व्यंग्य ई जो है पॉलिटिक्स…!! February 9, 2015 / February 9, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा राजनयिक और कूटनीतिक दांव – पेंच क्या केवल खादी वाले राजनीतिक जीव या सूट – टाई वाले एरिस्टोक्रेट लोगों के बीच ही खेले जाते हैं। बिल्कुल नहीं। भदेस गांव – देहातों में भी यह दांव खूब आजमाया जाता है। बचपन में हमें अभिभावकों के साथ अक्सर घुर देहात स्थित अपने ननिहाल […] Read more » पॉलिटिक्स
व्यंग्य चुनावी मौसम, देश भक्ति का आलम February 6, 2015 by रवि श्रीवास्तव | 1 Comment on चुनावी मौसम, देश भक्ति का आलम चुनावी मौसम आते ही राजनीतिक पार्टियों के नेताओं में जबरजस्त देश भक्ति का आलम जाग उठता है। जो 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन देखने को मिलता है। हर प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में गाने देश भक्ति के गाने बजते हैं। कार, आटो, से लेकर रिक्शा तक में हम जिएगें और मरेगें ए […] Read more » चुनावी मौसम देश भक्ति का आलम
साहित्य जम्मू कश्मीर के इतिहास का एक दु:खद अध्याय/ महाराजा हरि सिंह का निष्कासन February 6, 2015 by डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री | 1 Comment on जम्मू कश्मीर के इतिहास का एक दु:खद अध्याय/ महाराजा हरि सिंह का निष्कासन — डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद और भारतीय रियासतों का देश की नई सांविधानिक व्यवस्था में अधिमिलन हो जाने के बाद महाराजा हरि सिंह इतना तो समझ ही चुके थे कि इतिहास का रथ जिस दिशा में जा रहा है , उसे वापिस नहीं पलटा जा सकता । वैसे तो […] Read more » जम्मू कश्मीर के इतिहास का एक दु:खद अध्याय महाराजा हरि सिंह महाराजा हरि सिंह का निष्कासन
व्यंग्य मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी February 5, 2015 by अनुज अग्रवाल | 2 Comments on मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी गतांक से आगे (पढ़े पिछला अंक “तोरई आदमी पार्टी ”) मित्रों तोरई आदमी पार्टी अपना पहला चुनाव लड़ने जा रही है | दिल्ली का चुनाव | और चुनाव बिना घोषणापत्र के नहीं लड़ा जा सकता | बाकी सभी पार्टियों के अपना अपना मैनिफेस्टो जारी कर दिया है | आज हम भी अपनी पार्टी का […] Read more » तोरई आदमी पार्टी मैनिफेस्टो मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी
कविता क्योंकि फागुन नीचे उतर आया है February 5, 2015 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment ऋतुओं के राजा फागुन के स्वागत में एक कविता बहुत से पहाड़ आ जातें हैं इन दिनों बहुत नीचें कुछ अधिक नम्र, प्रसन्नचित्त और समन्वय भरे हो जाते हैं वे क्योंकि फागुन नीचें उतर आया है. सूरज कुछ हो चलता है अधिक अधिक सा उजला घटाटोपों से संघर्ष कर वह निकल आता […] Read more » फागुन
व्यंग्य प्रीतिभोज से पार्टी तक….!! February 4, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा कोई भी एेसा मौका जिसके तहत दस लोगों को दरवाजे बुलाना पड़े, पता नहीं क्यों मुझमें अजीब सी घबराहट पैदा कर देती है। कुछ साल पहले छोटे भाई की शादी में न चाहते हुए भी हमें आयोजित भोज का अगुवा बनना पड़ा। अनुभवहीन होने के चलते डरते – डरते इष्ट – […] Read more » प्रीतिभोज से पार्टी तक
आलोचना कांग्रेस से जो तलछट उफन -उफ़न कर भाजपा में जा रही है -वही उसके पतन का कारण बनेगी। February 3, 2015 by श्रीराम तिवारी | 5 Comments on कांग्रेस से जो तलछट उफन -उफ़न कर भाजपा में जा रही है -वही उसके पतन का कारण बनेगी। कांग्रेस एक गई गुजरी राजनैतिक पार्टी हो चुकी है। अधिकांस कांग्रेसी नेता नाकारा हो चुके हैं ,बदनाम तो वे पहले ही बुरी तरह से हो चुके हैं।चूँकि सत्ता चली गई तो डूबती नाव के मेंढकों की मानिंद उछल-कूंद भी करने लगे हैं । जब यूपीए का नेतत्व करते हुए कांग्रेस सत्ता में हुआ करती थी तब […] Read more »
कहानी फ़रिश्ता February 2, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment बहुत साल पहले की ये बात है. मुझे कुछ काम से मुंबई से सूरत जाना था. मैं मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर ट्रेन का इन्तजार कर रहा था. सुबह के करीब ६ बजे थे. मैं स्टेशन में मौजूद बुक्स शॉप के खुलने का इन्तजार कर रहा था ताकि सफ़र के लिए कुछ किताबे और पेपर खरीद […] Read more » फ़रिश्ता
कविता हम सब मिल शीश झुकायेंगे January 31, 2015 by विमलेश बंसल 'आर्या' | Leave a Comment हम सब मिल शीश झुकायेंगे, गुरु देव दयानंद दानी को। उस वैदिक वीर पुरोधा की, गायेंगे अमर कहानी को॥ 1.अट्ठारह सौ इक्यासी की, फ़ाल्गुन कृष्णा दशमी तिथि को, गुजरात प्रांत टंकारा में, था जन्म लिया मूलक मिति को। शंकर से शंकर मूल मिला, कर्षन जी धन्य भवानी को॥ 2.लो सुनो सुनाऊँ तुम्हें कथा, उस वीर […] Read more » हम सब मिल शीश झुकायेंगे
कविता शहीदों के प्रति January 30, 2015 by बलवन्त | Leave a Comment कब्र पर जिनके आँसू बहाया गया। जिन्दगी भर जिन्हें आजमाया गया। जान जिसने लुटा दी वतन के लिए, सिरफ़िरा कल उन्हें ही बताया गया। फ़ख्र से गीत जिनके पढ़े जा रहे, विष उन्हें कल यहीं पर पिलाया गया। सिलसिले वायदों के चले आ रहे, क़र्ज़ फिर भी न उनका चुकाया गया। Read more » शहीदों के प्रति
आलोचना सेंसर,बाबा और सियासत January 28, 2015 / January 28, 2015 by जावेद अनीस | Leave a Comment जावेद अनीस धर्म, राजनीति और पैसे की तिकड़ी के खेल बड़ी तेजी से फलफूल रहा है, वैसे तो एक निराश, शोषित,परेशान और बिखरे समाज में बाबाओं का उभार कोई हैरानी की बात नहीं है लेकिन परेशानी तब पैदा होती है जब ये तथाकथित बाबा लोग बेलगाम हो जाते हैं और कुछ तो अपने आपको ईश्वर […] Read more » बाबा और सियासत सेंसर
आलोचना पहले अन्ना.. फिर केजरीवाल और अब किरण…!! January 27, 2015 / January 28, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment कहते हैं झूठी उम्मीदें जितनी जल्दी टूट जाए, अच्छी। लेकिन बात वही कि उम्मीद पर ही दुनिया भी टिकती है। पता नहीं यह हमारी आदत है या मजबूरी कि हम बार – बार निराश होते हैं, लेकिन नायकों की हमारी तलाश अनवरत लगातार जारी रहती है। चाहे क्षेत्र राजनीति का हो या किसी दूसरे क्षेत्रों […] Read more »