सांगोपांग समाज जीवन की शर्त है अन्त्योदय

19वीं सदी के अदभुत विचारक थे जॉन रस्किन। इनकी पुस्तक अन टू दी लास्ट पढ़ने के बाद महात्मा गांधी ने कहा कि अब मैं वह नहीं रह गया हूँ, जो मैं इस पुस्तक को पढ़ने के पहले था। इसी पुस्तक के शीर्षक का अनुवाद महात्मा जी ने किया अन्‍त्योदय। अन्‍त्‍योदय विचार को ही अंतत: महात्मा जी सर्वोदय विचार के रूप में परिभाषित किया। सर्वोदय में ही अन्‍त्‍योदय निहित है। समग्र से काट कर अंतिम व्यक्ति को न्यायपूर्वक विकसित नहीं किया जा सकता। महात्मा जी जिस भारतीय मनीषा के वाहक थे, इस अंग्रेज विचारक के तर्कों को पढ़ कर वे प्रभावित ही नहीं हुये, वरन् भारतीय मनीषा के संदर्भ में जो सवाल उनके मन में उठे थे, वे सब शांत हो गये, तब यह भी पुष्टि हुई कि भारत का चिंतन एक देशीय नहीं वरन् वैश्विक है।

भारतीय विचार प्रवाह के वाहक दीनदयाल:

भारतीय विचार प्रवाह के अधुनातन वाहक थे पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय। अपने समकालीन विचारमंथन की स्थिति को रेखांकित करते हुये उन्होंने कहा है, ”स्वातंत्र्योत्तर काल में भारतीय राजनैतिक दर्शन का विचार बिल्कुल नहीं हुआ यह कहना सत्य नहीं होगा किंतु अभी संकलित प्रयत्न करना बाकी है” गांधीजी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुये तथा भारतीय दृष्टिकोण से विचार करते हुये, सर्वोदय के विभिन्न नेताओं ने महत्वपूर्ण कल्पनाएं रखी हैं। किंतु विनोबा भावे ने ग्रामदान के कार्य को जो अतिरेकी महत्व दिया है, उससे उनका वैचारिक क्षेत्र का योगदान पिछड़ गया है। जयप्रकाश बाबू भी जिन पचड़ों में पड़ गये हैं, उससे उनका चिंतन का कार्यक्रम रुक गया है। रामराज्य परिषद् के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी ने भी रामराज्य और समाजवाद लिखकर पाश्चात्य जीवन दर्शनों की मीमांसा की है तथा अपने विचार रखे हैं, किंतु उनकी दृष्टि मूलत: सनातनी होने के कारण, वे सुधारवादी आकांक्षाओं व आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मा. स. गोलवलकर भी समय-समय पर भारतीय दृष्टिकोण से राजनैतिक प्रश्नों का विवेचन करते हैं। भारतीय जनसंघ ने भी एकात्म मानववाद के आधार पर उसी दिशा में कुछ प्रयत्न किया है। हिंदूसभा ने हिंदू समाजवाद के नाम पर समाजवाद की कुछ अलग व्याख्या करने का प्रयत्न किया है, किंतु वह विवरणात्मक रूप से सामने नहीं आया है। डॉ. संपूर्णानंद ने भी जो समाजवाद पर विचार व्यक्त किये हैं, उनके भारतीय जीवन दर्शन का अच्छा विवेचन है। चिंतन की इस दिशा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।”

