आजादी की अभिव्यक्ति या अभिव्यक्ति की आजादी?

अखिलेश आर्येन्दु

आए दिन जिस भाषा का इस्तेमाल नेताओं, मज़हब और जाति के ठेकेदारों और मीडिया के जरिए होता है वह वाकई में लोकतंत्र के लिए बहुत चिंता की बात है। चिंता की बात इस लिए भी है कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी केे नाम पर कुछ भी कहने-सुनने की छूट मिलने की वजह से  इसके गलत इस्तेमाल की प्रवृति लगातार बढ़ रही है, जो लोकतंत्र और समाजहित में कतई नहीं है। गौरतलब है भारतीय समाज का जिन तमाम विशेषताओं, मूल्यों और व्यवहारांे से दुनियाभर में लोग इसकी इज्जत किया करते थे, वे मूल्य और व्यवहार हमारे जीवन-व्यवहार से दूर होते जा रहे हंै। भारत में जिस तरह से पिछले 40 सालों से हिंसा, आक्रामकता, असहिष्णुता, असहजता और यौनाचार बढ़ा है, वह वाकई में बहुत चिंता पैदा करने वाला है। इसी से ताल्लुक रखने वाले नई पीढ़ी के ऐसे सवाल जिसका जवाब बहुत कठिन नहीं, तो सरल भी नहीं है। इसमें पहला सवाल यही है कि नई भारतीय पीढ़ी जिस दौर से गुजर रही है, क्या उसमें सहजता, सहनशीलता और धैर्य नाम की चीज पूरी तरह खत्म हो गई है? दूसरा सवाल, नई पीढ़ी के चारित्रिक संस्कार का वाकई में खात्मा हो गया है? तीसरा सवाल, समाज मूक दर्शक क्यों होता जा रहा है? और शासन-प्रशासन के जिम्मे ही व्यक्ति को उसकी सीमा को याद दिलाया जाना ही क्या एक सुधार का उपाय रह गया है? मीडिया, सामाजिक संस्थाएँ, सुधारगृह, धार्मिक संस्थाएँ, सांस्कृतिक और शैक्षिक संस्थाएँ, सभी क्या अपनी वह भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं, जिसके लिए ये बने हैं? समाज की दूषण दशा और दिशाहीन दिशा को बेहतर करने का क्या कोई उपाय नहीं रह गया है? व्यक्ति, समाज इतना हौचपौच, असहाय, असहज और किमकर्तव्यविमूढ़ क्यों होता जा रहा है? खुद को अपनी कारगुजारियों से बचाने के लिए गिरगिट का रंग बदलने का संस्कार व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा क्यों बनता जा रहा है? हिंसक, भ्रष्ट और अनैतिक तरीका अपनाने के बाद भी पश्चाताप की जगह गौरव क्यों महसूस होने लगा है? क्या ये सवाल सवाल बनकर ही दिवालियेपन में खो जाएँगे या इनका जवाब, सुखद आशा के गर्भ से निकलकर समाज को एक दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध हो सकेंगे? यह भी एक बड़ा सवाल है।

अहिंसा, प्रेम और सहिष्णुता के लिए जाने वाले भारतीय समाज में हिंसा, नफरत और असहिष्णुता लगातार बढ़ती जा रही हंै। सवाल यह है, असहिष्णुता, हिंसा, क्रूरता और असहजता समाज में क्यों बढ़ती जा रही हंै? क्यों जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों से नई पीढ़ी लगातार दूर होती जा रही है? जिंदगी बेहतरी की तरफ न जाकर बदहाली की तरफ क्यों बढ़ती जा रही है? ये ऐसे सवाल है जिसे न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न तो टाला जा सकता है। मौजूदादौर में रिश्तों, मूल्यों, कार्यों और हमारी अभिव्यक्ति में हिंसा और आक्रामकता पूरी तरह छाई दिखती है। कौप तो तब होती है जब मीडिया में भी हिंसा और आक्रामकता को शिष्टाचार और विशिष्टता की तरह पेश किया जा रहा हो। जिंदगी पर सीधे असर डालने वाले मंजर और कारकों के अच्छे-बुरे असर को नजरअंदाज किया जाना ही नहीं बल्कि इसे ‘माडर्न कल्चर’ नाम देने की बात मामूली हो गई है। बहुत सारी सरकारी और गैरसरकारी योजनाएँ समाज को बेहतर बनाने की लिए चलाई जाती हैं, लेकिन ये योजनाएँ केवल योजनाएँ बनकर रह जाती हैं। जिस मकसद के लिए ये होती हैं, वह मकसद बहुत पीछे छूट जाता है और उसकी जगह ‘खाने-कमाने’ का एक और मौका योजनाओं के पैरोकारों को मिल जाता है।

