधान अध्याय – 6 क March 3, 2026 / March 3, 2026 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment मनुस्मृति में मनु महाराज ने हमारे देश की सीमाओं का उल्लेख करते हुए प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त का उल्लेख किया है। इन दोनों नामों को आज के भारत वर्ष Read more » मनुस्मृति और भारत का संविधान
कला-संस्कृति लेख कटुता भुलाकर गले मिलें March 1, 2026 / March 1, 2026 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment फाल्गुन की उजली पूर्णिमा, जब नभ में मुस्काती है, होलिका की पावन ज्वाला बुराई को जलाती है। सत्य की राह दिखाकर हमको, नव विश्वास जगाती है, अंधियारे मन के कोनों में भी उजियारा भर जाती है। सुबह धुलेंडी रंग लिए जब आँगन में आ जाती है, अबीर-गुलाल की खुशबू से हर गली महक जाती है। […] Read more » कटुता भुलाकर गले मिलें
पर्व - त्यौहार लेख होली : परंपरा, उत्साह और सामाजिक समरसता का पर्व March 1, 2026 / March 1, 2026 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment होली भारतवर्ष का एक अत्यंत प्राचीन, सांस्कृतिक और लोकआस्था से जुड़ा हुआ पर्व है, जिसे पूरे देश में अत्यधिक धूमधाम, उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऋतु परिवर्तन के इस समय में जब शीत ऋतु विदा लेती है और […] Read more » होली
कला-संस्कृति लेख झारखंड में होली की वैविध्यपूर्ण परंपराएं March 1, 2026 / March 1, 2026 by अशोक “प्रवृद्ध” | Leave a Comment झारखंड में होली की अत्यंत प्राचीन, वृहत व वैविध्यपूर्ण परंपराएं हैं। यहां इसे मुख्य रूप से फगुआ के नाम से जाना जाता है, जिसमें आदिवासी और गैर आदिवासी सदान संस्कृति Read more » झारखंड में होली होली की वैविध्यपूर्ण परंपराएं
लेख स्वास्थ्य-योग खामोशी से जान लेती सेक्सवर्धक दवाएं March 1, 2026 / March 1, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment (मर्दानगी का दबाव और समाज की खामोशी) — डॉ. सत्यवान सौरभ भारत जैसे समाज में यौन स्वास्थ्य आज भी खुली बातचीत का विषय नहीं है। पुरुषों से अपेक्षा की जाती है कि वे हर हाल में “सक्षम” रहें—चाहे उम्र, तनाव या बीमारी कुछ भी हो। इसी दबाव में डॉक्टर से सलाह लेना कमजोरी मान लिया […] Read more » सेक्सवर्धक दवाएं
लेख विज्ञान अंधविश्वास और पाखण्ड से बाहर आएं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं February 27, 2026 / February 27, 2026 by बाबूलाल नागा | Leave a Comment 28 फरवरी: राष्ट्रीय विज्ञान दिवस बाबूलाल नागा 28 फरवरी का दिन केवल एक तिथि नहीं बल्कि समाज के लिए चेतना और जागरूकता का अवसर है। इसी दिन 1928 में भारत के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन ने ‘रमन प्रभाव’ की खोज करके भारत को वैज्ञानिक दुनिया में स्थापित किया। यह खोज न केवल विज्ञान की उपलब्धि थी बल्कि यह दिखाती है कि तर्क, प्रयोग और […] Read more » 28 फरवरी: राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
पर्यावरण लेख पलाश की सिंदूरी आभा : फागुन का दहकता दर्पण, जिसमें झांकती है हमारी परंपरा February 27, 2026 / February 27, 2026 by उमेश कुमार साहू | Leave a Comment उमेश कुमार साहू जब फागुन की बयार चलती है तो प्रकृति मानो अपना मौन तोड़कर रंगों की भाषा में बात करने लगती है। इस संवाद का सबसे प्रखर और दीप्तिमान शब्द है – पलाश। जिसे हम लोकभाषा में ‘टेसू’ या ‘ढाक’ भी कहते हैं। पलाश मात्र एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उस अदम्य जिजीविषा का प्रतीक […] Read more » पलाश की सिंदूरी आभा
