लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना


केन्द्र की मोदी सरकार के तीन वर्ष के कार्यकाल में जीएसटी के रूप में यह और उपलब्धि जुड़ गई है। अगले महीने मई में जब मोदी सरकार तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने का जश्न मनायेगी तो जीएसटी लागू होने का संतोष मोदी सरकार के मंत्रियों और बीजेपी नेताओं पर साफ दिखाई देगा। यह मोदी की जिद्द ही थी जो बहुप्रतिक्षित और चर्चित गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) ने आखिर साकार रूप ले ही लिया गया। एक जुलाई से पूरे देश में यह लागू भी हो जायेगा। जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर यानी इंडायरेक्ट टैक्स है। जीएसटी बिल पास कराने के तरीके को लेकर मोदी सरकार पर भले ही उंगली उठाई जा सकती हो,लेकिन इसमें सरकार की नियत में खोट जरा भी नजर नहीं आ रही है। जीएसटी वैसे तो कई वर्षो से सुर्खिंया बटोर रहा था लेकिन पूववर्ती सरकरों की इच्छा शाक्ति की कमी और कुछ राजनैतिक मजबूरियों की वजह से यह अटका हुआ था।यह स्थिति तब थी जबकि जीएसटी पर करीब-करीब सभी बड़े-छोटे राजनैतिक दल थोड़े-बहुत मतभेद के साथ सहमति जता रहे थे। मगर मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण करने के पहले दिन से ही जीएसटी को लेकर गंभीर रूख अपनाया। इसके लिए एक तरफ राजनैतिक स्तर पर आम सहमति बनाने का प्रयास लगातर जारी रहा तो दूसरी तरफ अर्थशास्त्र के जानकारों, उद्योगपतियों, बड़े-छोटे व्यापारियों की आशंकाओं को भी बहस करा कर दूर किया जाता रहा। व्यापार जगत को यह भी बताया कि जीएसटी से इंस्पेक्टर राज का खात्मा हो जायेगा। जनता के बीच भी यह संदेश देने की कोशिश की गई कि जीएसटी आने से मंहगाई घटेगी, जिसका असर यह हुआ कि जीएसटी को लेकर विरोध करने वालों की संख्या कम होती गई। आर्थिक सुधार की दिशा में जीएसटी ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकता है। इसके अलावा सरकार को लगता है कि जीएसटी लाूग होने से आर्थिक विकास दर(जीडीपी)में भी दो प्रतिशत तक बढोत्तीर हो सकती है। हालांकि इसकांे लेकर कुछ आशंकाएं थी जिसके बारे में यही कहा जा सकता है जीएसटी सम्पूर्ण नहीं है। पहली जुलाई से जब यह लागू होगा उसके बाद ही जमीनी हकीकत का सही अंदाजा लग पायेगा। अगर इसमें ससोधन की जरूरत पड़ेगी तो सरकार कई बार कह चुकी है,वह इसे अपनी प्रतिष्ठा का इश्यू नहीं बनायेगी।
करीब एक दशक की मशक्कत के बाद 29 मार्च 2017 को लोकसभा ने जीएसटी से संबंधित चार बिलों सेंट्रल जीएसटी, इंटिग्रेटेड जीएसटी, यूनियन टेरिटरी जीएसटी और कॉम्पेंसेशन जीएसटी को पास कर दिया। यदि 1991 के अर्थिक सुधारों ने देश को लाइसेंस-परमिट राज से मुक्त किया था, तो जीएसटी व्यवस्था सहकारी संघवाद की अवधारणा को हकीकत में बदल सकती है, वास्तव में उदारीकरण और नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बावजूद देश की कर व्यवस्था पुराने ढर्रे पी ही चलती रही है, जिसकी वजह से आम जनता,व्यापारी और सरकारी खजाने, तीनों को ही नुकसान होता आया है, जीएसटी को वित्तीय बिल की तौर पर पास किया गया हैं, लिहाजा लोकसभा से इनके पारित होने के बाद इन पर राज्यसभा की मुहर लगने और राष्ट्रपति के दस्तखत होने की औपचारिकताएं ही शेष बची हैं। जीएसटी को वित्तीय बिल के रूप में पेश किये जाने की वजह से ही विरोधी खासकर कांगे्रसी नाराजगी जता रहे थे,लेकिन अगर मोदी सरकार ऐसा न करती तो जीएसटी बिल पास कराने में निश्चित तौप पर और अधिक समय लगता, ऐसी दशा में जीएसटी से होेने वाले सियासी फायदा को मोदी सरकार 2019 के लोकसभा चुनाव के समय भुना नहीं पाती। अब यही उम्मीद की जानी चाहिए कि जीएसटी काउंसिल विभिन्न वस्तुओं पर टैक्स की दरें जल्द से जल्द तय कर देगी। सभी राज्य सरकारें भी निर्धारित समय में राज्य जीएसटी कानून पास करा लेंगी, ताकि मोदी सरकार की मंशा के अनुरूप जीएसटी एक जुलाई से लागू हो जाए। अब जबकि जीएसटी जमीन पर उतरने जा रहा है तो सभी को यह उम्मीद है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड रिसर्च की एक रिपोर्ट भी कहती है कि जीएसटी लागू होने से देश की जीडीपी में एक से पौने दो फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। शराब को छोड़कर बाकी सारी वस्तुओं और सेवाओं को इसके दायरे में लाया जा रहा है।
बात जीएसटी की आवश्यकता क्यों पड़ी ? इसकी की जाये तो विभिन्न राज्यों के बीच जिस तरह टैक्स में असंतुलन आ गया था, उससे निपटने के लिए जीएसटी आवश्यक हो गया था। इसके लागू होने से उत्पाद शुल्क, सेवा कर, राज्य वैट, मनोरंजन कर, प्रवेश शुल्क, लग्जरी टैक्स जैसे तमाम टैक्स समाप्त हो जाएंगे। इस समय देश में केंद्र और राज्यों के आठ से दस अप्रत्यक्ष कर सेस है, जीएसटी लागू होने के बाद ये खत्म हो जाएंगे और इसका मतलब है कि दोहरे कराधान से सबको निताज मिल जायेगी। इनकी जगह देश भर में एक समान कर प्रणाली जीएसटी लागू हो जाएगी, जिससे निश्चित ही उद्योगपतियों, व्यापारियों आदि में दशकों से चले आ रहे इंस्पेक्टर राज के खौफ का भी अंत होगा। यहां यह बताते चले कि जीएसटी की चार दरें होंगी। इसकी अधिकतम सीमा 28 फीसदी होगी। इसके अलावा लग्जरी सामान पर अलग से सेस भी लगेगा। इसके तहत करों के कई स्लैब रखे गए हैं। खाने-पीने की चीजें और पेट्रोलियम पदार्थ 0 फीसदी टैक्स स्लैब में आएंगे। दूसरा टैक्स स्लैब 5 फीसदी का होगा, तीसरा 12-18 फीसदी का होगा जबकि अधिकतम टैक्स स्लैब 28 प्रतिशत का होगा। जीएसटी का मकसद तो यही है कि आम आदमी के उपयोग की चीजें सस्ती हों और भोग-विलास के सामान पर अतिरिक्त टैक्स लगाकर सरकार के राजस्व में इजाफा किया जा सके।
बहरहाल, जीएसटी आने से सब कुछ ‘हरा-हरा’ ही नहीं दिखाई पड़ने लगेगा। नई व्यवस्था में कुछ समस्याएं भी आएंगी। जीएसटी से प्रभावित होने वाले लोंगो और संस्थानों को नए कर ढांचे को समझने में समय लगेगा तो जीएसटी के अनुरूप सॉफ्टवेयर भी लोड करना पड़ेगा। इसी तरह की और भी तमाम व्यवहारिक समस्याएं सामने आयेंगी। जीएसटी काउंसिल को देखना होगा कि आवश्यक वस्तुओं के दाम न बढ़ें। जीएसटी लागे हो यह मोदी सरकार का एक सुनहरा सपना था,इस लिये उम्मीद यही कि जानी चाहिए कि क वह इसमें कोई अनियमितता बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसकी हर स्तर पर समीक्षा होगी।
लब्बोलुआब यह है कि यह जीएसटी उन औद्योगिक और व्यापारिक संस्थानों की सेहत के लिये तो अच्छा साबित होगा जो नंबर एक का काम करते हैं, लेकिन वह लोग जरूर परेशान होंगे जो हिसाब-किताब में कमजोर हैं या फिर जिनकी नियत में खोट हैं। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि जीएसटी को समझने में आने वाली अड़चन को सरकार अपने स्तर से तो दूर करेगी ही, इसके अलावा अर्थशास्त्र और वित्तीय क्षेत्र के जानकारों को भी नैतिकता के आाधार पर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।

