कविता साधो हर नेता मधु कोडा.. – गिरीश पंकज November 4, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 1 Comment on साधो हर नेता मधु कोडा.. – गिरीश पंकज साधो हर नेता मधु कोडा. जिसे मिला वो डट कर खाए, नहीं किसी ने मौका छोडा. साधो हर नेता मधु कोडा……. (१) मौका पा कर नेता लूटे, क्या जाने कब कुर्सी छूटे. राजनीति में अपराधी है. बहुत बड़ी अब ये व्याधी है. जनता अब तो जागे थोडा…. साधो हर नेता मधु कोडा….. (२) राजनीति अब […] Read more » Girish Pankaj गिरीश पंकज
व्यंग्य व्यंग्य: खट्टे सपने के सच – अशोक गौतम November 2, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment रात व्यवस्था की दीवारों से खुद को लहूलुहान करने के बाद थका हारा छाले पड़े पावों के तलवों में नकली सरसों के तेल की मालिश कर नकली दूध का गिलास पी फाइबर के गद्दों पर जैसे कैसे आधा सोया था कि अचानक जा पहुंचा गांव। देखा गांव वाले लावारिस छोड़ी अपनी गायों को ढूंढ ढूंढ […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य बिल है कि मानता नहीं.. October 30, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 1 Comment on बिल है कि मानता नहीं.. बिल, टैक्स, सेक्स और सेंसेक्स… जीवन का अर्थशास्त्र इन सबके इर्द-गिर्द घूम रहा है। उधर दुनिया में बिलगेट्स छाए हुए हैं, इधर हम बिल-टैक्स से जूझ रहे हैं। कई बार लगता है कि मनुष्य का जन्म बिल और टैक्स भरने के लिए ही हुआ है। इन बिलों का भरते-भरते मनुष्य का दिल बैठा जाता है […] Read more » Bill Girish Pankaj गिरीश पंकज बिल है कि मानता नहीं व्यंग्य
लेख आधारहीन शिक्षा – राजेश कुमार October 29, 2009 / December 26, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on आधारहीन शिक्षा – राजेश कुमार शिक्षा यानि व्यक्ति के विकास का आधार। किस देश ने कितना विकास किया है ये उस देश में साक्षरता की दर से निश्चित किया जाता है। प्रत्येक देश में एक विभिन्न शिक्षा प्रणाली प्रचलित है। भारत ने यूं तो समय के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत विकास किया है। जहां पहले हमारे देश […] Read more » Education आधारहीन शिक्षा राजेश कुमार शिक्षा
व्यंग्य नानक दुखिया सब करोबार : व्यंग्य – अशोक गौतम October 26, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on नानक दुखिया सब करोबार : व्यंग्य – अशोक गौतम धुन के पक्के विक्रमार्क ने जन सभा में वर्करों द्वारा भेंट की तलवार कमर में लपेटी चुनरी में खोंस बेताल को ढूंढने महीनों से खराब स्ट्रीट लाइटों के साए में निकला ही था कि एक पेड़ की ओट से उसे किसीके सिसकने की मर्दाना आवाज सुनाई दी। विक्रमार्क ने कमर में ठूंसी तलवार निकाल हवा […] Read more » Ashok Gautam Nanak Dukhiya Karobar अशोक गौतम करोबार नानक नानक दुखिया सब करोबार व्यंग्य
व्यंग्य योगा: नया आइटम सांग…. गिरीश पंकज October 23, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 2 Comments on योगा: नया आइटम सांग…. गिरीश पंकज पहले सड़कों पर तमाशा दिखाने वाले मदारियों का ड्रेस कोड नहीं होता था। अब वे समझदार हो गए हैं। आजकल वे भगवा ड्रेस में नज़र आते हैं। उस दिन शहर में एक हाइटेक मदारी आया। वह भगवा ड्रेस पहने हुए था। मदारी ने डुगडुगी बजाई । भीड़ जुटी। मदारी ने पापी पेट के लिए सबके […] Read more » Girish Pankaj Item Song Yoga आइटम सांग गिरीश पंकज योगा
व्यंग्य इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम : व्यंग्य – अशोक गौतम October 22, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम : व्यंग्य – अशोक गौतम वे सज धज कर यों निकले थे कि मानो किसी फैशन शो में भाग लेने जा रहे हों या फिर ससुराल। बूढ़े घोड़े को यों सजे धजे देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। बेचारों के कंधे कोट का भार उठाने में पूरी तरह असफल थे इसीलिए वे खुद को ही कोट पर लटकाए चले […] Read more » 21st Century Ashok Gautam Latest Love अशोक गौतम इक्कीसवीं सदी लेटेस्ट प्रेम व्यंग्य
कविता इल्जाम October 21, 2009 / December 26, 2011 by हिमांशु डबराल | 2 Comments on इल्जाम वो इस कदर गुनगुनाने लगे है, के सुर भी शरमाने लगे है… हम इस कदर मशरूफ है जिंदगी की राहों में, के काटों पर से राह बनाने लगे है… इस कदर खुशियाँ मानाने लगे है, के बर्बादियों में भी मुस्कुराने लगे है… नज्म एसी गाने लगे है, की मुरझाए फूल खिलखिलाने लगे है… चाँद ऐसा […] Read more » Himanshu Dabral Ilzam इल्जाम हिमांशु डबराल
व्यंग्य व्यंग्य: अवतारी अब बाजारन के – अशोक गौतम October 18, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे मेरे देश के दीवाली के दिन राम के चौदह बरस का बनवास काट कर आने की खुशी में रात भर जुआ खेलने वाले जुआरियो! हे मेरे देश के दीवाली के नाम पर मातहतों का गला काट कर गिफ्टों के नाम पर शूगर के पेशेंट होने के बाद भी अपना घर मिठाइयों से भरने के […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है…गिरीश पंकज… October 16, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 2 Comments on मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है…गिरीश पंकज… मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है, वरना इस महंगाई में तो रूखी-सूखी थाली है।। जो गरीब है, वह भी तो त्यौहार मनाया करता है, लेकिन पूछो तो खुशियाँ वह कैसे लाया करता है। भीतर आँसू हैं, बाहर मुस्कान दिखाई देता है, पीड़ा भी धन वालों को इक गान सुनाई देता है। सच […] Read more » excitement उत्साह
कविता दीवाली पर एक गीत..- गिरीश पंकज October 15, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. . हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली, जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. . जिनके घर में अँधियारा है, उनको भी उजियारा बाँटें. कदम-कदम पर दुःख के पर्वत, आओ उनको मिल कर काटें. जीवन का है लक्ष्य यही हम, हर […] Read more » Diwali दीवाली
कविता अंधेरे के विरुद्ध इरोम शर्मीला छानू… October 12, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment इरोम शर्मीला छानू…अब किसी परिचय की मोहताज नही है. वह पिछले आठ वर्षो से आमरण-अनशन पर है। उसकी एक सूत्री मांग है-मणिपुर में फौज को मिले विशेषाधिकार को समाप्त किया जाए। पूरा देश जानता है कि अपने विशेषाधिकार के कारण वहाँ फौज ने नागरिकों पर कितने कैसे-कैसे अत्याचार किए हैं. अत्याचार की इंतिहा को समझाने […] Read more » irom-sharmila इरोम शर्मीला