लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान
उत्तर भारत में ठंड की वजह से जन जीवन बुरी तरह प्रभावित है। भारत के कई इलाक़ों को ठंड ने पूरी तरह अपने आग़ोश में ले लिया है। हर तरफ़ कोहरा, शीतलहर और ठिठुरते लोग। कड़कड़ाती ठंड में सड़क के किनारे बैठे मज़दूरों का चाय की गरम प्याली और बीड़ी के कश का सहारा है। एक ओर जहाँ लोग सर्दी से परेशान हैं वहीं कोहरे और धुंध के चलते सुबह शाम सडक, हवाई और रेल यातायात प्रभावित हो रहा है। ठंड ने इंसान और जानवर तक की दूरी मिटा दी है। भारत में हर वर्ष ठंड से सैकड़ों बेघर लोगों की मृत्यु हो जाती है। इस वर्ष भी आंकड़ा सैकड़ा पार कर चुका है। जिनके घर हैं वे आराम से रातें गुजार रहे हैं। उनके लिए किसी गरीब की मौत बस एक खबर है। नई दिल्ली में कई सारे बेघर लोग अपनी रात किराये के बिस्तरों व रजाई के साथ सड़कों पर गुजारते हैं। एक समाचार के मुताबिक यमुना बाजार पुल के नीचे रात गुजारने वालों की तादाद ढाई सौ के आसपास है, लेकिन उनके लिए कंबल महज 100 से भी कम हैं। अब या तो खुद का कंबल लाइए या फिर किराये पर रात बिताइए। रिक्शा चलाने वाले मोहम्मद शकील ने बताया कि अगर इस रैन बसेरे में आते-आते शाम के 7 बज जाएं, तो फिर कंबल के लिए किराये का ही आसरा बचता है। नया लिहाफ लेंगे तो 20 रुपये और पुराने में काम चलाना है तो 10 रुपये। किराये पर कंबल बेचने वाले ठेकेदार की दुकान भी इसी पुल के नीचे है, जहां हजारों की तादाद में कंबल और गद्दे सजे रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि कोई बेसहारा सर्दियों में फुटपाथ या पार्क में न सोए। बेसहारा को रात में खाने, सोने सहित शौचालय व स्नानघर की व्यवस्था मुहैया करवाई जानी चाहिए। लेकिन यह एक स्वप्न जैसा ही है। उत्तर प्रदेश के अधिसंख्य मैदानी इलाकों में चल रही सर्द हवा ने पशु पक्षी और आम ओ खास इंसान सभी को ठंड ने हलकान कर रखा है। एक सप्ताह पहले हाथरस जिलाधिकारी ने जिले में शीत लहर के चलते लोगों की मदद के लिये रैन बसेरा, अलाव आदि के सुचारू बंदोबस्त सुनिश्चित करने तथा गरीब, असहाय व्यक्तियों को गर्म कम्बल मुहैया कराकर राहत देने के लिये सभी एसडीएम और नगर पालिका-नगर पंचायतों के अधिशासी अधिकारियों को निर्देश दिये थे। जिलाधिकारी शमीम अहमद खान ने देर रात अधिकारियों के साथ शहर में विभिन्न इलाकों का दौरा करके शीत लहर में लोगों की मदद के लिये रैन बसेरा, अलाव की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। फोटो खिंचवाने के बाद प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई लेकिन जरूरतमंदों को ठंड से राहत का ठीक इंतज़ाम नहीं हो पाया। पहाड़ों में बर्फबारी के बाद पड़ रही कड़ाके की ठंड से इंसान तो इंसान अब जानवर भी ठिठुरने लगे हैं। रात के समय यहां तापमान माइनस में पहुंच रहा है। शिमला और उसके ऊपर कड़ाके की ठंड है। यहां रेन बसेरे हैं लेकिन उनकी हालत जर्जर है और बाकी सुविधाएं भी कम हैं।

करीब10 साल पहले जिस सुविधा को लेकर यहां रैन बसेरे का निर्माण किया गया था। उस पर अब राजस्व विभाग का कब्जा है। सुजानपुर का तहसील कार्यालय पिछले करीब एक साल से इसी रैन बसेरा में खोला गया है। उत्तराखंड की स्थिति और भी ख़राब है। यहां रेन बसेरे बड़े शहरों तक ही सीमित हैं। झारखंड में कड़ाके की ठंड पड़ रही हैं 25 जनवरी को रांची के कांके का न्यूनतम तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस तक गिर गया। कड़ाके की ठंड में बाघों ने घने जंगलों से निकलकर इंसानी बस्तियों की तरफ रुख करना शुरू कर दिया है। इंसान आग के सहारे हैं और शाम ढलते ही झोंपड़ियों में गूदड़ों में दुबक जाते हैं। बिहार में भी ठिठुरन है। पटना में रेन बसेरों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। भागलपुर