गजल गज़ल:ज़िन्दगी बहता पानी है–सतेन्द्रगुप्ता June 20, 2012 / June 20, 2012 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment ज़िन्दगी बहता पानी है ,बहने दो उसे अपना रास्ता ,ख़ुद ही ढूँढने दो उसे। बिना लहरों के समन्दर फट जायेगा जी खोल कर के ही, मचलने दो उसे। नदी के अन्दर भी, एक नदी बहती है रफ़्ता रफ़्ता समंदर से मिलने दो उसे। घर किनारे टूट करवरना ढह जायेंगे उफ़न कर, कभी न बिखरने दो […] Read more » गज़ल:ज़िन्दगी बहता पानी है–सतेन्द्रगुप्ता
जन-जागरण पुस्तक समीक्षा छल-कपट और कुटिलता से होता है – धर्मांतरण June 20, 2012 / June 20, 2012 by आर.एल. फ्रांसिस | Leave a Comment आर.एल.फ्रांसिस धर्मांतरण को लेकर चर्च के पादरी हमेशा सर्तक रहते है जब भी उन पर धोखाधड़ी या लालच देकर धर्मांतरण करवाने के आरोप लगते है तो वे इसे सिरे से खारिज कर देते है। आरोप लगाने वालो से प्रमाण पेश करने को कहा जाता है। झांसी निवासी कैथोलिक र्इसार्इ विचारक पी.बी. लोमियों द्वारा लिखित […] Read more » religious conversion धर्मांतरण
व्यंग्य व्यंग्य बाण : इतनी सुरक्षा और कहां ? June 18, 2012 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार शर्मा जी के मौहल्ले में जब एक ही महीने में तीसरी बार चोरी हो गयी, तो लोगों के धैर्य का बांध टूट गया। कोई इसे हाइटैक चोरों की चालाकी बता रहा था, तो कोई पुलिस से मिलीभगत। कुछ इसे मोहल्ले वालों की लापरवाही बताकर मामला रफादफा करना चाहते थे; पर काफी सिरखपाई के […] Read more »
आलोचना साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं June 18, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं जगदीश्वर चतुर्वेदी आलोचक अशोक वाजपेयी को यह इलहाम हुआ है कि हिन्दी की गोष्ठियों में घिसापिटापन होता है। सवाल यह है कि उस घिसेपिटेपन से बचने के लिए हिन्दी के प्रायोजकों और गुटबाज लेखकों ने क्या किया ?पहले अशोक वाजपेयी की महान खोज पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा है- “हम सभी इसके दोषी हैं। हिंदी […] Read more » अशोक वाजपेयी
कविता कविता:मैँ कहाँ जाऊँ-मोतीलाल June 17, 2012 / June 17, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मैँ कहाँ जाऊँ किसी स्वर्ग जैसा अब नर्क कहाँ बचा है यहाँ जहाँ कशिश से भरी आँखोँ मेँ गालिब की गजले महकती हो जहाँ मेरी जर्जर कमीज की जेब से कोई सादा कागज निकल आता हो कहाँ जाऊँ मैँ ताकि किसी अदृश्य उद्धेश्य के लिए संसद की दीवारेँ न ढहे और दायित्व के पंखोँ […] Read more » poem by motilal कविता:मैँ कहाँ जाऊँ कविता:मैँ कहाँ जाऊँ-मोतीलाल
साहित्य संस्मरण – ३ : मानवता अभी मरी नहीं है / विपिन किशोर सिन्हा June 12, 2012 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment संस्मरण-१ : मानवता अभी मरी नहीं है संस्मरण-२ : मानवता अभी मरी नहीं है अब तक आशा काफी सहज हो चुकी थी। मैंने उससे उसके गांव का नाम पूछा। उसने बताया कि वह अपने गांव नहीं जाएगी। वहां उसका कोई नहीं है। वह शहरी महिला भी ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वहां पहुंच सकती है। उसने अपनी बुआ के […] Read more »
