शायद पार्टी ही कन्फ्यूज है राहुल के भविष्य पर

पहली बार नेता और मुख्यमंत्री बने केजरीवाल की मति पर पड़े भाटे तो समझ में आते हैं किन्तु राजीव गांधी जैसे दूरदर्शी के पुत्र होकर भी ऐसी बचकानी बातें करना अनेक बातों की तरफ़ स्पष्ट इशारा है।पार्टी में पहली पंक्ति के जिम्मेदारों कॊ इस गम्भीर्य कॊ समझने की नितांत आवश्यकता है कि क्या वाकई राहुल में अब भी अच्छे संगठक के गुण हैं..। कहने में कोई गुरेज नही कि नसीब और कर्म से इन्हें भविष्य में जो भी मिले,पर पार्टी कॊ अभी तो नुकसान सामने ही है..

rahul_gandhiअजय जैन ‘ विकल्प ‘

जिसने कभी खुद मंडी में जाकर या ठेले वाले भय्या से आलू नहीं  खरीदा हो ,वो भला कैसे समझेगा कि आलू की फैक्टरी नहीं होती है।अरे अभी तक जो अपने संगठन कॊ जी ही नही पाया ,वो भला मानुष तो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कॊ भी आलू ही मानेगा न।इसके लिए इनकी कांग्रेस पार्टी सहित कॊई भी नेता अगर इनको जिम्मेदार मानता है तो गलती उस संगठन की है,जिसने इनको ‘खून की दलाली’ कहने के लिए देश में नेता के भेष में अकेले छोड़ दिया है।बस जनपथ से ही चल रही पार्टी की मुखिया कॊ अब तो समझना-स्वीकारना चाहिए कि ,गाँधी का मतलब ही स्वीकार्य सत्ता,लोकप्रिय छवि  और जनप्रतिनिधि नहीं होता है।ऎसा बनने के लिए जीवन तक त्यागना पड़ता है।सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक ‘पर भाजपा के श्रेय कॊ लेकर राहुल ने क्या कहा,सवाल अब यह नही है।वरन ये है कि राहुल गांधी आखिर बात-हालात की गहराई कॊ नापना कब समझेंगे-सीखेंगे।इनके अब तक के राजनीतिक सफर में इतने उतार-चढ़ाव आने पर भी इन्होंने कोई सबक सीखा हो,इस पर विश्वास करना अभी भी ज़रा मुश्किल है।वास्तव में बात  भाजपा, सपा या कांग्रेस की नहीं है,उस हर युवराज की है जिसे संगठन-सत्ता विरासत में मिली है।राहुल गाँधी कॊ इनकी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता अक्सर ‘राहुल बाबा’ (प्रिय बच्चा या अनुभवी वरिष्ठ )के तौर पर बुलाते हैं,जिसकी पहचान तब होती है जब ये बेहद महत्वपूर्ण मामले में भी देशव्यापी विवाद खड़ा कर देते हैं।यानि इतने अनुभव और बड़ी सोच से दूर स्थानीय नेता जैसे बोलते हैं। कभी -कभी इनकी बुद्धि पर बड़ा तरस यूँ भी आता है कि,जिस मसले पर सोनिया गांधी ने विपक्षी होकर भी सरकार कॊ नही कोसा और हर छोटे-बड़े नेता ने पाकिस्तान के खिलाफ  ‘सर्जिकल स्ट्राइक ‘ कॊ भारतीय सेना का अच्छा जवाब बताया,उस पर ‘बाबा’ ने अनुभव से बड़े बनकर जरा भी नही सोचा। बस मौका मिला तो ‘खून की दलाली…’ बोल पड़े। पहले यूपी में प्रभार लेकर पराजय का ‘हार’ ले चुके राहुल ने वहाँ तो मोदी सरकार कॊ नही कोसा,लेकिन दिल्ली आते ही पता लग गया कि इनके वफादार भी कैसे हैं।ये फ़िर साबित हो गया है कि राहुल गाँधी नाम होने और विदेश में महँगी पढ़ाई का मतलब ही समझदारी नही होता है,वो तो दूर का भविष्य देखने और चीजों कॊ प्रैक्टिकली लेने से आती है।पहले भी कांग्रेस उपाध्यक्ष रहते हुए ही राहुल ने कहा था – यूपी के लोग भिखारी होते हैं।इनके इस बयान पर बखेड़ा होकर शांत हुआ तो भी इन्होंने बोलना नही सीखा।भूली-बिसरी यादों में जाईए तो याद आएगा कि इन महाराज ने ही कहा था-पंजाब के 70 प्रतिशत लोग नशेड़ी होते हैं।ये तब भी जिम्मेदारी के पद (उपाध्यक्ष) पर ही थे।सबसे पुराने दल और सबसे अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस के युवराज कॊ अभी कितना और क्या सीखना है ,ये संगठन का आंतरिक विषय हो सकता है लेकिन जब पद बड़ा हो,और तब भी राष्ट्रीय नेतृत्व में समझने-बोलने की जिम्मेदारी ही नही हो तो आलू की फैक्टरी ही डालना अधिक बेहतर हो सकता है।फिलहाल तो इन्हें (दिमाग से ही)बड़े होने की सख्त आवश्यकता है,वरना किसी दिन कांग्रेस कॊ इनके बयानों पर पूरे देशवासियों से ही माफी मांगनी पड़ सकती है।यकीनन पार्टी के पास परिवार में नेता रूप में दूसरा विकल्प नहीं है किन्तु राहुल बोलें और खराब बोलें-विवादित बोलें,इससे तो अच्छा है कि,चुप ही रहें।इनके बोलने से मिलते फायदे की आस में चुप रहने से हो रहा नुकसान पार्टी के लिए बेहतर है। इस मामले की गम्भीरता देखी जानी कहीं अधिक ज़रूरी है कि नुकसान कितना और किस तरह का होगा।क्या पार्टी और आप भूल गए ,जब बाबा बोले थे -गरीबी सिर्फ दिमाग का वहम है..और यह भी कि – इस देश को हिन्दुओ से ज्यादा खतरा है। इस बयानवीर के पुराने कई भाषण देखिए,तरस और हंसी आती है। इनके बेकार के बयानों और विवाद से अब तो यह लगता है कि पार्टी ही नही चाहती है कि,ये लोकप्रिय नेता बनें।इसलिए सही की बजाए उल्टी राय देती है जिससे इनको लम्बा राजनीतिक घाटा हो।लम्बे अज्ञातवास पर जाने और नई ऊर्जा से भरकर आने पर भी इनके ताजा बयान से बच्चा बुद्धि ही झलकती है।कांग्रेसी करुणा निधि,रेणुका चौधरी,हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता धरमवीर गोयल हों या श्रीप्रकाश जैसवाल(पूर्व कोयला मंत्री) और सलमान खुर्शीद ,इन्होंने भी कई गम्भीर मुद्दों पर ऊलजलूल बयान दिए थे।शायद राहुल भी उसी राह पर चल निकले हैं,जिसका परिणाम बहुत खराब यानि संगठन -सत्ता से दूर हो जाना है।राहुल के इतने अधिक शिक्षित होकर भी बुद्धि पर तरस इसलिए आता है कि,पाकिस्तान ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का बदला लेने के लिए एनजीटी की वेबसाइट हैक कर ली,तो भी बाबा कॊ ये सैनिकों के खून की दलाली ही लगी,जबकि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल की वेबसाइट हैक करके हैकर्स ने होम पेज पर गालियां लिखी और पीओके में भारतीय सेना की कार्रवाई को लेकर निशाना साधा।इस समय विद्वान केजरीवाल भी सो रहे थे।ऐसा मानना-कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संगठन इनके कन्फ्यूजन कॊ दूर नहीं कर सका है या वास्तव में ऐसा प्रायोजित रूप से आला नेता ही करा रहे हैं।अरे पहली बार नेता और मुख्यमंत्री बने केजरीवाल की मति पर  पड़े भाटे तो समझ में आते हैं किन्तु राजीव गांधी जैसे दूरदर्शी के पुत्र होकर भी ऐसी बचकानी बातें करना अनेक बातों की तरफ़ स्पष्ट इशारा है।पार्टी में पहली पंक्ति के जिम्मेदारों कॊ इस गम्भीर्य कॊ समझने की नितांत  आवश्यकता है कि क्या वाकई राहुल में अब भी अच्छे संगठक के गुण हैं..। कहने में कोई गुरेज नही कि नसीब और कर्म से इन्हें भविष्य में जो भी मिले,पर पार्टी कॊ अभी तो नुकसान सामने ही है..

