विविधा अनाज नहीं, लोकतंत्र सड़ रहा है प्रधान मंत्री जी September 11, 2010 / December 22, 2011 by पंकज झा | 13 Comments on अनाज नहीं, लोकतंत्र सड़ रहा है प्रधान मंत्री जी – पंकज झा सामान्यतः जब कोई शालीन माना जाने वाला व्यक्ति अपना आपा खो दे तो समझिए कि उसके मर्म पर कोई जबरदस्त चोट पहुची है. उसे किसी व्यक्तिगत क्षति की आशंका या अंदाजा है. या फिर अपनी अक्षमता के प्रति जबरदस्त बौखलाहट. जैसे गृह मंत्री के ‘भगवा आतंकवाद’ वाले बयान को याद करें. आश्चर्यजनक […] Read more » Inflation महंगाई
विविधा शक्कर के विनियंत्रण से मँहगाई के तेवर और भी तीखे होंगे September 11, 2010 / December 22, 2011 by सतीश सिंह | 1 Comment on शक्कर के विनियंत्रण से मँहगाई के तेवर और भी तीखे होंगे -सतीश सिंह एक बार फिर खाद्य व कृषि मंत्री श्री शरद पवार चर्चा में हैं। अब श्री पवार शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने की जुगाड़ में हैं। श्री पवार ने 3 सितम्बर को प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के समक्ष शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने की योजना प्रस्तुत की है। इस खाके को अन्य […] Read more » Inflation महंगाई
विविधा हिरासत में यातना के विरुद्ध आवाज की कसौटी September 11, 2010 / December 22, 2011 by सतीश सिंह | 1 Comment on हिरासत में यातना के विरुद्ध आवाज की कसौटी -सतीश सिंह भारत में पुलिस का आतंक इस हद तक नकारात्मक है कि आम आदमी हमेशा पुलिस से बचने की कोशिश करता है। पुलिस की डर की वजह से ही हमारे देश में बहुत से घायल या बीमार सड़क पर पड़े-पड़े ही दम तोड़ देते हैं, पर उसे कोई अस्तपताल तक नहीं पहुँचाता है। अभी […] Read more » Police excess पुलिस अत्याचार
विविधा बिहार चुनाव: लोकतंत्र में ‘बाहुबली’ बनाम भारतीय मतदाता September 10, 2010 / December 22, 2011 by निर्मल रानी | 2 Comments on बिहार चुनाव: लोकतंत्र में ‘बाहुबली’ बनाम भारतीय मतदाता -निर्मल रानी भारतीय लोकतंत्र वैसे तो कई बार किसी न किसी घटना को लेकर शर्मसार होता ही रहा है। कभी देश की संसद अथवा कई राज्यों की विधानसभाओं में माननीय सदस्यों के मध्य होने वाली धक्का मुक्की, गाली गलौच,मारपीट तोड़फोड़-जैसी असंसदीय हरकतों को लेकर तो कभी इन्हीं के द्वारा की जाने वाली नोटों के बंडलों […] Read more » Bihar Election बिहार विधानसभा चुनाव
विविधा और अब देश के भावी कर्णधारों ने चलाई ‘महंगाई विरोधी मिसाईल’ September 10, 2010 / December 22, 2011 by निर्मल रानी | 5 Comments on और अब देश के भावी कर्णधारों ने चलाई ‘महंगाई विरोधी मिसाईल’ -निर्मल रानी केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में महंगाई को लेकर किया जाने वाला विरोध तथा शोर-शराबा कोई नई बात नहीं है। मुंबई फिल्म उद्योग के प्रसिद्ध नायक एंव निर्देशक मनोज कुमार ने 1974 में बनाई गई अपनी एक सुपरहिट फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में भी ‘महंगाई मार गई’ शीर्षक […] Read more » Inflation महंगाई
विविधा बारात में बसिऔरा September 10, 2010 / December 22, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 7 Comments on बारात में बसिऔरा -आशीष तिवारी मैं ये दावा तो नहीं करता कि इस शीर्षक को पढ़ने वालों की बड़ी तादात शायद इस शीर्षक का मतलब ना समझ पाए लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि एक आदमी तो कम से कम होगा ही जिसे शायद इसका अर्थ समझने में कुछ परेशानी हो तो साहब बारात का मतलब आप जानते ही […] Read more » Procession बारात