भारतीय चिंतन की मूल प्रवृत्ति है समग्रता। एकांगिता के प्रति निरन्तर सावधान रहने के लिये भारत अपनी प्रतिभाओं को सम्प्रेरित करता रहा। इसी प्रेरणा ने महात्मा जी से अन्‍त्योदय की व्याख्या सर्वोदय विचार से करवाई। समाज की अंतिम सीढ़ी पर खड़ा व्यक्ति भी सब के साथ आना चाहिये यही अन्‍त्योदय का मंतव्य है। इस मंतव्य को समग्रता से व्यक्त करना था। अत: महात्मा जी ने इसे सर्वोदय कहा। आखिर समग्रता भी क्या है? दीनदयालजी ने समग्रता को एकात्मता के रूप में व्याख्यायित किया। पृथक-पृथक पड़ी विषमधर्मी अस्मिताओं को कृत्रिम गठबंधन नहीं है समग्रता। वरन् समग्रता इस सृष्टि की या ब्रह्माण्ड की एकात्मता का नाम है। यह न केवल समग्र है, वरन् एकात्म भी है। अत: समष्टि जीवन का कोई अंगोपांग समुदाय या व्यक्ति उत्पीड़ित उपेक्षित या वंचित रहता है तो वह समग्र यानी विराट पुरूष को विकलांग करता है। अत: दीनदयाल जी ने कहा सांगोपांग समाज-जीवन की आवश्यक शर्त है अंत्योदय। मानव की एकात्मता तब आहत हो जाती है, जब उसका कोई भी घटक समग्रता से पृथक पड़ जाता है। अत: समाज के योजकों को अंत्योदयी होनी चाहिये।

पाश्चात्य अर्थों के व्यक्तिवादी किंवा पूंजीवादी समर्थ्योदयी हैं। उनकी घोषणा ही है समर्थ ही जीयेगा (Survival of जhe fiजजesज) यह एक अमानवीय विचार है, जो समाज का निषेध कर मात्स्य न्याय की स्थापना करता है। पाश्चात्य अर्थों के समाजवादी किवां साम्यवादी सरकारोदयी होते हैं। वे व्यक्ति के एवं समाज के व्यक्तित्व का ही निषेध करते हैं तथा एक वर्ग की तानाशाही के माधयम से सामाजिक समता प्राप्त करने की परिकल्पना करते हैं। यह नितांत अवैज्ञानिक एवं राक्षसी विचार है। रूस व चीन ने इस त्रासद विचार को खूब सहा है, भारत में चलने वाले हिंसक नक्सलवाद की प्रेरणा का भी अधिष्ठान यही विचार है।

सामाजिक समता के घोषित लक्ष्य के कारण अनेक संवेदनशील व्यक्ति समाजवाद के विचार से जुड़ते हैं, तथा अनेक प्रकार से इसे मानवीय बनाने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रकार वैयक्तिक सामर्थ्य को सम्मानित करने के कारण एवं लोकतंत्र का पुरस्कर्ता होने के कारण व्यक्तिवाद तथा तथाकथित उदारवाद ने भी अनेक संजीदा व्यक्तित्वों को आकर्षित किया है, लेकिन दीनदयाल जी मानते हैं कि यह एक मृगमरीचिका है। हमें अपने भारतीय अधिष्ठान पर लौटकर, उसे ही युगानुकूल आकार देने के अपने स्वाभाविक कर्तव्य को निभाना होगा, अत: उन्होंने एकात्म मानव की साधना का आवाह्न किया।

व्यावहारिक उद्बोधन

इस विवेचन में किसी को भी वैचारिक दुरूहता का आभास हो सकता है, किसी को लग सकता है कि यह केवल दार्शनिक अठखेलियाँ हैं, लेकिन दीनदयाल जी ने एकात्म मानव के अंत्योदय दर्शन को अपने व्यवहार में जीया। दीनदयाल जी पांचजन्य में एक विचार-वीथी स्तम्भ लिखा करते थे। 11 जुलाई 1955 को अपने इस स्तम्भ में उन्होंने मानवीय श्रम एवं नवीन तकनीक (अभिनवीकरण) के संदर्भ में अपना विचार व्यक्त किया ”अभिनवीकरण का प्रश्न जटिल है तथा केवल मजदूरों तक सीमित नहीं है; अपितु अखिल भारतीय है। ……… वास्तव में तो बड़े उद्योगों की स्थापना एवं पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का आधार ही अभिनवीकरण है। आज का विज्ञान निरंतर प्रयास कर रहा है ऐसे यंत्रों का निर्माण करने का, जिनके द्वारा मनुष्यों का कम से कम उपयोग हो। जहाँ जनसंख्या कम है तथा उत्पादन के लिए पर्याप्त बाजार है वहाँ ये नए यंत्र वरदान सिद्ध होते हैं। हमारे यहाँ हरेक नया यंत्र बेकारी लेकर आता है।”