वाकई ,सल्लू तुम देश के नहीं
इस बयानबाजी के दौर में लगी आग से फिल्म अभिनेता भी बच नही सके। जब ओमपुरी ने बयान दिया तो इसे सैनिकों के संगठन ने ही शहीदों का अपमान बता दिया और सोशल मीडिया पर जंग छिड़ गई।नतीजा कि देहरादून और ऋषिकेश में भारतीय सेना और शहीदों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में पूर्व नौसैनिक संगठन और पूर्व सैनिक संगठन की शिकायत पर  अभिनेता ओमपुरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया।तो क्या राहुल बाबा कॊ यह बात भी समझ नही पड़ी।इससे पहले सल्लू उर्फ सलमान खान की देश भक्ति देखिए कि,पाक  कलाकारों के मामले में बोल पड़े..पर राहुल यहाँ भी चुप रहे।इनका तो ठीक,पर सलमान खान का मुँह उस समय नहीं खुला था,जब अनुपम खेर को वीजा नहीं मिला था या फ़िर पाक में भारतीय फिल्मों पर बैन लगता है। पाकिस्तानी होकर अब भारतीय बन चुके गायक अदनान सामी ने भारतीय सेना की प्रशंसा की तो भी पाक का पेट दुःख गया, पर राष्ट्रीय पद पर आसीन राहुल बाबू कॊ तब भी समझ नहीं पड़ी कि ये खून की दलाली नहीं है। संगठन कॊ इनके राजनीतिक विकल्प तलाशने चाहिए ।राहुल की समझ थोड़ी और देखिए कि, उरी हमले के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव है ,तब भी यह पाक के विरोध में कुछ खास नही बोले।हमारी सेना पर हमले के बाद पाकिस्तानी कलाकार वापस चले गए,जिस पर भारत में कई नेताओं और अभिनेताओं ने विवादित बयान भी दिए तो पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम ने भी विवादित बयान(भारत काफिरों का देश ) देकर माहौल को और ख़राब किया..पर कांग्रेस के युवराज चुप रहे।भारत से जंग करने की हिम्मत में ही परास्त पाकिस्तान ने भारत के लिए अपने सभी एयरस्पेस से विदेशी कमर्शियल एयरलाइंसों को कम ऊंचाई पर उड़ान भरने से रोक लगा दी,तब भी राहुल गांधी और स्वयंभू विद्वान अरविन्द केजरीवाल की आवाज़ नही निकली, जबकि इस रोक का सीधा मतलब था कि लाहौर के ऊपर से 29,000 फीट से कम ऊंचाई पर कोई भी विमान उड़ान नहीं भर पाएगा और भारतीय विशेषज्ञ पाक के इस कदम को भारत के कूटनीतिक दबाव और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का असर बता चुके थे।वो तो भला हो सेना के लिए सदैव अच्छा सोचने-करने वाले नाना पाटेकर का, जो उन्होंने सेना के पक्ष में फालतू के बयानों पर ‘प्रहार ‘ किया तो इधर ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ पर सबूत मांगने वालों को अभिनेता अक्षय कुमार ने सैनिक-सा मुंहतोड़ जवाब दिया। फेसबुक पर वीडियो डालकर उन्होंने पाक के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना के लक्षित हमलों पर उठाये जा रहे सवालों की न बस आलोचना की, बल्कि कहा कि सर्जिकल स्‍ट्राइक के सबूत मांगने वालों(केजरीवाल) को शर्म करना चाहिए। राहुल बाबा ने शायद इनको देखा-सुना नही,सम्भव था कि खून की दलाली और आलू की फैक्टरी जैसी बात नही करते।अक्षय कुमार ने यह भी कहा कि,आपस में झगड़ने वाले शहादत का सम्‍मान करें, सेना पर सवाल उठाना ठीक नहीं। सेना पर सवाल न उठाएं, सेना है तो हम हैं,सेना नहीं तो हिंदुस्‍तान नहीं। अक्षय कुमार ने कहा कि वह इस बात से हैरान हैं कि कुछ लोग ऐसे समय में पाकिस्तानी कलाकारों पर पाबंदी पर बहस कर रहे हैं जबकि सीमा पर आतंकी हमले में हमारे जवान शहीद हुए हैं। पाक कलाकारों के समर्थकों (सलमान ) को शर्म करना चाहिए।सलमान ने तो यह साबित कर ही दिया कि वो भारत में होकर भी देशभक्त नहीं हैं,पर बाबा तो इसे भी नहीं समझे।बेहतर हो कि राहुल बाबा चुप रहकर बोलना सीखें।

