गजल-दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन-इकबाल हिंदुस्तानी

शुक्र है मौसम सुहाना हो गया,

उनके आने का बहाना हो गया।

 

तुम इसे चाहे कोर्इ भी नाम दो,

मुल्क गै़रों का निशाना हो गया।

 

हो हुकूमत पांच दिन तो ठीक है,

राज बरसों का पुराना हो गया।

 

बात कुछ भी हो विदेशी हाथ है,

यह तो नाकामी छिपाना हो गया।

 

हमको रहबर ने अगर बेचा नहीं,

फिर लबालब क्यों ख़ज़ाना हो गया।

 

जिसने फि़कऱ्ावारियत की राह ली,

हाशिये पर वो घराना हो गया।

 

सूफी संतो का जो मरकज़ था कभी,

धोखेबाज़ों का ठिकाना हो गया।

 

दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन,

मात खाते अब ज़माना हो गया।।

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