ऐसे काम करेगा जीएसटी-

जीएसटी में तीन हिस्सो में बंटा होगा। केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी और इंटीग्रेटेड जीएसटी। केंद्रीय और इंटीग्रेटेड जीएसटी केंद्र लागू करेगा जबकि राज्य जीएसटी राज्य सरकारें लागू करेंगी। जीएसटी लागू होने से कई और तरह के टैक्स नहीं लगेंगे। जीएसटी लागू होने से अभी लगने वाले वैट और सेनवेट दोनों खत्म हो जाएंगे।

यह फायदे मिलेंगेे-

संविधान के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारें अपने हिसाब से वस्तुओं और सेवाओं पर टैक्स लगा सकेंगीं। अगर कोई उत्पादक एक राज्य में अपने उत्पाद बनाकर दूसरे राज्य में बेचता है तो उसे कई तरह के टैक्स दोनों राज्यों को चुकाने होते थे जिससे उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है। जीएसटी लागू होने से उत्पादों की कीमत कम होगी।

आम आदमी का भला-

जीएसटी लागू होने से सबसे बड़ा फायदा आम आदमी को होगा। पूरे देश में किसी भी सामान को खरीदने के लिए एक ही टैक्स चुकाना होगा। यानी पूरे देश में किसी भी सामान की कीमत एक ही रहेगी।इसे उदाहरण के तौर पर समझा जाये तो आज की तारीख में अगर आप कोई कार दिल्ली में खरीदते हैं तो उसकी कीमत अलग होती है, वहीं किसी और राज्य में उसी कार को खरीदने के लिए अलग कीमत चुकानी पड़ती है। इसके लागू होने से कोई भी सामान किसी भी राज्य में एक ही रेट पर मिलेगा। इसके अलावा अभी जो सामान खरीदते समय लोगों को उस पर 30-35 प्रतिशत टैक्स के रूप में चुकाना पड़ता है वो ही जीएसटी लागू होने के बाद घटकर 20-25 प्रतिशत पर आ जाने की संभावना है।

कर विवाद में कमी आयेगी

जीएसटी लागू होने से कई बार टैक्स देने से छुटकारा मिल जाएगा। इससे कर की वसूली करते समय कर विभाग के अधिकारियों द्वारा कर में हेराफेरी की संभावना भी कम हो जाएगी। एक ही व्यक्ति या संस्था पर कई बार टैक्स लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, सिर्फ इसी टैक्स से सारे टैक्स वसूल कर लिए जाएंगे। इसके अलावा जहां कई राज्यों में राजस्व बढ़ेगा तो कई जगह कीमतों में कमी भी होगी।

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