कविता हा! ये कैसे हुआ ? सोचो, क्यू हो गया ?? October 16, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment मकां बनते गांव झोपङी, शहर हो गई, जिंदगी, दोपहर हो गई, मकां बङे हो गये, फिर दिल क्यांे छोटे हुए ? हवेली अरमां हुई, फिर सूनसान हुई, अंत में जाकर झगङे का सामान हो गई। जेबें कुछ हैं बढी मेहमां की खातिर फिर भी टोटे हो गये, यूं हम कुछ छोटे हो गये। हा! ये […] Read more » क्यू हो गया ?? हा! ये कैसे हुआ ? सोचो
कविता विकृत होते प्रकृति संबंध October 16, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment ’हम’ को हटा पहले ’मैं’ आ डटा फिर तालाब लुटे औ जंगल कटे, नीलगायों के ठिकाने भी ’मैं’ खा गया। गलती मेरी रही मैं ही दोषी मगर फिर क्यूं हिकारत के निशाने पे वो आ गई ? हा! ये कैसे हुआ ? सोचो, क्यूं हो गया ?? घोसले घर से बाहर फिंके ही फिंके, धरती […] Read more » विकृत होते प्रकृति संबंध
व्यंग्य संघर्ष की शक्ल….!! October 14, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा मैं जीवन में एक बार फिर अपमानित हुआ था। मुझे उसे फाइव स्टार होटल नुमा भवन से धक्के मार कर बाहर निकाल दिया गया था, जहां तथाकथित संघर्षशीलों पर धारावहिक तैयार किए जाने की घोषणा की गई थी। इसे किसी चैनल पर भी दिखाया जाना था। पहली बार सुन कर मुझे लगा […] Read more » संघर्ष की शक्ल....!!
समाज साहित्य रामराज्य – एक आदर्श राजविहीन राज्य October 12, 2015 by सुरेन्द्र नाथ गुप्ता | 2 Comments on रामराज्य – एक आदर्श राजविहीन राज्य सुरेन्द्र नाथ गुप्त राम राज्य की कल्पना सर्वप्रथम महाराज मनु ने की थी जब मनु-शतरूपा ने तप करके भगवान से वर मांगा था कि तुम्हारे समान पुत्र हो। मनु-शतरूपा निसंतान नहीं थे, उनके दो पुत्र उत्तानपाद व प्रियव्रत और एक पुत्री देवहूती थी, फिर भी भगवान से पुत्र मांगा और वह भी बिल्कुल उन्ही के […] Read more » Featured रामराज्य
कविता साहित्य रहस्यमयी सूर्य October 12, 2015 / October 12, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पवन प्रजापति उदय प्रताप इंटर कालेज, वाराणसी तीक्ष्ण किरण के आदि अंत में हे दिनकर! तुम हो अन्नत में सौर कुटुम्ब के तुम आधार शून्य जगत में निराकार ।। अमिट अथाह उर्जाओं का श्रोत अति उष्मा से ओत प्रोत दुग्घ्ध मेखला के परितः चलायमान अन्नत आकाश में उदियमान ।। अंधकार है शत्रु तुम्हारा संपूर्ण विश्व […] Read more » रहस्यमयी सूर्य
कहानी बच्चों का पन्ना यह कैसी मित्रता October 12, 2015 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment गणेशी के खेत में बने तीन कमरों के घर में चिंकू चूहे ने अपना निवास बना लिया था |घर के ठीक सामने दो ढाई सौ फुट की दूरी पर एक नीली नदी बहती थी |नदी थी तो पहाड़ी परन्तु मार्च महीने तक उसमें भरपूर पानी रहता था |बरसात में तो पानी खेत की मेढ तक […] Read more » Featured
कविता साहित्य मैं हूँ एक इंसान October 11, 2015 / October 11, 2015 by वैदिका गुप्ता | Leave a Comment ना नाम है मेरा ना पहचान है मेरी ना कोई धर्म है मेरा मैं हूँ एक इंसान।। ना जोड़ो मुझे किसी धर्म से, मेरा धर्म भी इंसानियत है। मेरा कर्म भी इंसानियत है।। दूर रहो मुझसे, ऐ धर्म के पेहरेदारों, तू जितने पास आया है! उतनी इंसानियत खो दी मैंने। तुझे सत्ता में आना है, […] Read more » Featured मैं हूँ एक इंसान
लेख साहित्य क्योंकि मैं नेता नहीं हूँ… October 11, 2015 / December 2, 2015 by अश्वनी कुमार, पटना | 1 Comment on क्योंकि मैं नेता नहीं हूँ… “(मेरी शिकायत न तो सिस्टम से है और न ही इस बनाने वालों से. शिकायत है तो सिर्फ इस चलानेवालों से। मैंने अबतक अपनी छोटी सी ज़िंदगी में नेता न होने की बहुत कमी महसूस की और मुझे उम्मीद है की आपने भी कभी न कभी महसूस की होगी)” सड़कों पर कचड़े को देखकर इसके […] Read more » क्योंकि मैं नेता नहीं हूँ…
व्यंग्य साहित्य गधे ने जब मुंह खोला October 10, 2015 by अशोक गौतम | Leave a Comment मैंने रोज की तरह लाला दयाराम की बरसों से बन रही हवेली के लिए सूरज निकलने से पहले अपने पुश्तैनी गधे के पोते के पड़पोते पर रेत ढोना शुरू कर दिया था। जहां तक मेरी नालिज है न गधे के पुरखों ने मेरे पुरखों से इस रिश्ते के बाबत कोई शिकायत की थी और न […] Read more » गधे ने जब मुंह खोला
कहानी कहानी- कर्ज़ा October 10, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment रवि श्रीवास्तव लहराती फसल कितना सुकून देती है। रमेश अपने बेटे से कहता हुआ खेत को देख रहा था। हर तरफ से घूम कर अपनी फसल को देखा। मन में सोच रहा कि भगवान तेरा शुक्रिया कैसे अदा करूं। तभी पीछे से एक आवाज आती है। अरे रमेश क्या बात है, आज अपने बेटे को […] Read more » कहानी- कर्ज़ा
कहानी कहानी – प्रेम गली अति सांकरी…. October 10, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment विश्व साहित्य में प्रेमकथाओं का सदा से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इनमें भी वे कथाएं अधिक लोकप्रिय हुई हैं, जिनका अंत सुखद नहीं रहा। ऐसा क्यों है, कहना कठिन है। शायद विरह और दुख के अंगारों पर धीमे-धीमे सुलगता हुआ प्रेम ही अन्य प्रेमीजनों के दिल को शांति देता है। हीर-रांझा, लैला-मजनू, शीरी-फरहाद आदि […] Read more » Featured कहानी - प्रेम गली अति सांकरी....
कविता साहित्य कौसानी तक October 6, 2015 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हलद्वानी के खुले जो द्वार, पंहुचे हम कुमाऊँ खण्ड, उत्तराखण्ड का सुन्दर अंग, चढ़ाई हुई अब आरंभ। नैनीताल के रस्ते मे, जब देखा विशाल भीमताल, भीमताल है इतना सुन्दर तो, कैसा होगा नैनीताल! नैनी झील के चारों ओर, बसा है नैनीताल। पर्यटकों का सर्वाधिक रुचिकर है, कुमाऊँ का ये स्थान। प्रत्यूषकाल मे, […] Read more » कौसानी तक