विविधा शठे शाठ्यम समाचरेत् September 10, 2010 / December 22, 2011 by विजय कुमार | 8 Comments on शठे शाठ्यम समाचरेत् -विजय कुमार ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता पाने को इतनी आतुर हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेक खो दिया है। ज्ञानेश्वरी रेल दुर्घटना के आरोपी उमाकांत महतो और उससे पूर्व आंध्र के एक कुख्यात नक्सली आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर भी वे प्रश्न उठा रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि […] Read more » News समाचर
विविधा आंतकवाद का रंग, धर्म और मजहब September 8, 2010 / December 22, 2011 by विजय कुमार | 6 Comments on आंतकवाद का रंग, धर्म और मजहब -विजय कुमार इन दिनों भगवा आतंक के नाम पर आतंकवाद के रंग की चर्चा छिड़ गयी है। चिदम्बरम् के गृह मंत्री बनने से जिनके दिल जल रहे थे, वे कांग्रेसी ही अब मजा ले रहे हैं। यह सौ प्रतिशत सच है कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यदि कोई भगवा, हरा, काला, नीला या […] Read more » terrorism भगवा आतंकवाद
विविधा तुम्हें देश का प्रणाम ‘टाटा’ September 8, 2010 / December 22, 2011 by राकेश उपाध्याय | 7 Comments on तुम्हें देश का प्रणाम ‘टाटा’ -राकेश उपाध्याय आफतों और विपदाओं में जो साथ न छोड़े वही सच्चा दोस्त है, यार है। उससे बड़ा हितचिंतक कोई और नहीं हो सकता। कार्पोरेट जगत में आज जहां केवल मुनाफा और मुनाफा ही सबसे बड़ा मंत्र बना हुआ है, कंपनियां अपने उपर मंडराते संकट को देखकर पहला काम यदि शुरू करती हैं तो वह […] Read more » Ratan Tata रतन टाटा
विविधा सखी सइयां कहां कमात हैं! September 8, 2010 / December 22, 2011 by राकेश उपाध्याय | 2 Comments on सखी सइयां कहां कमात हैं! -राकेश उपाध्याय महंगाई डायन खाय जात है, गीत उनके लिए तो ठीक है जो सचमुच कुछ अच्छा कमाते हैं। उनकी बीवियां तो अपनी पड़ोसन को कह सकती हैं कि उनके श्रीमान जी अच्छा कमाते हैं, खूब कमाते हैं लेकिन विकराल और कमर तोड़ महंगाई घर में कुछ बचने नहीं देती। लेकिन उन महिलाओं के मुंह […] Read more » Inflation महंगाई
विविधा कर्तव्य प्रधान भारत का राष्ट्रधर्म August 31, 2010 / December 22, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 13 Comments on कर्तव्य प्रधान भारत का राष्ट्रधर्म – हृदयनारायण दीक्षित संस्कृत लोकमंगल अभीप्सु भाषा है। कण-कण में एकत्व की बोली है। यह देवत्व और दिव्यत्व की अनुभूति वाणी है। भारत का प्राचीन दर्शन, विज्ञान, इतिहास, काव्य और गीत संस्कृत में ही उगा। लेकिन अंग्रेजी अमेरिकी सभ्यता के मानसिक गुलाम संस्कृत को मृत भाषा कहते हैं। पीछे सप्ताह संस्कृत प्रेमियों ने यू.पी. की […] Read more » Rashtradharma राष्ट्रधर्म
विविधा यथार्थ, वास्तव और सत्य के फर्क August 30, 2010 / December 22, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on यथार्थ, वास्तव और सत्य के फर्क – हृदयनारायण दीक्षित सच क्या है? सत्य का सत्य आधुनिक विज्ञान की बड़ी चुनौती है। पंथिक पुस्तकों के अनेक तथ्य विज्ञान की खोजों में सत्य नहीं निकले। लेकिन वैज्ञानिक खोजें भी अंतिम सत्य नहीं होती। भौतिक विज्ञान प्रत्यक्ष को सत्य मानता है। प्रत्यक्ष का साधारण अर्थ प्रति-अक्ष यानी आंख के सामने होता है। वैदिक साहित्य […] Read more » True सत्य सत्य