Category: राजनीति

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भाजपा की जीत और योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के निहितार्थ

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योगी को कट्टर हिंदूवादी यानी मुस्लिम विरोधी के रूप में दर्शा कर एक निश्चित राजनितिक एजेंडे के तहत मुस्लिम समाज को भयभीत करने की कोशिश हो रही है, बिल्कुल उसी तरह जैसे मोदी के नाम से १२ वर्ष तक किया गया था। १५ प्रतिशत मुस्लिम समाज को भयभीत करके उन्हें गोलबंद करना और ८५ प्रतिशत हिंदु समाज को जातियों, उपजातियों, अगड़ों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, दलितों में विभक्त करना ताकि मुस्लिमों के साथ हिन्दुओं के कुछ समूहों को मिला कर सत्ता प्राप्त की जा सके यही अब तक भारतीय राजनैतिक दलों की रीति नीति रही है।

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मजबूत लोकतंत्र के लिए सांसदों की हाजिरी जरूरी

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संसदीय व्यवस्था के हालात प्रारंभ से ही ढुलमूल रहे हैं। शुरुआत में जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं जागरूक रहकर सांसदों को भी जागरूक बनाया था। अब पीएम मोदी संसदीय व्यवस्था को सुदृढ़ एवं अनुशासित करने में जुटे हैं तो उसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। थोड़ी बहुत चुनौतियों के बीच मौजूदा लोकसभा कामकाज के हिसाब से पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ चुकी है। सदन के प्रति सांसदों को जवाबदेह बनाने के लिए मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी ढेरों प्रयास किए हैं। जरूरत है लोकतंत्र प्रशिक्षण के कार्यक्रम की। नये बनने वाले सांसदों के लिये यह प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसमें एक आदर्श जन-प्रतिनिधि के व्यवहार के साथ-साथ उसकी कार्यशैली, संसदीय व्यवस्था का सघन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके लिये कार्यशाला एवं प्रशिक्षण का प्रबन्ध हो। तभी हम हमारे इस सर्वोच्च मंच की पवित्रता और गरिमा को अक्षुण्ण रख सकेंगे।

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2019 में और प्रखर हो सकती है मोदी सुनामी

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मोदी सरकार सामाजिक सुरक्षा के साथ साथ राजनीतिक निर्णय लेने में भी किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिखा रही है।फिलहाल एक निर्णय जिसने भारत नहीं पूरे विश्व का ध्यान विभिन्न कारणों से अपनी ओर खींचा है , जिसे मोदी द्वारा लिए गए साहसिक निर्णय में से एक माना जा रहा है , वह है योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री , उत्तर प्रदेश बनाना । यद्यपि तमाम राजनीतिक पंडित इस बात से आशान्वित थे कि कोई भी मुख्यमंत्री होगा परंतु योगी के नाम पर तो विचार भी नहीं किया जाएगा। लेकिन मोदी और भाजपा के इस फैसले ने सभी को हैरान कर दिया। निश्चित रूप से मोदी ने यह निर्णय बहुत सोच समझकर और दूरदर्शिता के साथ लिया है ।जैसा कि पहले मैंने लिखा था कि अब भाजपा के पास विकास और हिंदुत्व को एक साथ लेकर चलने का स्वर्णिम अवसर है ,यह निर्णय उसी का प्रतिमान है। जिस तेजी से योगी ने इन दिनों में फैसले दिए हैं उससे यह बात सिद्ध भी हो रही है कि वह इस निर्णय पर बिल्कुल खरे उतरेंगे , जिसका असर देशव्यापी होगा और 2019 में सहायक भी ।

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उत्‍तरप्रदेश के बूचड़खानों का सत्‍य पक्ष

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इससे संबंधि‍त यह बात जानना भी सभी के लिए जरूरी है कि लाख आर्थ‍िक नुकसान सहते हुए भी सरकार ने यह कदम आम जन के स्‍वास्‍थ्य को ठीक रखने के लिए सख्‍ती से अमल में लाना उचिᛢत समझा है । क्‍योंकि यह तो सभी को पता होना ही चाहिए कि वे मांस किसका खा रहे हैंऔर जिसका भी खा रहे हैं वह स्‍वस्‍थ जानवर था भी कि नहीं । उत्तर प्रदेश के तमाम बूचड़खानों को बंद करने से राज्य सरकार को करीब 11 हजार 350 करोड़ रुपये के नुकसान होने की आशंका व्‍यक्‍त की गई है। इससे जुड़ा एक तथ्‍य यह भी है कि यहां अब तक करीब 356बूचड़खाने संचालित किये जा रहे थे , जिनमें से सिर्फ 40 बूचड़खाने ही वैध हैं, इन्‍हें केंद्र सरकार की कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) से बाकायदा लाइसेंस मिला हुआ है।

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असाधारण चुनाव के असाधारण नतीजे