मीडिया के सभी पक्षों पर नहीं, बल्कि मीडिया और फिल्म-सीरियलों में परोसी जा रही भाषा की आक्रामकता और हिंसा का ही परीक्षण करें तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि समाज में बढ़ रही विकृतियां और दुष्प्रवृतिृयांे की वजह हिंसा, आतंक, बर्बरता, आगजनी, तोड़फोड़ की घटनाएँ ,रोजमर्रा की मामूली घटनाएँ जैसी होती जा रही हैं। समाज में नकारात्मक चीजों का लगातार बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मीडिया में परोसी जा रही हिंसा, बर्बरता, आक्रामकता और अनैतिकता के नये रंग-ढंग हैं।

दण्डविधान के साथ ही साथ संविधान में जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात आए दिन दुहराई जाती है, उसका आज कितना दुर्पयोग हो रहा है और कितना सदुपयोग, किसी से छिपा नहीं है। क्या अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी, किसी भी तरह बोलने की छूट मिलनी चाहिए? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा और आक्रामकता से देश, समाज और सांस्कृतिक-मूल्यों का जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई किसी तरह से की जा सकती है? यदि इसका जवाब ‘नहीं’ है तो फिर इस तरफ गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की जा रही है?

एक समय था विदेशी लोग यहाँ की भाषा-बोली, व्यवहार और अच्छे विचारों के कायल हुआ करते थे। हमने आजादी के बाद विकास किया और आज दुनिया के सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली अर्थ-व्यवस्थाओं में भारत का प्रमुख स्थान है। दूसरी तरफ, हम आजादी के बाद अपने जीवन-मूल्यों, पारंपरिक -मूल्यों, सांस्कृतिक और सामाजिक-मूल्यों से इतने कट गए कि हम यह भूल गए कि हम पहले क्या थे और आज क्या हैं। हमें प्रगति के रास्ते पर किधर जाना चाहिए था और आज किधर जा रहे हैं। हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जिन संवादों और व्यवहारों के जरिए एक दूसरे से रू-ब-रू होते हैं, उसका स्तर कितना गिर गया है? क्या कभी इस पर गौर करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए?  हमारी क्या जरूरतें बस कमाओ, खाओ और उछल-कूद तक ही सीमित हो गई हैं? जिस समाज में हम रहते हैं उसकी बेहतरी के लिए क्या हमारा कोई फर्ज नहीं बनता? आखिर, इन सब बातों पर कौन सोचेगा?।

आजादी के पूर्व की पत्रकारिता के दौर पर एक नजर डालिए।.. जिस हिंदी मीडिया की कभी खूब तारीफ हुआ करती थी उसी मीडिया (अखबार और चैनल) तथा फिल्मों में हिंदी के नाम पर असहज और भ्रष्ट शब्दों का इस्तेमाल से यह साबित हो ही गया है कि अब अखबार या चैनल से मूल्यों, संस्कारों और सिद्धांतों के पालन की बात सोचना ही बेईमानी हो गई है। मीडिया मूल्यविहीन, असंस्कारित और अमर्यादित हो गया है।

हम संसद, विधानसभाओं और नगरपालिकाओं में होने वाले शोरगुल और आक्रामकता की चर्चा बहुत ढंग से करते हैं, लेकिन परिवार, मुहल्ले, गलियों, कस्बों और गाँवों में बढ़ती अभिव्यक्ति की आक्रामकता को अनसुनाकर आँखें मूँदे रहते हैं। आज भी जब अशिष्टता और गंवारूपन की बात कहनी होती है तो गांव के अशिक्षित और अनगढ़ लोगों का उदाहरण देते हैं जो न तो सभ्य तरीके से बोलना जानते हैं और न तो भद्र तरीके का व्यवहार करना। लेकिन, अब तो बात उल्टी होती जा रही है। समाज का सबसे शिक्षित तबका हो या अर्द्धशिक्षित तबका। आए दिन, इनमें जिस तरह की भाषाई और व्यवहारगत आक्रामकता दिखाई पड़ती है उसे देखकर तो यही लगता है, इनसे भला तो गाँव का वह तथाकथित ‘अनपढ़-गँवार’ आदमी ही अच्छा है, जो अपनी हद तो जानता है।

