कविता उसे नारी हैं कहे January 16, 2014 / January 16, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment जहां है त्याग, समर्पण, जहां है धैर्य बेहिसाब यही है रूप-ओ-नारी, जिसे आता है यहां प्यार कभी मां-बाप, कभी भाई, कभी पति-बेटा सहे विरोध है सबका, न करती कोई आवाज़ न जाने कब से सह रही थी जुल्मों सितम को जो लड़े हक की लड़ाई उसे मलाला कहें कभी सती, कभी पर्दा कभी रिवाजे-ए-दहेज़ ये […] Read more » poem उसे नारी हैं कहे
व्यंग्य वंशपूजन January 14, 2014 / January 15, 2014 by बीनू भटनागर | 1 Comment on वंशपूजन कांग्रेस पार्टी के लोग आजकल कहने लगे हैं कि उनपर वंशवाद का आरोप व्यर्थ में लगाया जाता है, क्योंकि सभी राजनैतिक पार्टियों अपने के नेताओं के बेटे बहुओं, बेटियों, दामादों, नाती-पोतों को चुनावी टिकट दे रही हैं। आम आदमी पार्टी के अलावा और कोई पार्टी इस बात से इनकार भी नहीं कर सकती। आम आदमी पार्टी का तो अभी जन्म ही हुआ है, उनके अभी बेटे बहुएं कहां से आयेंगे। हां जी, वंशवाद तो उ.प्र. का समाजवादी पार्टी का भी ग़जब है। सब यादव ही यादव… बेटा-बहू, भाई, भतीज़े, चाचा, ताऊ सभी मिलकर उत्तर प्रदेश को चला रहे हैं या जला रहे हैं। शिवसेना का वंशवाद भी भरोसे का है। बालठाकरे फिर उद्धव ठाकरे ही… ठाकरे … जब तक माता या पिता की कुर्सी सीधे सीधे उनके बच्चों को न मिले वंशवाद नहीं होता। यों तो अमिताभ बच्चन का बेटा भी फिल्मों में है, पर अमिताभ बच्चन की जगह तो नहीं है, उनसे कोसों दूर है। सुनील गवास्कर का बेटा भी क्रिकेट खेलता रहा, पर अपने पिता के आस-पास भी नहीं पंहुचा। ये वंशवाद नहीं है। कांग्रेस का वंशवाद तो वंशवाद से भी एक क़दम आगे है। ऐसा उदाहरण तो ढूंढने से भी देश […] Read more » Satire वंशपूजन
कविता अधरों की हंसी हो या January 14, 2014 / January 14, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मौन! अधरों की हंसी हो या आंखों से आंसू हों, आंखों से आंखों की बात होती है, क्योंकि, मौन की भी एक निराली भाषा होती है! जब कोई तस्वीर सामने होती है, बिना मिले ही उनसे बात होती है, कभी मु्स्कान या नमी आंखों में होती है, बिन कहे ही मन से मन की बात […] Read more » poem अधरों की हंसी हो या अंधरों की हंसी हो या
व्यंग्य सावधान! मेनका उर्वशी पधार रही हैं… January 14, 2014 / January 14, 2014 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम- उनकी सैफई को धूल चटाने के लिए हमने आनन-फानन में अपनी पार्टी के जनरल हाउस में दो मिनट में ही ध्वनि मत से यह प्रस्ताव पारित कर दिया कि हम जनता के लिए कुछ कर पाए या नहीं, पर उनकी सैफई को जवाब हम हर हाल में देकर रहेंगे! मेरे ऊपर से […] Read more » Saifai mahaotsav Satire सावधान! मेनका उर्वशी पधार रही हैं...
कहानी अनसुलझे सवाल! January 13, 2014 / January 13, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment -अश्वनी कुमार- कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। पैरों से चढ़ती ठण्ड हाथों के कम्पन से होती हुई, दांतों की कड़कड़ाहट तक जा रही थी। घर से निकला तो देखा कोहरे की सफ़ेद चादर ने सारे आसमान पर अपना अस्तित्व जमा रखा है। कदम आगे की ओर बढ़ने से मना कर रहे थे, पर […] Read more » Story अनसुलझे सवाल
कविता कैद मिली तो क्या हुआ? January 13, 2014 / January 13, 2014 by श्यामल सुमन | Leave a Comment जिसको जितना ज्ञान कम, अधिक बोलते लोग। ज्ञानीजन बोले नहीं, सुमन दुखद संयोग।। कैद मिली तो क्या हुआ, होता खूब प्रचार। मंत्री होते कैद में, सुमन चले सरकार।। नाकाबिल साबित सुमन, पर देखो अभिमान। कम से कम मंत्री बने, नालायक सन्तान।। सूरत पे मुस्कान है, भीतर भरा तनाव। युग परिवर्तन का सुमन, देखो नित्य प्रभाव।। […] Read more » poem कैद मिली तो क्या हुआ?