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जो लोग यह कह रहे हैं कि जिस व्यक्ति के पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है उसे इतने बड़े प्रदेश की बागडोर सौंप देना कहाँ तक उचित है वे भूल रहे हैं कि उप्र के पिछले मुख्यमंत्री के पास किसी प्रकार के प्रशासनिक अनुभव तो क्या कोई राजनैतिक अनुभव भी नहीं था लेकिन योगी द्वारा किए गए संसदीय कार्यों की समीक्षा करने मात्र से ही उनको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा। 1998 से लगातार गोरखपुर से सांसद रहे योगी आदित्यनाथ के व्यापक जनाधार और एक प्रखर वक्ता की छवि को भी शायद यह लोग अनदेखा करने की भूल कर रहे हैं। जब परिवादवाद की देन एक अनुभव हीन मुख्यमंत्री को प्रदेश की बागडोर संभाल सकता है तो योगी को तो 26 वर्ष की उम्र में सबसे कम उम्र के सांसद बनने का गौरव प्राप्त है।

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एक्शन में योगी, जनमानस में खुशी की लहर

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एम योगी आदित्यनाथ अब हर रोज कोई न कोई दिशानिर्देश अपने मंत्रियों को दे रहे हैं तथा पुरानी सरकारों की योजनाओं की समीक्षा बैठकें कर हैं। उन्होनें गोरखपुर दौरे में साफ ऐलान कर दिया है कि जिन लोगों को 18-20 घंटे काम करना हो वहीं लोग उनके साथ रहें तथा उन्होनें यह भी ऐलान कर दिया है कि गुंडे व असामाजिक तत्व या तो सुधर जायें या फिर प्रदेश छोड़कर चले जायें। सीएम इस बात के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध है कि वह प्रदेश का भेदभाव रहित विकास करेंगे और सभी वर्गो को न्याय मिलेगा। जिस पर अमल भी प्रारम्भ हो गया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि किसी का भी किसी भी प्रकार से तुष्टीकरण नहीं किया जायेगा।

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कश्मीर के चुनाव में अब्दुल्ला परिवार की रणनीति

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सत्ता छिन जाने के बाद अब्दुल्ला परिवार के पास एक ही रास्ता बचा था । वह जनता का विश्वास जीतने के लिए पुनः घाटी की जनता के पास जाता । लेकिन उसने जनता के पास जाने का लम्बा और कष्टसाध्य रास्ता चुनने की बजाए सरल और शॉर्टकट रास्ता ही चुनना ही बेहतर समझा । वह हुर्रियत कान्फ्रेंस की गोद में जाकर बैठ गया । हुर्रियत कान्फ्रेंस का मानना है कि आतंकवादी कश्मीर में आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं । जल्द ही कश्मीर आज़ाद हो जाएगा । हुर्रियत कान्फ्रेंस के लोगों में थोड़ी बहुत नोंकझोंक इस बात को लेकर होती रहती है कि लड़ाई जीत लेने के बाद कश्मीर आज़ाद रहेगा या पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा । सैयद अली शाह गिलानी की गोद में बैठे फारुक अब्दुल्ला ।

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राजनीति

भाजपाः वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति का समय

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लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ पचीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

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राजनीति समाज

मैकाले-पद्धति को शीर्षासन कराता महर्षि अरविन्द का शिक्षा-दर्शन

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“ वास्तविक शिक्षण का प्रथम सिद्धान्त है- ‘कुछ भी न पढ़ाना’ , अर्थात् शिक्षार्थी के मस्तिष्क पर बाहर से कोई ज्ञान थोपा न जाये । शिक्षण प्रक्रिया द्वारा शिक्षार्थी के मस्तिष्क की क्रिया को सिर्फ सही दिशा देते रहने से उसकी मेधा-प्रतिभा ही नहीं, चेतना भी विकसित हो सकती है, जबकि बाहर से ज्ञान की घुट्टी पिलाने पर उसका आत्मिक विकास बाधित हो जाता है ।”

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दिलचस्प दिन

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साठ के दशक के मध्य में अमेरिका में युवा आन्दोलन की एक धारा के रुप में हिप्पी उपसंस्कृति का जन्म हुआ और दुनिया भर के अनेको देशों में फैल गया। हिप्पियों के फैशन और मूल्य-बोध ने संगीत, फिल्म, साहित्य और शिल्प पर गहरा असर डाला। इस हिप्पी संस्कृति के अनेको पहलुओं का दुनिया भर के देशों की आज की संस्कृति की मुख्य धारा में समावेश हो गया है। साठ के दशक में दुनिया के विभिन्न देशों में प्रतिवाद और प्रतिरोध के स्वर गूँजते रहे थे। अमेरिका, यूरोप और एशिया के विश्वविद्यालयों के कैम्पस में छात्र अशान्त और उत्तेजित रहा करते थे।

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