केवल हिंदी पत्रकारिता की ऐसी दुर्दशा का रोना नहीं है बल्कि दूसरी भाषाओें की पत्रकारिता की स्थिति भी कमोवेश ऐसी ही है। हिंदी की जैसी दुर्दशा हिंदी के कुछ स्वनाम धन्य अखबारों ने अंगे्रजी शब्दों के साथ नई तथाकथित भाषा गढ़ने और परोसने के नाम पर की है उससे समाज में जो दुष्प्रभाव भाषा और संवाद के स्तर पर पड़ रहा है उसकी शायद इन्हें कल्पना भी नहीं है। बाजार में स्पर्धा के इस दौर में स्वस्थ स्पद्र्धा भी तो की जा सकती है। विज्ञापनों, घटनाओं, कहानियों और लेखों की भाषा जिस तरह से अखबारों और चैनलों में अव्यावहारिक और व्याकरणविहीन होती जा रही है उससे भले ही अखबार और चैनल अपनी कथित प्रतिष्ठा बढ़ा लें लेकिन समाज को इससे एक भाषाई भटकाव ही हासिल हो रहा है।

कितनी गहरी संवेदना और विवेचना हमारी संस्कृति में रही है, इसके एक-दो उदाहरण हमारे सामने नहीं है बल्कि हजारों उदाहरण और सद्भावनाओं से भरे पड़े हैं। जिस अक्षर को हमारी संस्कृति में ब्रह्म कहा गया है उस अक्षर और शब्द के साथ ऐसा अत्याचार कि शब्द की अर्थवत्ता ही निरर्थक साबित हो जाए। जिन शब्दों के जरिए मीडिया लोगों को कोई भी सूचना या विचार देता है, वे भद्र और पवित्र भी तो हो सकते हैं। लेकिन ऐसे हिंसक या आक्रामक शब्दों का क्या मतलब जिससे सुनकर मन में आक्रामकता पैदा होती हो। जैसे..उसने उसकी . ऐसी की तैसी की कर दी। मारते-मारते उसका कचूमर निकाल दिया…. उसने गोली मारी तो उसके भाई ने उसकी खोपड़ी तोड़ दी…  उसका उसने दिल जलाया ..उसने उसका घर। हरामज़ादों ने उम्र भी नहीं देखी।’ ऐसे वाक्यों को पढ़कर समाज कौन-सी भाषा सीखेगा।

मीडिया का दोनों हिस्सों की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले दो दशकों में काफी कुछ बदलाव आया है। कुछ अखबारों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर अखबारों में एक या दो शब्द उर्दू या हिंदी के होते हैं बाकी शब्द अंगे्रजी के, वह भी यूरोपीय लिपि में। यही हाल प्राइवेट चैनलों का है। हर दिन जितने भी समाचार प्रसारित होते हैं, उसमें इस्तेमाल की गई कथित हिंदी, बोलने और लिखने- दोनों स्तरों पर अशुद्ध होती है। जो लोग मीडिया से हिंदी सीखना चाहें वे तो कभी भी शुद्ध और बेहतर हिंदी नहीं सीख पाएंगे? दर्शकों और पाठकों के स्तर का विचार मीडिया से एकदम गायब होता जा रहा है। इससे आने वाले भाषाई संकट का अनुमान हम लगा सकते हैं कि कुछ सालों में हिंदी उसी तरह अपना शुद्ध रूप खो देगी जैसी दूसरी भारतीय भाषाएँ। समाज का प्रत्येक क्षेत्र समस्याग्रस्त और प्रदूशित हो रहा है। हमें इस ओर गौर करने की बेहद जरूरत है। आक्रमकता का यह विध्वंशकारी दौर रुकेगा या बढ़ता जाएगा? भाषा के स्तर पर हम निहित स्वार्थ और दुर्वृति पर निगाह डालेंगे या यह ऐसे ही बिना लगाम के घोड़े की तरह इसे स्वछन्द  बढ़ते देखते रहेंगे?

 

 

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