कविता प्रेम नहीं मजबूर January 12, 2014 / January 12, 2014 by श्यामल सुमन | Leave a Comment -श्यामल सुमन- सुमन प्रेम की राह में, कांटे बिछे अनेक। दर्द हजारों का मिले, चुभ जाता जब एक।। त्याग प्रेम का मूल है, मगर सहित सम्मान। करता हंसकर के सुमन, अपना जीवन-दान।। प्रेम गली में क्यों सुमन, खड़ी मिले दीवार। सदियों से क्यों चल रहा, दुनिया का व्यवहार।। भीतर चाहत प्रेम की, बाहर करे […] Read more » poem प्रेम नहीं मजबूर
कविता प्रकृति की मौलिकता January 11, 2014 / January 11, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment दो-दो फुट दिन में जुड़वा दें, दो फुट की बढ़वा दें रात| किसी तरह से क्यों न बापू, बड़े-बड़े कर दें दिन रात| छोटे-छोटे दिन होते हैं, छोटी-छोटी होती रात| ना हम चंदा से मिल पाते, ना सूरज से होती बात| नहीं जान पाते हैं अम्मा, क्या होती तारों की जात| ना ही हमें पता […] Read more » poem प्रकृति की मौलिकता
लेख सर्वोदय और मार्क्स January 10, 2014 / January 10, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -दिनेश कुमार- जातिविहीन, वर्ग विहीन व शोषण से मुक्त समाज का सपना महात्मा गांधी ने देखा था और उन्होंने सर्वोदय जैसा एक दर्शन उसके लिए विकसित किया। ऐसा ही एक प्रयास पश्चिम के समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स ने भी किया। मार्क्स ने समाज को शोषण से मुक्त करने के लिए एक क्रांति की प्रक्रिया […] Read more » Sarvoday and Marks सर्वोदय और मार्क्स
कविता महात्मा वेदपाल प्रभु शरणाश्रित को नमन January 9, 2014 / January 9, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -विमलेश बंसल ‘आर्या’- 1. ईश्वर दास के लाला लाल, था नाम महात्मा वेद पाल। जनवरी दस को जन्म लिया था, ईश्वर का गुणगान किया था। प्रभु शरणाश्रित बन किया कमाल॥ शत्-शत् नमन हे ईश्वर लाल 2. हंसमुख थे बहु भोले-भाले, गोरे रंग के थे, दिलवाले। नम्र-शील जिनका स्वभाव, तेजस्वी मुख पर प्रभाव। मस्त-व्यस्त हृदय विशाल॥ […] Read more » poem महात्मा वेदपाल प्रभु शरणाश्रित को नमन
कविता कुबड़ी आधुनिकता January 9, 2014 / January 9, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -दीप्ति शर्मा- मेरा शहर खांस रहा है सुगबुगाता हुआ कांप रहा है सडांध मारती नालियां चिमनियों से उड़ता धुआं और झुकी हुयी पेड़ों की टहनियां सलामी दे रहीं हैं शहर के कूबड़ पर सरकती गाड़ियों को, और वहीं इमारत की ऊपरी मंजिल से कांच की खिड़की से झांकती एक लड़की किताबों में छपी बैलगाड़ियां देख […] Read more » poem कुबड़ी आधुनिकता
कविता जीवन में आगे ही बढ़ें January 8, 2014 / January 8, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment वो तूफ़ान में फंसी, हमारी डूबती नैया एक लकड़ी के सहारे, हम किनारा ढूँढ़ने निकले वो डरावनी अंधेरी रात, जंगल में फंसे थे जब कहीं चमके कई जुगनू, उसी की रौशनी में हम रस्ता ढूँढ़ने निकले। वो ऊंची सी खड़ी चट्टान, काई में फिसलते पांव हमे जाना था उसके पार, एक रस्सी के सहारे ही हम गंतव्य तक पंहुचे। एक […] Read more » poem जीवन में आगे ही बढ़ें