आलोचना समीक्षा का अतिवाद है ‘प्रशंसा’ और ‘खारिज करना’ April 2, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment हिन्दी साहित्यालोचना में मीडिया में व्यक्त नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में […] Read more » Sahitya साहित्य आलोचना
व्यंग्य व्यंग्य/…..उसके डेरे जा!!! March 30, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/…..उसके डेरे जा!!! ईमानदारी, सच, विश्वास की रूखी सूखी, आधी पौनी खाते हुए मर मर के जी रहा था कि उस दिन परम सौभाग्य मेरा एक सच्चा दोस्त मुझे पहुंचे हुए बाबा के पास जबरदस्ती ले गया, यह कहकर कि ये वे पहुंचे हुए बाबा हैं कि जो अपने भक्तों के दुख फूंक मार कर पल छिन में […] Read more » vyangya व्यंग्य
आलोचना नपुंसक आलोचक और नदारत आलोचना March 29, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on नपुंसक आलोचक और नदारत आलोचना स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य को लेकर काफी लिखा गया है। खासकर कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कृतियां हैं जो किसी न किसी रूप में साहित्यिक परिदृश्य पर रोशनी डालती हैं। हम खुश हैं कि हमारे पास रामविलास शर्मा हैं, नामवरसिंह हैं, शिवकुमार मिश्र हैं, रमेशकुंतल मेघ हैं, अशोक वाजपेयी हैं। जाहिरा […] Read more » hindi आलोचक आलोचना हिंदी
व्यंग्य व्यंग्य/ तो तुम किसके बंदे हो यार? March 22, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | 3 Comments on व्यंग्य/ तो तुम किसके बंदे हो यार? भाई ढाबे में टूटी बेंच पर चिंता की मुद्रा में बैठा था। बेंच के सहारे रखे डंडे में उसने अपनी टोपी पहना रखी थी। सामने टेबल पर चाय का गिलास ठंडा हो रहा था। पर वह उस सबसे बेखबर न जाने किस लोक में खोया था। मेरे देश में वर्दी वाला चिंता में? वह तो […] Read more » vyangya व्यंग्य
साहित्य जिंदादिल कथाकार मार्कण्डेय नहीं रहे March 19, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on जिंदादिल कथाकार मार्कण्डेय नहीं रहे आज सुबह मार्क्सवादी आलोचक अरुण माहेश्वरी का फोन आया और बताया कि भाई मार्कण्डेय नहीं रहे। सुनकर धक्का लगा और बेहद कष्ट हुआ, विश्वास नहीं हो रहा था भाई मार्कण्डेय का मौत हो गयी है। अभी कुछ दिन पहले ही अरुण-सरला माहेश्वरी उन्हें अस्पताल जाकर देखकर आए थे और दो -तीन दिन पहले मार्कण्डेयजी की […] Read more » Markandey मार्कण्डेय
साहित्य अज्ञेय जन्मशती पर विशेष- अज्ञेय के अलगाव और मार्क्स को क्यों भूल गए नामवर सिंह March 16, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment अशोक वाजपेयी ने रविवार (14 मार्च 2010) के जनसत्ता में अपने कॉलम में नामवर सिंह के द्वारा हाल ही में दिल्ली में दिए गए अज्ञेय के बारे में दिए भाषण के प्रमुख बिंदुओं को बताया है। वाजपेयी के अनुसार नामवरजी ने अज्ञेय की ‘नाच’ कविता का पाठ किया और आलोचना को कई नसीहतें दे ड़ालीं। […] Read more » Namwar Singh अज्ञेय अशोक वाजपेयी नामवर सिंह
कविता वंदना शर्मा की कविता March 16, 2010 / December 24, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on वंदना शर्मा की कविता याद आता है मुझे वो बीता हुआ कल हमारा, जब कहना चाहते थे तुम कुछ मुझसे, तब मै बनी रही अनजान तुमसे, जाना चाहती थी मैं दूर, पर पास आती गई तुम्हारे, लेकिन धीरे-धीरे होती रही दूर खुदसे, फिर तो जैसे आदत बन गई मेरी हर जगह टकराना जाके यूँ ही तुमसे, जब तक नहीं […] Read more » poem कविता
साहित्य ‘शाश्वती’ ने किया अज्ञेय स्मारक व्याख्यान का आयोजन March 15, 2010 / December 24, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment जम्मू के अज्ञेय प्रेमी हिन्दी साहित्यकारों की संस्था ‘शाश्वती’’ ने पहला अज्ञेय स्मारक व्याख्यान 7 मार्च 1998 को आयाजित किया था। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाजे हुए शाश्वती ने 7 मार्च 2010 को के.एल. सहगल हॉल जम्मू में अज्ञेय स्मारक व्याख्यान 2010 का आयोजन किया जिसमें हिन्दी के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार और व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक प्रेम […] Read more » Agyey smarak vyakhyan अज्ञेय स्मारक व्याख्यान
साहित्य हिन्दी के लेखक संगठनों में दरबारी संस्कृति March 13, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on हिन्दी के लेखक संगठनों में दरबारी संस्कृति उनकी आलोचना करो तो नाराज हो जाते हैं और प्रशंसा करो तो फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। वे चाहते हैं सच को किंतु प्यार करते हैं झूठ को। रहते हैं हकीकत में जीते हैं कल्पना में। ऐसी अवस्था है हिन्दी के लेखक संगठनों की। जो जितना बेहतरीन लेखक सामाजिक तौर पर उतना ही निकम्मा। श्रेष्ठता […] Read more » Writer organization लेखक संगठन
व्यंग्य व्यंग्य/ देश के फ्यूचर का सवाल है बाबा! March 13, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment ऐक्चुअली मैं उनका खासमखास तबसे हुआ जबसे मैंने चुनाव में उनके नाम भारी जाली मतदान सफलतापूर्वक करवाया था और वे भारी मतों से जीते थे। आज की डेट में उनको अकबर तो नहीं कह सकता पर मैं उनके लिए बीरबल की तरह हूं। जब भी वे परेशान होते हैं लाइफ लाइन में मुझे ही यूज […] Read more » vyangya व्यंग्य
पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा/‘बुद्धिजीवियों’ की मुश्किल March 12, 2010 / December 24, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on पुस्तक समीक्षा/‘बुद्धिजीवियों’ की मुश्किल पूरन चंद जोशी की नयी किताब ‘यादों से रची यात्रा’ किसी उपन्यास की तरह एक सांस में पढ़ गया। सभ्यता के भविष्य को लेकर गहरे सात्विक आवेग से भरी यह एक बेहद विचारोत्तेजक किताब है। मनुष्यता का भविष्य समाजवाद में है, इसमें उन्हें कोई शक नहीं है। पूंजीवाद उन्हें कत्तई काम्य नहीं है। ‘समाजवाद या […] Read more » Book Review पुस्तक समीक्षा
व्यंग्य नोबल पुरस्कार और गन्दगी March 9, 2010 / December 24, 2011 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment हम घर से निकले तो देखा कि कुडे करकट के ढेर के पास दडबे नुमा मकान में रहने वाला फटेहाल चितवन जो हमेशा ही मायूस और डरावनी सी खामोसी को चेहरे पर ओढे रखता था। आज अपनी बेगम को बडे ही उत्साह के साथ बता रहा था कि बेगम तुम्हे मालूम है कि समय सब […] Read more » Nobel Prize नोबल पुरस्कार