1 thought on “शायद पार्टी ही कन्फ्यूज है राहुल के भविष्य पर

  1. राहुल अब कांग्रेस के “प्रॉब्लम चाइल्ड ” बन गए हैं , दुसरे नेता यदि स्तरहीन , ओछे बयान देते हैं तो उनको सुन कर अनसुना किया जा सकता है लेकिन पार्टी का उपाध्यक्ष जिन्हें की पार्टी मानती है , ऐसे बयान दें तो लगता है की उनका पूर्ण राजनैतिक मनोज्ञान बहुत कमजोर है , जो भी नजदीकी चाभी भर देता है वे बोल पड़ते हैं , उस पर वह कोई बहस करने को जवाब देने को तैयारनही होते क्योंकि उनको इसका पूरा ज्ञान ही नहीं है , न सोचने की क्षमता है , बसविरोध करने पर उस बात को जिद्ही बच्चे की तरह बार बार दोहराते हैं , क्योकि वह कुछ कर तो सकते नहीं और यह महसूस कराते हैं मानो वे चिड़ा रहे हों , वे जानते भी हैं कि उन्होंने गलत कहा है , ऐसे में उनकी हरकतों पर हंसी ज्यादा आती है , विचार करने की जरुरत कतई लगती
    पार्टी , उसके सभी नेता इस बात को अच्छी तरह जानते भी हैं , पर उन में इतनी हिम्मत कि वे कुछ कह सकें , ऐसे को भी यह सन्देश जाता है कि ऐसे कमजोर नेतृत्व को क्यों चुने जब कि उनके उपास विकल्प मौजूद है

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