इसी प्रकार उन्होंने 18 जुलाई 1955 को अपने इसी स्तम्भ में दुकानहीन विक्रेताओं का सवाल खड़ा किया ”….. शायद जितने दुकानदार हैं, ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो बिना किसी दुकान के खोमचों, रेहडियों तथा ठेलों के सहारे अपनी जीविका चलाते हैं। दिल्ली नगरपालिका के उपनियमों के अनुसार इन लोगों को पटरियों पर बैठकर सामान बेचने की इजाजत नहीं है। दिल्ली के अधिकारियों के सामने टै्रफिक की ज्यादा समस्या है: क्योंकि इन पटरी वालों और खोमचे वालों के कारण सड़क पर इतनी भीड़ हो जाती है कि मोटर आदि का निकलना ही दुष्कर हो जाता है। फिर दुकानदारों को भी शिकायत है। सामने पटरी पर बैठे व्यापारियों के कारण उनकी दुकानदारी में बाधा पहुँचती है। नगर के सौंदर्य का भी प्रश्न है। टूटे-फूटे ठेलों और गंदे खोमचों से राजधानी की सड़कों का सौंदर्य मारा जाता है। फलत: दिल्ली सरकार ने पटरी वालों के खिलाफ जोरदार मुहिम छेड़ दी है।”

उपाध्‍याय ने गरीब खोमचेवालों व पुलिस के व्यवहार, उनकी हीनग्रंथियों व तज्जनित मनोविज्ञान का सजीव वर्णन अपने इस निबंध में करते हुये, अंत में लिखा है: ”आज देश में जिस प्रकार भूमिहीन किसानों की समस्या है, वैसे ही दुकानहीन व्यापारियों की समस्या है। हमें उनका हल ढँढ़ना होगा।”

समाज की सम्पत्ति का सीमित हाथों में केन्द्रीकरण अनुचित होता है। यह प्रवृत्ति मानव की एकात्मता को आहत करती है तथा वंचित समुदाय का सृजन करती है। इस संदर्भ में दीनदयाल जी की दृष्टि को समझने के लिये 1956 में विंधयप्रदेश की जनसंघ प्रदेश कार्यकारिणी ने दीनदयाल जी के निर्देश पर हीरा खदान मालिकों के विषय में एक प्रस्ताव पारित किया, उसको जानना अच्छा रहेगा।

”कार्यसमिति ने पन्ना-हीरा खदान जाँच समिति की रिपोर्ट पर संतोष व्यक्त किया। …. समिति ने कहा, जनसंघ उक्त जाँच समिति द्वारा सुझाये गये इस सुझाव से कि सरकार और जनता दोनों के सहयोग से एक स्वतंत्र कॉरपोरेशन बनाया जाय, के पक्ष में है। कार्यसमिति ने हीरा खदानों के लीज होल्डरों को मुआवजा देने का तीव्र विरोध किया और कहा कि उन लीज होल्डरों ने मिनरल कंसेशन रूल की धारा 48 व 51 का उल्लंघन किया है। अत: धारा 53 के अनुसार उनकी लीज जब्त होनी चाहिये।”

(पांचजन्य, 19 मार्च, 1956 , पृष्ठ 13)

ये उदाहरण दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित एकात्मता के अंत्योदयी संदर्भ को व्यावहारिक रूप से व्याख्यायित करते हैं।

