राजनीति व्यंग्य साहित्य एक पाती शत्रुघ्न सिन्हा के नाम March 18, 2016 by विपिन किशोर सिन्हा | 3 Comments on एक पाती शत्रुघ्न सिन्हा के नाम प्रिय शत्रु बचवा तक चच्चा के प्यार-दुलार पहुंचे। आगे यह बताना है कि भगवान के किरिपा से हम इहां राजी-खुशी हैं, और तोहरी राजी खुशी के वास्ते भगवान से आरजू-मिन्नत करते रहते हैं। बचवा, कई बार हम तोसे भेंट करे वास्ते पटना गए, तो मालूम भया कि तुम दिल्ली गए हो – संसद के काम-काज […] Read more » Featured letter in the name of shatrughan sinha शत्रुघ्न सिन्हा
व्यंग्य साहित्य माल्या प्रा… तुस्सी ग्रेट हो…!!! March 16, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा जन – धन योजना तब जनता से काफी दूर थी। बैंक से संबंध गिने – चुने लोगों का ही होता था। आलम यह कि नया एकाउंट खुलवाने के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती। किसी भी कार्य से बैंक जाना काफी तनाव भरा अनुभव साबित होता था। क्योंकि रकम जमा करानी हो या […] Read more » Featured Vijay Mallya माल्या प्रा
व्यंग्य साहित्य “आलसस्य परम सुखम “ March 10, 2016 by अमित शर्मा (CA) | 1 Comment on “आलसस्य परम सुखम “ प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. “जो सोवत हैं, वो खोवत हैं” जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और “अलसस्य कुतो विद्या” जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज […] Read more » आलसस्य परम सुखम
व्यंग्य साहित्य प्रौढ़ शिक्षा केंद्र और राजनीती के अखाड़े March 7, 2016 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment स्कूल और कालेजो को शिक्षा का मंदिर कहाँ जाता हैं। मंदिर इस देश की राजनीती को बहुत भाते हैं फिर चाहे वो इबादत के हो या शिक्षा के। शिक्षा के मंदिरो में राजनैतिक दल जितनी आसानी से घुस जाते हैं उतनी आसानी से तो अवैध बांग्लादेशी भी भारत में नहीं घुस पाते हैं। नेताओ को […] Read more » प्रौढ़ शिक्षा केंद्र प्रौढ़ शिक्षा केंद्र और राजनीती के अखाड़े राजनीती के अखाड़े
व्यंग्य साहित्य और बड़कू मामा बन गए बुद्धिजीवी…!! March 1, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बड़कू मामा गरीब बैकग्राऊंड से थे। लेकिन जैसा कि नाम से स्पष्ट है , वे अपने परिवार के दूसरे भाई – बहनों में बड़े थे। लिहाजा उन्हें अपनों का सुनिश्चित सम्मान बराबर मिलता था। घर के बड़े बुजुर्ग भी परिवार के सभी सदस्यों को बड़े के नाते उन्हें अनिवार्य सम्मान देने का […] Read more » और बड़कू मामा बन गए बुद्धिजीवी...!!
व्यंग्य साहित्य (ब)जट : यमला पगला दीवाना February 29, 2016 / February 29, 2016 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा प्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता हैं. इसे आम बजट इसीलिये कहाँ जाता हैं क्योंकि ये आम के सीजन के पहले आता है. बजट पेश करने के पीछे आय-व्यय का वार्षिक लेखा -जोखा रखना तो गौण कारण हैं इसके पीछे (सुविधानुसार चाहे तो आगे भी मान सकते हैं)मुख्य कारण ये हैं […] Read more » (ब)जट : यमला पगला दीवाना satire on bidget
व्यंग्य साहित्य अगड़ों मे अगड़े, पिछड़ों मे पिछड़े February 26, 2016 by बीनू भटनागर | 2 Comments on अगड़ों मे अगड़े, पिछड़ों मे पिछड़े आजकल जाति के आधार पर पिछड़ापन तय हो रहा है तो मैने सोचा अपनी जाति के अगड़े पिछड़े परकुछ रिसर्च करूँरिसर्च तो वैसे घर बैठे करने के लिये विकीडिया ही काफ़ी है पर किसी यूनिवर्सिटी से रि सर्च हो तो नाम के आगे डाक्टर का ठप्पा लगाना बड़ा अच्छा लगे गा।बड़ी पुरानी ख़वाहिश करवट ले रही है।रिसर्च के लियें आजकल सबसे अधिक चर्चित यूनीवर् सिटी तो जे.एन यू, ही और वहाँ ना उम्र की सीमा है, ना जन्म का है बंधन…….. और जे. एन यू. मे सोश्योलोजी मे शोध छात्रा बन जाऊं या ऐन्थोपौलोजी की , चाहें […] Read more » satire on reservation system
व्यंग्य साहित्य उनकी आजादी व हमारी असहिष्णुता February 25, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ० व्योमेश चित्रवंश मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!! फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!! […] Read more » उनकी आजादी व हमारी असहिष्णुता
व्यंग्य साहित्य अगले जन्म मोहे “सामान्य” ना कीजो February 24, 2016 / February 29, 2016 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अपने देश में सामान्य वर्ग का होना उतनी ही सामान्य बात हैं जितनी की कांग्रेस सरकारों में भ्रष्टाचार का होना। लेकिन अगर सामान्यता में योग्यता का समावेश ना हो तो फिर ऐसी “अनारक्षित-असामान्यता” का देश में उतना ही मूल्य रह जाता हैं जैसे किसी मार्गदर्शक मंडल के नेता का किसी पार्टी में। सामान्य श्रेणी […] Read more » satire on reservation system
व्यंग्य साहित्य जश्न् मनाइये नेता पैदा हुआ है ! February 18, 2016 by कीर्ति दीक्षित | Leave a Comment बुन्देलखण्ड परिक्षेत्र में एक लोककथा प्रचलित है अपनी मानसिक स्वतंत्रतानुसार जिसे आप राजनीतिक व्यंग्य की संज्ञा भी दे सकते हैं, खैर वो लोक कथा कुछ इस प्रकार है, एक साहब से उनके किसी परिचित ने पूछा और बताइये बाल बच्चे कैसे हैं, सब कुशल तो हैं, तो उन साहब ने बड़ी ही प्रसन्नता से उत्तर […] Read more » जश्न् मनाइये नेता पैदा हुआ है !
व्यंग्य साहित्य काले धंधों की सफेदी…!! February 15, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन में सुस्वादु भोजन की लालच में ऐसे कई आयोजनों में चले जाना होता था, जहां पेट भरने के बजाय उलटे जलालत झेलनी पड़ती थी। हालांकि इसके विपरीत अनुभव भी जीवन में होते रहे।मनमाफिक मेनू की क्षीण संभावना वाले अनेक आयोजनों में यह सोच कर गया कि बस लिफाफा थमा कर निकल […] Read more » काले धंधों की सफेदी...!!
व्यंग्य साहित्य अबके नहीं आ पाऊंगा यार February 13, 2016 by अशोक गौतम | 2 Comments on अबके नहीं आ पाऊंगा यार बाजार द्वारा हर मौसम की कमी पूरी किए जाने के बाद भी पता नहीं वसंत का कई दिनों से वैसे ही इंतजार क्यों कर रहा था जैसे कोई पागल कवि कई दिनों से अपनी भेजी रचना की स्वीकृति आने का इंतजार करता है। दरवाजे पर जरा सी भी आहट होती है तो कवि को लगता […] Read more » Featured