कहानी साहित्य जिंदगी के रंग November 4, 2015 by आर. सिंह | 1 Comment on जिंदगी के रंग कुछ बातें ऐसी होती हैं जो याद रह जाती हैं.कुछ ऐसी बातें भी होती हैं,जिन्हे याद रखना पड़ता है.यह घटनाक्रम उन बातों में से है,जो याद रह जाती हैं. ________________ विनय से मेरा मिलना इतिफाक या संयोग ही था,पर घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे नजदीक आता गया और आता ही गया.बात बहुत पुरानी […] Read more » Featured जिंदगी के रंग
आलोचना राजनीति साहित्य कौन सी पुरस्कार वापसी? November 3, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on कौन सी पुरस्कार वापसी? कौनसी पुरस्कार वापसी? कौनसी साहित्यिक प्रतिभा? कौन से देश और समाज के हमदर्द? कौनसी मानवता के हितेशी? कौनसी प्रजाति के कलमकार? कौनसी सरकारो के “भांड “? लगता है देश मे पहली बार कोई घटना हुई है ? देश मे १९५४ की ग़लतिया जिसके कारण देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वार्थ सिद्धि […] Read more » Featured पुरस्कार वापसी
जन-जागरण टॉप स्टोरी मीडिया साहित्य तब कहां गया था तुम्हारा धर्म? November 3, 2015 / November 3, 2015 by देविदास देशपांडे | Leave a Comment किसी जंगल में शिकार का दौर चलता है, तब आम तर पर कुछ लोग जानवर के पीछे आवाज लगाते चलते है। ये लोग जानवर को एक दिशा में धकेलते है ताकि असली शिकारी उसकी शिकार कर सकें। फिलहाल देश में पुरस्कार वापसी का जो दौर चला है, वह इसी प्रथा की याद दिलाता है। अपने […] Read more » Featured samman vapsi तब कहां गया था तुम्हारा धर्म? पुरस्कार वापसी
कविता मुस्कुरा लो November 3, 2015 by बीनू भटनागर | Leave a Comment थोड़ी सी ख़ुशियां बांट लूं, ग़म सिमट जायेंगे, ओढ़लूँ उदासी तो, क्या ग़म लौट जायेंगे। सागर है तो उसमे, तूफ़ान आयेंगे जायेंगे, तूफ़ान से डर कर, मछुवारे क्या घर बैठ जायेंगे। फूलों से लदे पेड़ तो, ख़ुश नज़र आयेंगे, पतझड़ मे भी लेकिन, वो मुसकुरायेंगे। पूर्णिमा की रात हो तो, चाँद खिलखिलाताहै, अमावस की रात […] Read more » मुस्कुरा लो
लेख साहित्य मुझे भी सम्मान की दरकार, क्या सम्भव है? November 2, 2015 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ पाठकों मैं वादा करता हूँ कि यदि मुझे कोई सम्मान मिला तो मैं उसे कभी भी किसी भी परिस्थिति में लौटाने की नहीं सोचूँगा। एक बात और बता दूँ वह यह कि मेरी कोई पहुँच नहीं और न ही मैंने राजनीति के शिखर पर बैठे लोगों, माननीयों का नवनीत लेपन ही […] Read more » मुझे भी सम्मान की दरकार सम्मान की दरकार
व्यंग्य साहित्य चरित्र पर तो नहीं पुती कालिख! November 2, 2015 / December 7, 2015 by अशोक मिश्र | Leave a Comment अशोक मिश्र जब मैं उस्ताद गुनाहगार के घर पहुंचा, तो वे भागने की तैयारी में थे। हड़बड़ी में उन्होंने शरीर पर कुर्ता डाला और उल्टी चप्पल पहनकर बाहर आ गए। संयोग से तभी मैं पहुंच गया, अभिवादन किया। उन्होंने अभिवादन का उत्तर दिए बिना मेरी बांह पकड़ी और खींचते हुए कहा, ‘चलो..सामने वाले पार्क में […] Read more » चरित्र पर तो नहीं पुती कालिख!
कविता साहित्य माहौल देश का October 31, 2015 / October 31, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment देश का है माहौल गरमाया, कहकर लोगों ने सम्मान लौटाया. कभी बीफ का मुद्दा आया, कभी जातिवाद से, ध्यान भटकाया. क्या यही चुनावी मुद्दे है, क्या यही विकास की बातें हैं एक दूसरे को कोसने को, डिबेट में बैठ वो जाते हैं. क्या परिभाषा है विकास की, कहां रहे अब तक खोए, इतने दिन तक […] Read more » माहौल देश का
कहानी कहानी – वत्सला October 31, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment मंगलवार को साप्ताहिक बाजार बंदी के कारण कुछ फुर्सत रहती है। कल भी मंगलवार था। शाम को मैं अपनी पत्नी राधा के साथ चाय पी रहा था कि देहरादून से शिबू का फोन आ गया। – कैसे हो भाई.. ? – भगवान की दया है। – एक शुभ समाचार है। तुम्हारी सोनचिरैया के पर निकल […] Read more » Featured कहानी वत्सला
साहित्य पुरस्कार वापसी पर क्या कहते हैं बुद्धिजीवी October 30, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अक्षय दुबे ‘साथी’ राहुल देव (वरिष्ठ पत्रकार) मैं ये मानता हूँ कि कोई भी राष्ट्रीय पुरस्कार कोई दल नहीं देता बल्कि एक चयन प्रक्रिया के बाद देश के द्वारा दिया जाता है,तो ऐसे में यह पुरस्कार लौटाना उचित नहीं है.लेकिन जो कुछ हो रहा है उसको सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता […] Read more » Featured पुरस्कार वापसी
लेख साहित्य ‘साजिश के तहत सम्मान वापसी का सिलसिला’ October 30, 2015 by दीपक शर्मा 'आज़ाद' | 3 Comments on ‘साजिश के तहत सम्मान वापसी का सिलसिला’ पश्चिम के किनारों पर बैठ कर जो लोग अपने ही मुल्क की ईबारत लिखने की कोशिशों में जुटे हैं, वे एक दिन इस राष्ट्र का सर्वनाश कर बैठेंगे। वैसे अब कोई कसर तो बची नहीं, वाममार्गियों ने भारतीय इतिहास के साथ जो तोड़फोड़ की है उसका आभार। उनके हिसाब से भारतीय स्वात़ंत्र्य समर 1857 महज […] Read more » Featured सम्मान वापसी सम्मान वापसी का सिलसिला
कविता साहित्य कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे October 29, 2015 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे दिल की बात बयाँ करूँ भी तो कैसे मांगते दुआएं अब तो दिल ये थका न पाया कभी जो भी तुझ से कहा मकसदे ज़िन्दगी की नेमत नहीं दी हौसले आजमाने की जहमत नहीं की कहते हैं पल पल पे हैं तेरी हुकुमरानी जैसी तू चाहे जिसे […] Read more » कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे
कला-संस्कृति लेख विविधा शातिर मैकाले का मोहरा – हिन्दू धर्म का महान शत्रु “मैक्स मूलर” October 29, 2015 by हरिहर शर्मा | Leave a Comment फ्रेडरिक मैक्समूलर एक ऐसा नाम है जिसे ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया ! परन्तु क्या यह सत्य है ? जी नहीं सत्य ऐसे बिलकुल विपरीत है ! वास्तव में मैक्स मूलर […] Read more » Featured मैक्स मूलर शातिर मैकाले का मोहरा हिन्दू धर्म का महान शत्रु