के सात रैन बसेरों की स्थिति ठीक नहीं है। निगम के रंग-रोगन कराने के बाद भी रात में कई रैन बसेरों पर ताला लटका रहता है। सात में से छह रैन बसेरों में शौचालय नहीं हैं। बरारी हाइस्कूल के पास के रैन बसेरा पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा लिया है। रात को भीतर से ही ताला मार कर अपने घर चले जाते हैं। पंजाब से लेकर राजस्थान और मध्य प्रदेश तक यही हाल है। पूरा राजस्थान इस समय कड़ाके की ठंड की चपेट में है। राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में लगातार तापमान में गिरावट का दौर जारी है। राजधानी जयपुर में 24 जनवरी की रात मौसम की सबसे सर्द रात थी। यहाँ बेसहारा लोगों को ठंड से बचाने के लिए 18 रैन बसेरे काम कर रहे हैं। इनमें हर रात बड़ी तादाद में लोग पनाह लेते हैं। इनमें कोई मज़दूर है तो कोई हालात का मारा मजबूर। सुविधाएं कम हैं, गन्दगी है लेकिन मजबूर इंसान क्या करे। अब अलवर में रैन बसेरा बना हुआ है पुलिसकर्मियों का आवास। नगरपालिका प्रशासन व पुलिस प्रशासन की मिली भगत के चलते गरीब असहाय, मुसाफिरों को रैन बसेरे का लाभ नहीं मिल पा रहा है। जानकारी होने के बावजूद भी प्रशासन ने मूंद रखी हैं। जिस के कारण जरुरतमंद लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हरयाणा के यमुनानगर में खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं बेघर लोग। एक रैन बसेरा भी यहां नसीब नहीं है, सड़कों पर गुजारते हैं लोग सर्द रात। मध्यप्रदेश के नीमच शहर में सर्दी में बेसहारा लोगों को ठंड से बचाने के लिए नगर पालिका ने साढ़े 33 लाख की लागत से रैन बसेरा बनवाया था। पर्याप्त प्रचार के अभाव में इसका लाभ मुसाफिरों को नहीं मिल रहा। नीमच सिटी रोड पर स्थित रैन बसेरा में 15 पुरुष व 10 महिलाओं के लिए हॉल, सुविधा घर व गार्ड रूम है। यहां पूरे संसाधन होने के बाद भी मुसाफिरों को रात गुजारने के लिए इधर-उधर भटकते रहे हैं। बावजूद इसके मेंटेनेंस के नाम पर हर महीने हजारों रुपए खर्च हो रहे हैं। जयपुर निवासी खेताराम नायक ने बताया रात को नीमच आया। यहां से रामपुरा जाना था। बस नहीं मिली तो रातभर बस स्टैंड पर गुजारी। शहर में रैन बसेरा कहां है, नहीं पता। कम से कम रैन बसेरा कहां है उसका सूचना बोर्ड लगाया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में शहर में 10 बिस्तरों का एक ही रैन बसेरा है। ऐसे में शहर में बाहर से मजदूरी करने वाले बेघर व जरूरतमंद फुटपाथ पर सोने मजबूर हैं। रैन बसेरा में बिस्तर कम होने के कारण लोग वहां नहीं ठहर पा रहे। नगर-निगम व जिला प्रशासन चाहे तो रैन बसेरा की संख्या और बिस्तर बढ़ाकर इन लोगों को लाभ दे सकता है। खासतौर पर ठंड के दौरान इन लोगों को आसरे की बहुत जरूरत होती है। उत्तर भारत में ठंड का मौसम बूढ़े लोगों के अंतिम दिनों को काफी नजदीक ला देता है। एक उपाय यह भी है कि सड़क पर, फुटपाथ पर रहने वाले शहरी गरीब ऐसी ठंड से बचने के लिए छोटे-मोटे अपराध कर जेलों में चले जाते हैं। मरता क्या न करता। जो नहीं जा पाते हैं, उनमें से कुछ दुर्बल किसी सवेरे ठंड से अकड़ कर दुनिया छोड़ जाते हैं। थरथरा देने वाली इस ठंड को ध्यान में रखते हुए बनारस में पुजारी और भक्तों ने जगत के पालनहार को भी गर्म कपड़े पहना दिए गए हैं। सीता को जहां ऊनी स्कार्फ बांधा गया है, वहीं राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व हनुमान जी को ऊनी टोपियां पहनाई गई है। भक्त और पुजारी दोनों ही यही मानते हैं कि जब हम इस ठंड में इतने गर्म कपड़े पहन सकते हैं तो जगत के पालनहार को क्यों नहीं। अब इस देश में पालनहार भी उन्हीं को पाल रहा है जो उसे भेंट, प्रसाद, कपड़े और गहने पहना रहे हैं।

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