अर्थनीति का भारतीयकरण एवं आर्थिक लोकतंत्र

भौतिक विकास किसी भी राष्ट्र की अर्थनीति का स्वाभाविक लक्ष्य होता है। दीनदयाल जी विकास के पाश्चात्य मॉडल को मानवीय एकात्मता के लिये अहितकर मानते थे अत: उन्होंने अर्थनीति के भारतीयकरण का आह्वान किया ”देश का दारिद्रय दूर होना चाहिये, इसमें दो मत नहीं; किंतु प्रश्न यह है कि यह गरीबी कैसे दूर हो? हम अमेरिका के मार्ग पर चलें या रूस के मार्ग को अपनावें अथवा युरोपीय देशों का अनुकरण करें? हमें इस बात को समझना होगा कि इन देशों की अर्थव्यवस्था में अन्य कितने भी भेद क्यों न हों इनमें एक मौलिक साम्य है। सभी ने मशीनों को ही आर्थिक प्रगति का साधन माना है। मशीन का सर्वप्रधान गुण है कम मनुष्यों द्वारा अधिकतम उत्पादन करवाना। परिणामत: इन देशों को स्वदेश में बढ़ते हुये उत्पादन को बेचने के लिए विदेशों में बाजार ढूँढने पड़े। साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद इसी का स्वाभाविक परिणाम बना। इस राज्य विस्तार का स्वरूप चाहे भिन्न भिन्न हो किन्तु क्या रूस को, क्या अमेरिका को तथा क्या इंग्लैण्ड को, सभी को इस मार्ग का अवलम्बन करना पड़ा। हमें स्वीकार करना होगा कि भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता मशीन का रास्ता नहीं है। कुटीर उद्योगों को भारतीय अर्थनीति का आधार मानकर विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का विकास करने से ही देश की आर्थिक प्रगति संभव है।

(पिलानी, शेखावटी जनसंघ सम्मेलन मे उदघाटन भाषण, पांचजन्य 12 दिसम्बर, 1955 पृ 11)

दीनदयाल जी अंत्योदय के लिये लोकतंत्र को आवश्यक मानते थे, लोकतंत्र राजनीति में अंतिम व्यक्ति की सहभागिता का आश्वासन देता है। दीनदयाल जी राजनैतिक लोकतंत्र की सार्थकता के लिये आर्थिक लोकतंत्र को भी परमावश्यक मानते थे। उनका मत है ”प्रत्येक को वोट जैसे राजनीतिक प्रजातंत्र का निकष है, वैसे ही प्रत्येक को काम यह आर्थिक प्रजातंत्र का मापदण्ड हैं।” प्रत्येक को काम के अधिाकार की व्याख्या करते हुये वे कहते है : ”काम प्रथम तो जीविकोपार्जनीय हो तथा दूसरे, व्यक्ति को उसे चुनने की स्वतंत्रता हो। यदि काम के बदले में राष्ट्रीय आय का न्यायोचित भाग उसे नहीं मिलता हो तो उसके काम की गिनती बेगार में होगी। इस दृष्टि से न्यूनतम वेतन, न्यायोचित वितरण तथा किसी न किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था आवश्यक हो जाती है।” दीनदयाल जी आगे कहते हैं:

”जैसे बेगार हमारी दृष्टि में काम नहीं है वैसे ही व्यक्ति के द्वारा काम में लगे रहते हुये भी अपनी शक्ति भर उत्पादन न कर सकना काम नहीं है। अण्डर इम्पलॉइमेण्ट भी एक प्रकार की बेकारी है।”

उपाध्‍याय उस अर्थव्यवस्था को अलोकतांत्रिक मानते हैं जो व्यक्ति के उत्पादन-स्वातंत्र्य या सृजनकर्म पर आघात करती है। अपने उत्पादन का स्वयं स्वामी न रहने वाला मजदूर या कर्मचारी अपनी स्वतंत्रता को ही बेचता है। आर्थिक स्वतंत्रता व राजनीतिक स्वतंत्रता परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। ”राजनीतिक प्रजातंत्र बिना आर्थिक प्रजातंत्र के नहीं चल सकता। जो अर्थ की दृष्टि से स्वतंत्र है वही राजनीतिक दृष्टि से अपना मत स्वतंत्रतापूर्वक अभिव्यक्त कर सकेगा। अर्थस्य पुरुषो दास: (पुरुष अर्थ का दास हो जाता है)”