पुस्तक समीक्षा रोम-रोम में बसे हैं प्रभु राम June 12, 2012 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment लोकेन्द्र सिंह राजपूत रामकथा आदर्श जीवन की संपूर्ण गाइड है। राम भारतवर्ष के प्राण हैं। वे भारत के रोम-रोम में बसे हैं। यही कारण है कि उनका अनादर देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। ‘मेरे राम मेरी रामकथा’ लिखने से पूर्व प्रख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली राम चरित्र पर एक वृह्द उपन्यास लिख चुके हैं, जिसे खूब […] Read more » नरेंद्र कोहली मेरे राम मेरी रामकथा
साहित्य संस्मरण-२ : मानवता अभी मरी नहीं है / विपिन किशोर सिन्हा June 11, 2012 / June 11, 2012 by विपिन किशोर सिन्हा | 1 Comment on संस्मरण-२ : मानवता अभी मरी नहीं है / विपिन किशोर सिन्हा एक दिन बाद जिला प्रशासन सक्रिय हुआ। कुछ राहत सामग्री उन्हें दी गई। बचे लोगों को गांव के स्कूल में रखा गया। एक सप्ताह भी नहीं बीता होगा, इस घटना के, कि शहर से एक पढ़ी-लिखी महिला पीड़ितों से मिलने आई। उसकी दृष्टि आशा पर पड़ी। उसने बड़े प्रेम से उसे चाकलेट दिया, बिस्कुट खिलाया […] Read more »
साहित्य संस्मरण-१ : मानवता अभी मरी नहीं है / विपिन किशोर सिन्हा June 11, 2012 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment ७, मार्च, २०१२ का दिन था। सुबह के सात बजे थे। १४००६ डाउन लिच्छवी एक्स्प्रेस वाराणसी के प्लेटफार्म नंबर-एक पर खड़ी हुई। मुझे इसी ट्रेन से अपने गांव के निकततम स्टेशन दुरौन्धा जाना था। यह स्टेशन सिवान और छपरा के बीच में स्थित है। मेरे पास द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित शयनयान का टिकट था। मैं […] Read more »
गजल गजल:नसीब-राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ June 11, 2012 / June 10, 2012 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment तू नहीं, बेवफा नसीब मेरा | मैं पा सका न तुझको, क्या कुसूर तेरा | तू बेवफा नहीं, बेवफा नसीब मेरा | दिल की किताब को शायद मैंने पढ़ा नहीं था | न राँझा मिला था हीर को न मजनू लैला से मिला था | इन प्यार के किस्सों में न बांधा किसी ने सेहरा […] Read more » gazal by raghavendra गजल:नसीब गजल:नसीब-राघवेन्द्र कुमार 'राघव'
गजल हाथ दुश्मन का थाम लूं कैसे….. June 11, 2012 / June 10, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी ऐसा मसलों का हल बताये कोई, के ग़रीबों को ना सताये कोई। मुंसिफ़ों तक पहुंच है मुजरिम की, जुर्म से कैसे बाज़ आये कोई। ज़ालिमों को सज़ा भी दो ऐसी, दिल किसी का ना फिर दुखाये कोई। हाथ दुश्मन का थाम लूं कैसे , वो नई चाल चल ना जाये […] Read more » gazal by iqbal hindustani हाथ दुश्मन का थाम लूं कैसे
कविता कविता:बुरा दिन-मोतीलाल June 6, 2012 / June 6, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment रोशनी का बुरा दिन देखने योग्य बची कहाँ है कि खिझा हुआ अँधकार अपने लंबे नाखूनोँ वाले पंजे फैलाकर चपेट ले सारी रोशनियोँ को और कोई त्रासद संगीत नेपथ्य मेँ बज उठे तब क्या देखने योग्य चीजेँ बाजार मेँ उतारे जाएगेँ और क्या सुलाए जा सकेगेँ चीखते हुए बच्चोँ को खामोश पलोँ मेँ रोशनी […] Read more » poem by motilala कविता:बुरा दिन कविता:बुरा दिन-मोतीलाल