लेख शख्सियत जीवन के सम्यक विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक February 27, 2026 / February 27, 2026 by प्रमोद कुमार | Leave a Comment राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : 28 फरवरी प्रमोद दीक्षित मलय विज्ञान मानव को जीवन जीने की एक दृष्टि देता है। चिंतन की आधारभूमि भेंट कर चलने को उजास भरा पथ प्रदान करता है। वास्तव में विज्ञान जीवन से जडता, अविद्या, अंधविश्वास, अतार्किता एवं संशय से मुक्ति का नाम है। विज्ञान व्यक्ति को तर्कशील एवं प्रयोगधर्मी बनाकर सवाल खड़े करने की सामर्थ्य पैदा करता है। विज्ञान मानवीय मेधा का उच्चतम आदर्श है। वसुधा के सौंदर्य को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए प्राणिमात्र के लिए प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपभोग का मार्गदर्शन ही विज्ञान है। विज्ञान में समस्या है तो समाधान भी, कल्पना है तो प्रयोग भी। सवाल हैं तो उत्तरों की तह तक पहुंच सत्य का साक्षात्कार करने का सत्संकल्प भी। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के माध्यम से हम इस भाव एवं चेतना को सिंचित कर समृद्ध करते हैं। राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् एवं विज्ञान मंत्रालय द्वारा युवाओं एवं बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं विज्ञान अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के उद्देश्य से 1986 से प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी, 1928 को ही सी.वी. रमन ने लोक सम्मुख अपनी विश्व प्रसिद्ध खोज ‘रमन प्रभाव’ की घोषणा की थी। ‘रमन प्रभाव’ के लिए ही 1930 में सी.वी. रमन को नोबेल पुरस्कार मिला था। सी.वी. रमन एशिया के पहले भौतिक शास्त्री थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। अमेरिकन केमिकल सोसायटी ने 1998 में ‘रमन प्रभाव’ को अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान के इतिहास की एक युगान्तकारी घटना के रूप में स्वीकार किया। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस वास्तव में ‘रमन प्रभाव’ के स्मरण के साथ ही मानव जीवन के सम्यक विकास के लिए वैज्ञानिक चिंतन एवं दृष्टिकोण अपनाने का दिन है, जिसकी हमें जरूरत है। चंद्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर, 1888 को तमिलनाडु में कावेरी के तट पर स्थित तिरुचिरापल्ली नामक स्थान पर एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आपकी माता पार्वती अम्मा कुशल गृहिणी एवं पिता चन्द्रशेखर भौतिकशास्त्र एवं गणित के प्राध्यापक थे। घर पर एक समृद्ध लघु पुस्तकालय था तो तार वाद्ययंत्रों का संचय भी। संगीत में रुचि के चलते वीणा वादन पिता जी की नित्य साधना थी। वीणा के तारों के कम्पन से निकली मधुर ध्वनि बालक रमन को अपनी ओर खींचती। वह सोचते कि इन तारों को छेड़ने से एक विशेष लय, प्रवाह, आरोह-अवरोह में मनमोहक ध्वनि कैसे उत्पन्न हो सकती है। यही जिज्ञासा बाद में उनके ध्वनि सम्बंधी शोधों का आधार भी बनी। चार वर्ष की उम्र में ही पिता का तबादला विशाखापट्टनम हो जाने से रमन की प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं शुरू हुई। यहां घर के सामने लहराता सागर का नीला जल रमन का ध्यान आकर्षित करता। बालमन सोचता कि घर और सागर के जल में यह अन्तर कैसे। मकान की खिड़की से वह सागर की लहरों को अठखेलियां करते देखते रहते मानो जल के नीलेपन के रहस्य का कोई तोड़ खोज रहे हों। रमन ने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में 1903 में बी.ए. में प्रवेश लिया और विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में प्रथम आकर गौरव अर्जित किया। 1907 में एम.ए. गणित प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण किया। परास्नातक करते समय ही 1906 में ‘प्रकाश विवर्तन’ विषय पर शोध पत्र लिखा जो लंदन से प्रकाशित विश्व प्रसिद्ध पत्रिका ‘फिलसोफिकल मैगजीन’ में छपा। 