मनुष्य के उत्पादन स्वातंत्र्य पर सबसे बड़ा हमला पूँजीवादी औद्योगीकरण ने किया है। अत: उपाध्‍याय औद्योगीकरण का इस प्रकार ने नियमन चाहते हैं कि जिससे वह स्वतंत्र, लघु एवं कुटीर उद्योगों को समाप्त न कर सके : ”आज जब हम सर्वांगीण विकास का विचार करते हैं तो संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार करके चलते हैं। यह संरक्षण देश के उद्योगों को विदेशी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से तथा देश के छोटे उद्योगों को बड़े उद्योगों से देना होगा।” उपाध्‍याय यह महसूस करते हैं कि पश्चिमी औद्योगीकरण की नकल ने भारत के पारम्परिक उत्पादक को पीछे धकेला है तथा बिचौलियों को आगे बढ़ाया है। ”हमने पश्चिम की तकनीकी प्रक्रिया का ऑंख बंद करके अनुकरण्ा किया है। हमारे उद्योग का स्वाभाविक विकास नहीं हो रहा। वे हमारी अर्थव्यवस्था के अभिन्न व अन्योन्याश्रित अंग नहीं अपितु ऊपर से लादे गये है। (इनका विकास) विदेशियों के अनुकरणशील सहयोगी अथवा अभिकर्ता कतिपय देशी व्यापारियों द्वारा हुआ है। यही कारण है कि भारत के उद्योगपतियों में, सब के सब व्यापारी आढ़तियों तथा सटोरियों में से आए हैं। उद्योग एवं शिल्प में लगे कारीगरों का विकास नहीं हुआ है”

देश के आम शिल्पी व कारीगर की उपेक्षा करनेवाला औद्योगीकरण अलोकतांत्रिक है। पूँजीवाद व समाजवाद के निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के विवाद को उपाध्‍याय गलत मानते हैं। इन दोनों ने ही स्वयंसेवी क्षेत्र (Self Employed Secजor) का गला घोंटा है। आर्थिक लोकतंत्र के लिये आवश्यक है स्वयंसेवी क्षेत्र का विकास करना। इसके लिये विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था जरूरी है:

”राजनीतिक शक्ति का प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके जिस प्रकार शासन की संस्था का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार आर्थिक शक्ति का भी प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके अर्थव्यवस्था का निर्माण एवं संचालन होना चाहिये। राजनीतिक प्रजातंत्र में व्यक्ति की अपनी रचनात्मक क्षमता को व्यक्त होने का पूरा अवसर मिलता है। ठीक उसी प्रकार आर्थिक प्रजातंत्र में भी व्यक्ति की क्षमता को कुचलकर रख देने का नहीं; अपितु उसको व्यक्त होने का पूरा अवसर प्रत्येक अवस्था में मिलना चाहिये। राजनीति में व्यक्ति की रचनात्मक क्षमता को जिस प्रकार तानाशाही नष्ट करती है, उसी प्रकार अर्थनीत में व्यक्ति का रचनात्मक क्षमता को भारी पैमाने पर किया गया औद्योगीकरण नष्ट करता है। इसलिए तानाशाही की भाँति ऐसा औद्योगीकरण भी वर्जनीय है।”

(आर्थिक लोकतंत्र शीर्षक के अन्तर्गत आये सभी उद्धरण दीनदयाल जी की पुस्तक भारतीय अर्थनीति: विकास की एक दिशा से लिये गये हैं)

एक गणितीय सूत्र ज x x x इ:

