कविता कविता: जंगल का ‘गणतन्त्र’ January 27, 2010 / December 25, 2011 by राकेश उपाध्याय | 4 Comments on कविता: जंगल का ‘गणतन्त्र’ लेखक एवं पत्रकार राकेश उपाध्याय स्फुट कविताएं भी लिखते रहते हैं। उनकी कविताएं पूर्व में प्रवक्ता वेब पर प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रवक्ता के लिए उन्होंने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर एक खास व्यंग्यात्मक कविता रची है। इसे हम अपने पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है कि पाठक गण उनकी रचनाधर्मिता […] Read more » Independence Day कविता गणतंत्र दिवस
पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा: आकाशवाणी समाचार की दुनिया से परिचय January 22, 2010 / December 25, 2011 by लीना | Leave a Comment पुस्तक ‘आकाशवाणी समाचार की दुनिया’ आवाज के आरोह-अवरोह से हमारा बखूबी परिचय कराती है। यों तो आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना की स्वर्ण जयंती (28 दिसंबर 2009) के अवसर पर आई है यह पुस्तक। लेकिन इसका दायरा विस्तृत है। यह न सिर्फ आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश के विगत पचास वर्षों का इतिहास एक […] Read more » Book Review पुस्तक समीक्षा
कविता मां शारदे मुझे सिखाती January 20, 2010 / December 25, 2011 by स्मिता | 2 Comments on मां शारदे मुझे सिखाती दौर नया है युग नया है हानि-लाभ की जुगत में चारों ओर मची है आपाधापी मां शारदे मुझे सिखाती तर्जनी पर गिनती का स्वर न काफी भारत की थाती का ज्ञान न काफी सिर्फ अपना गुणगान न काफी मां शारदे मुझे सिखाती नवसृजन की भाषा सीखो मानव मुक्ति का ककहरा सीखो भव बंधन के बीच […] Read more » poem कविता मां शारदे
व्यंग्य व्यंग्य/ मोहे इंडिया न दीजौ January 19, 2010 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment वैसे तो यमलोक में अनगिनत ऐसी आत्माएं हत्या, आत्महत्या का शिकार हो प्रेतयोनि में बरसों से अपने फैसले के इंतजार में बैठी हैं कि कब जैसे उनका फैसला यमराज करें और वे प्रतयोनि से मुक्त हो जिस योनि में उनका हक बनता है उस योनि में जन्म ले यमपुरी के भयावह दृश्यों से मुक्त हों। […] Read more » vyangya व्यंग
कविता सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ की पांच कविताएं January 16, 2010 / January 16, 2010 by सुदर्शन प्रियदर्शनी | Leave a Comment औल कल मेरी औल कट जायेगी इतने बरसों बाद। जब मिट्टी से टूटता है कोई तो औल कटती है बार बार। कल मै बनूँगी नागरिक इस देश की जिस को पाया मैने सायास पर खोया है सब कुछ आज अनायास़। कल मेरी औल कटेगी भटकन इतना मायावी तांत्रिक जाल इतना भक भक उजाला इतना भास्कर […] Read more » कविताएँ प्रियदर्शनी सुदर्शन
कविता नज़्म/ मेरे महबूब January 2, 2010 / January 2, 2010 by फ़िरदौस ख़ान | 2 Comments on नज़्म/ मेरे महबूब मेरे महबूब ! उम्र की तपती दोपहरी में घने दरख्त की छांव हो तुम सुलगती हुई शब की तन्हाई में दूधिया चांदनी की ठंडक हो तुम ज़िन्दगी के बंजर सहरा में आबे-ज़मज़म का बहता दरिया हो तुम मैं सदियों की प्यासी धरती हूं बरसता-भीगता सावन हो तुम मुझ जोगन के मन-मंदिर में बसी मूरत हो […] Read more » नज़्म
कविता नववर्ष पर तीन कविताएँ December 30, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | 3 Comments on नववर्ष पर तीन कविताएँ नववर्ष से तुम एक बार फिर वैसे ही आ गए और मैं एक बार फिर वैसे ही तुम्हारे सामने हूँ हमेशा की तरह अपने साथ आशाओं के दीप ले आये हो तुम हौले-हौले मेरे पास अपने भीतर की तमाम उर्जा इकठ्ठा कर पुन: चल दूँगा मैं भी तुम्हारे साथ 2 नववर्ष में मैं हर नववर्ष […] Read more » New Year नव वर्ष
व्यंग्य व्यंग्य/हे नेता, नेता, नेतायणम्!! December 28, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment लोमश जी कहते हैं- जो सुजान नागरिक नेता के आंगन में अपनी चारपाई केनीचे के गंद की अनदेखी कर झाड़ू लगाता है वह निश्चय ही एक दिन संसद में पहुंच संपूर्ण देश के लिए वंदनीय हो जाता है। जो नेता के जलसों के लिए भीड़ इकट्ठी करता है वह आगे चलकर संसद में सबसे आगे […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता पाँच प्रेम कविताएँ December 26, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | 9 Comments on पाँच प्रेम कविताएँ 1 इंतजार मैं तो भेजता रहूँगा हमेशा उसको ‘ढाई आखर’ से पगे खत अपने पीड़ादायक क्षणों से कुछ पल चुराकर उन्हें कलमबद्ध करता ही रहूँगा कविताओं और कहानियों में मैं सहेज कर रखूँगा सर्वदा उन पलों को जब आखिरी बार उसने अपने पूरेपन से समेट लिया था अपने में मुझे और दूर कहीं हमारे मिलन […] Read more » Love poem प्रेम कविता
व्यंग्य व्यंग्य/ अंधेर नगरी लोकतांत्रिक राजा December 21, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ अंधेर नगरी लोकतांत्रिक राजा सुनो! सुनो !!सुनो!!! अंधेर नगरी के लोकतांत्रिक राजा का फरमान! जो भी आज से उनके राज्य में सच बोलेगा, उसका होगा चालान। झूठ बोलने वाला हर आम और खास को बराबर पुरस्कृत किया जाएगा। अंधेर नगरी में ईमानदारी बंद। सरकार के आदेश-कानून ईमानदारों के साथ कतई भी नरमी न बरते। जो भी कानून का हवलदार […] Read more » vyangya व्यंग
व्यंग्य धनंजय के तीर/ ……..और अब लेखक लैंड?? December 15, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on धनंजय के तीर/ ……..और अब लेखक लैंड?? महीने बाद सरकारी टूअर के बहाने मस्ती मारकर घर में कदम रखा भर ही था कि पत्नी ने सांस लेने से पहले ही खबर तमाचे की तरह गाल पर दे मारी, ‘सुनो जी!’ ‘क्या है??’ ये कम्बखत घर है ही ऐसी बला कि घर में कदम बाद में पड़ते हैं पत्नी समस्या उससे पहले तमाचे […] Read more » Dhananjay धनंजय
व्यंग्य व्यंग/ भ्रष्टाचार के बदलते रंग December 14, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | Leave a Comment कलयुग में एक मुस्लिम फ़कीर अपनी दुआ बिना कैश और काइंड लिये हुए राहगीरों को अता फ़रमा रहा है-अल्लाह आपकी नाज़ायज़ तमन्नाओं को पूरा करे। अल्लाह आपको ज़कात और ख़ैरात देने के काबिल बनाये। अल्लाह आपको हाज़ी-नमाज़ी और पाज़ी बनाये। अल्लाह आपको कोड़ा की सोहबत में रखे। अल्लाह आपको अच्छी कंपनियों के खाते अता फ़रमाये। […] Read more » Corruption भ्रष्टाचार