1907 में ही आपने असिस्टेंट एकाउंटेंट जनरल के रूप में कलकत्ता में कार्यभार ग्रहण किया। पर रमन का मन तो विज्ञान की दुनिया में ही रमा था। फलतः एक दिन कार्यालय से घर आते समय वर्ष 1876 में स्थापित ‘इंडियन एसोसिएशन फार दि कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ की प्रयोगशाला में सुबह-शाम चार-चार घंटे ‘ध्वनि में कम्पन एवं कार्य’ के क्षेत्र में प्रयोग करने लगे। वह स्कूली बच्चों को प्रयोगशाला लाकर विज्ञान के विभिन्न प्रयोग करके दिखाते ताकि बच्चे विज्ञान की दुनिया को करीब से देख-परख सकें। कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति आशुतोष मुखर्जी के कहने पर 1917 में आपने नौकरी से त्यागपत्र देकर भौतिकी का प्राध्यापक बनना स्वीकार कर लिया। 1921 में ब्रिटेन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के कांग्रेस में कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु ऑक्सफोर्ड जाना हुआ। लौटते समय भूमध्य सागर के जल का नीलापन देखकर आप आश्चर्यचकित रह गए। विचार किया कि समुद्र के जल में नीलापन किस कारण से है। उपकरण लेकर आप जहाज के डेक पर आ गये और घंटों सिन्धु जल का अवलोकन-निरीक्षण और प्रयोग करते रहे। इस दौरान पूर्व में विज्ञानवेत्ताओं द्वारा खोजे गये सिद्धांत और निष्कर्ष आंखों के सामने घूमते रहे कि जल का नीलापन समुद्र के अन्दर से प्रकट हो रहा है। पर आप उनसे सहमत नहीं हो पा रहे थे। तब रमन ने इस रहस्य की खोज करने का संकल्प लिया और भारत आकर आपने प्रयोगशाला में 1921 से 1927 तक शोध किया जिसकी परिणति ‘रमन प्रभाव’ के रूप में हुई। ‘रमन प्रभाव’ प्रकाश का विभिन्न माध्यमों से गुजरने पर उसमें होने वाले भिन्न-भिन्न प्रकीर्णन के कारणों का अध्ययन है। सात साल की साधना का फल ‘रमन प्रभाव’ पर आधारित शोध पत्र ‘नेचर’ पत्रिका में सर्वप्रथम छपा था। 1924 में आपको रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन का फैलो बनाया गया। 1927 में जर्मनी ने जर्मन भाषा में भौतिकशास्त्र का बीस खंडों का एक विश्वकोश प्रकाशित किया। इसमें वाद्य यंत्रों से सम्बंधित आठवें खंड का लेखन रमन द्वारा किया गया। यह उल्लेखनीय है कि इस विश्वकोश को तैयार करने वाले आप एकमात्र गैर जर्मन व्यक्ति थे। उनके 2000 शोध पत्र विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए। 1948 में आपने सेवानिवृत्ति के बाद बेंगलुरु में ‘रमन शोध संस्थान’ की स्थापना की। भारत सरकार ने 1954 में महान कर्मयोगी विज्ञानी रमन के योगदान और वैज्ञानिक उपलब्धियों का वंदन करते हुए ‘भारत रत्न’ पुरस्कार प्रदान किया। रूस ने 1957 में ‘लेनिन शंन्ति पुरस्कार’ भेंटकर सम्मानित किया। संचार मंत्रालय ने 20 पैसे का एक टिकट जारी कर आपकी स्मृति को अक्षुण्ण बना दिया। विश्व का यह महान भौतिकविद् 21 नवम्बर, 1970 को अपना लौकिक जीवन पूर्ण कर हमें अकेला छोड़ अंतिम यात्रा पर प्रस्थान कर गया। लेकिन जब तक दुनिया में भौतिकी का अध्ययन होता रहेगा, तब तक ‘रमन प्रभाव’ अमर रहेगा और चन्द्रशेखर वेंकट रमन भी कोटि उरों में जीवित एवं श्रद्धास्पद बने रहेंगे। प्रमोद दीक्षित मलय Read more » राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
लेख सार्थक पहल हरियाणा प्रदेश में नए सेक्टरों की योजना: सुव्यवस्थित विकास की दिशा में एक सराहनीय कदम February 27, 2026 / February 27, 2026 by सुरेश गोयल धूप वाला | Leave a Comment हरियाणा प्रदेश में शहरी विकास को नई गति देने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा शहरों में नए सेक्टर विकसित करने की योजना एक अत्यंत सराहनीय और दूरदर्शी पहल है। ताज़ा समाचारों के अनुसार, गत दिवस हरियाणा के समाज कल्याण एवं अधिकारिता मंत्री कृष्ण बेदी ने विधानसभा में इस महत्वाकांक्षी योजना की जानकारी दी है। […] Read more » हरियाणा प्रदेश में नए सेक्टरों की योजना