यन्त्रचलित औद्योगीकरण की मर्यादा को स्पष्ट करते हुये उपाध्‍याय एक समीकरण प्रस्तुत करते हैं: ”प्रत्येक को काम का सिध्दांत स्वीकार कर लिये जाए तो सम-वितरण की दिशा सुनिश्चित हो जाती है और हम विकेन्द्रीकरण की ओर बढ़ते हैं। औद्योगीकरण को उदेश्य मानकर चलना गलत है। इस सिध्दांत को गणित के सूत्र में यों रख सकते हैं:           ज  x क  x य  x इ

यहाँ जन का परिचायक है, कर्म की अवस्था व व्यवस्था का, यंत्र अथवा तकनीकि का तथा समाज की प्रभावी इच्छा या इच्छित संकल्प का द्योतक है। तथा तो सुनिश्चित है। और के अनुपात में तथा को सुनिश्चित करना है। लेकिन औद्योगीकरण लक्ष्य होने पर सब को नियंत्रित करता है। के अनुपात में जन की छँटनी होती है। के अनुपात में को भी यंत्रों के अति उत्पादन का अनुसरण करना पड़ता है। जो कि सर्वथा अवांछनीय है। की छँटनी कर देनी वाली कोई भी अर्थव्यवस्था अलोकतांत्रिक है। इ को नियंत्रित करने वाली अर्थव्यवस्था तानाशाही है। अत: तथा के नियंत्रण मे तथा का नियोजन होना चाहिये। वही लोकतांत्रिक एवं मानवीय अर्थव्यवस्था कही जा सकती है।                       (दीनदयाल उपाध्‍याय कृत ‘राष्ट्र जीवन की समस्यायें’ पृ 42)

एकात्म मानवदर्शन के अंत्योदय आयाम के लिये उन्होंने दृष्टिकोण के भारतीयकरण आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना, सत्ता एवं वित्त के विकेन्द्रीकरण तथा यंत्र योजित नहीं वरन् मानव योजित व्यवस्था के निर्माण का सांगोपांग आग्रह किया। हमें उनके इस आग्रह को दृष्टिपथ में रख कर सामाजिक अनुसंधान एवं प्रयोग संचालित करने चाहिये।

-डॉ. महेशचन्द्र शर्मा

2 thoughts on “सांगोपांग समाज जीवन की शर्त है अन्त्योदय

  1. सांगोपांग समाज की स्थापना के बगैर भारतीय समाज की कल्पना करना ही बेकार है . भारत और भारतीय समाज का कल्याण कदापि पूंजीवाद और समाजवाद में नहीं है. इसलिय मेरा जहां तक मानना है की आज नहीं तो कल हमें पूर्णतः सांगोपांग समाज को स्वीकार करना ही होगा . इसी में हमारी भलाई है.

  2. एकात्म मानव दर्शन पर विद्वान और दर्शन पर अधिकार रखनेवाले पाठक अपने विचार व्यक्त करें। मेरी सीमित जानकारीसे मै बहुत प्रभावित हूं। ना पूंजिवाद, ना समाजवाद— सभीकी भलाई की सोचता है। केवल एकात्म मानव दर्शन इस दिशामे सही ढांचा प्रस्तुत करता है।यह भारतकी पहचान,और विशेषता है।और किसी (देश, धर्म, फिलसूफि)ने ऐसा चिंतन प्रस्तुत नहीं किया है।मै बिलकुल प्राथमिक जानकारीके आधारपर, और थोडासा(यह मेरा विषय नहीं) अध्ययन करते हुए, इस विषयपर यहां युनिवर्सीटीमे दो तीन बार व्याख्यान देकर, प्रशंसा प्राप्त कर चुका हूं।तो, मै बिलकुल भारपूर्वक कहूगा,कि, इसपर शीघ्रतापूर्वक अनुसंधान, शोध, चर्चाएं, गोष्ठियां इत्यादि हो। यह हमारे भारतका भविष्यका वैश्विक स्थान सुनिश्चित करनेकी सामर्थ्य रखता है।

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