व्यंग्य व्यंग्य/ दाल बंद, मुर्गा शुरु March 5, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment मैं उनसे पहली दफा बाजार में मदिरालय की परछाई में मिला था तो उन्होंने राम-राम कहते मदिरालय की परछाई से किनारे होने को कहा था। उन दिनों मैं तो परिस्थितियों के चलते शुद्ध वैष्णव था ही पर वे सरकारी नौकरी में होने के बाद भी इतने वैष्णव! मन उनके दर्शन कर आह्लादित हो उठा था। […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता मैं होली हूँ – सतीश सिंह February 28, 2010 / December 24, 2011 by सतीश सिंह | 1 Comment on मैं होली हूँ – सतीश सिंह सदियों से मैं खुशियों की तस्वीर होली हूँ . अमराई की खुशबू हूँ, सबके दिल की धड़कन हूँ . रंगों का त्यौहार हूँ जो रंगों से कतराए उसके लिए शैतान हूँ जीवन के सफ़र में मैं बरगद की छावं हूँ अमराई की खुशबू हूँ, सबके दिल की धड़कन हूँ . फागुन की मेहरबानियाँ कछुए भी […] Read more » Holi Satish Singh मैं होली हूँ सतीश सिंह होली
कविता राकेश उपाध्याय की दो कविताएं February 25, 2010 / December 24, 2011 by राकेश उपाध्याय | 3 Comments on राकेश उपाध्याय की दो कविताएं 1.ईश्वरत्व के नाते मैंने नाता तुमसे जोड़ा… कल मैंने देखा था तुम्हारी आंखों में प्यार का लहराता समंदर उफ् कि मैं इन लहरों को छू नहीं सकता, पास जा नहीं सकता।। कभी-कभी लगता हैं कि इंसान कितना बेबस और लाचार है सोचता है मन कि आखिर क्यों बढ़ना है आगे, लेकिन कुछ तो है, जो […] Read more » Love प्रेम
व्यंग्य व्यंग्य/पार्टी दफ्तर के बाहर February 20, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on व्यंग्य/पार्टी दफ्तर के बाहर पार्टी दफ्तर के बाहर बैठ नीम की कड़वी छांह। एक नेता भीगे नयनों से देख रहा है दल प्रवाह। सामने पार्टी दफ्तर रहा पर अपना वहां कोई नहीं। सबकुछ गया, गया सब कुछ पर आंख फिर भी रोई नहीं। कह रही थी मन की व्यथा छूटी हुई कहानी सी। पार्टी दफ्तर की दीवारें सुनती बन […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य/ एक सफल कार्यक्रम February 12, 2010 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment पहली बार हिमालय के हिमपात के मौसम और अपनी गुफा को अकेला छोड़ गौतम और भारद्वाज मुनि दिल्ली सरकार के राज्य अतिथि होकर राजभवन में हफ्ते भर से जमे हुए थे। पर ठंड थी कि उन्हें हिमालय से भी अधिक लग रही थी। सुबह के दस बजे होंगे कि भारद्वाज मुनि अपने वीवीआईपी कमरे से […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता कविता : अब हैरान हूँ मैं …. February 12, 2010 / December 25, 2011 by शिवानंद द्विवेदी | 2 Comments on कविता : अब हैरान हूँ मैं …. जीवन की इस भीड़ भरी महफ़िल में, एक ठहरा हुआ सा वीरान हूँ मै, क्यों आते हो मेरे यादों के मायूस खंडहरों में , अब चले जाओ बड़ा परेशान हूँ मै … तुमसे मिलकर ही सजोयी थी चंद खुशियाँ मैंने, पर तुम्हें समझ ना पाया ऐसा अनजान हूँ मैं, बड़ा मासूम बनकर उस दिन जो […] Read more » poem
कविता कविता : मेरी माँ … February 9, 2010 / December 25, 2011 by शिवानंद द्विवेदी | 6 Comments on कविता : मेरी माँ … आज फिर अल्लसुबह उसी तुलसी के विरवा के पास केले के झुरमुटों के नीचे पीताम्बर ओढ़े वो औरत नित्य की भांति दियना जला रही थी ! मै मिचकती आँखों से उसे देखने में रत था , वो साधना वो योग वो ध्यान वो तपस्या, उस देवी के दृढ संकल्प के आगे नतमस्तक थे ! वो […] Read more » Maa मां
कविता रंगीन पतंगें February 8, 2010 / December 25, 2011 by ए. आर. अल्वी | Leave a Comment अच्छी लगती थीं वो सब रंगीन पतंगें काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें कुछ सजी हुई सी मेलों में कुछ टंगी हुई बाज़ारों में कुछ फंसी हुई सी तारों में कुछ उलझी नीम की डालों में उस नील गगन की छाओं में सावन की मस्त बहारों में कुछ कटी हुई कुछ लुटी हुई पर थीं […] Read more » Kites पतंग
व्यंग्य व्यंग्य/ रिश्वतऽमृतमश्नुते February 5, 2010 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on व्यंग्य/ रिश्वतऽमृतमश्नुते हर क्लास के फादर को ईमानदारी के साथ यह मानकर चलना चाहिए कि जैसे कैसे उनका बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर भले ही बन जाए लेकिन उसके बाद भी उसके हाथ में रिश्वत लेने का हुनर नहीं तो वह आगे परिवार की तो छोड़िए अपने खर्चे भी पूरे नहीं कर सकता। और नतीजा…. सपने बंदे को खुदकुशी […] Read more » vyangya रिश्वत व्यंग
कविता ए. आर. अल्वी की कविता: गांधी की आवाज़ January 29, 2010 / December 25, 2011 by ए. आर. अल्वी | Leave a Comment फिर किसी आवाज़ ने इस बार पुकारा मुझको खौफ़ और दर्द ने क्योंकर यूं झिंझोड़ा मुझको मैं तो सोया हुआ था ख़ाक के उस बिस्तर पर जिस पर हर जिस्म नयीं ज़िन्दगी ले लेता है बस ख़्यालों में नहीं अस्ल में सो लेता है आंख खुलते ही एक मौत का मातम देखा अपने ही शहर […] Read more » Mahatma Gandhi ए. आर. अल्वी कविता गांधी की आवाज़ महात्मा गांधी
व्यंग्य व्यंग्य/चल वसंत घर आपणे…!!! January 28, 2010 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/चल वसंत घर आपणे…!!! वसंत पेड़ों की फुनगियों, पौधों की टहनियों पर से उतरा और लोगों के बीच आ धमका। सोचा, चलो लोगों से थोड़ी गप शप हो जाए। वे चार छोकरे मुहल्ले के मुहाने पर बैठे हुए थे। वसंत के आने पर भी उदास से। वे चारों डिग्री धारक थे। दो इंजीनियरिंग में तो दो ने एमबीए की […] Read more » vyangya व्यंग
कविता मत आना लौट कर January 28, 2010 / December 25, 2011 by केशव आचार्य | 3 Comments on मत आना लौट कर मत आना इस धरा पर तुम लौट कर, इस विश्वास के साथ कि तुम्हारे तीनों साथी अब भी बैठे होंगे, कान आंख और मुंह बंद कर बुरा ना सुनने, देखने और कहने के लिए, मत आना तुम इस धरा पर लौट कर इस आशा के साथ कि तुम्हारी लाठी अब भी तुम्हारे रास्ते का हमसफ़र […] Read more » poem कविता