लेखक परिचय

पुनीता सिंह

पुनीता सिंह

हिन्दी से एम.ए, साहित्य पढना व लिखना आपकी रुची है। उपल्ब्धि के तौर पर अभिवयाक्ति (कव्य संग्रह) का प्रकाशन, आकाशवाणी से कई रचनाएँ प्रसारित, पत्र - पत्रिकाओं आदि मे पचास से भी अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

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बरसात आती हैinflation

या महँगाई बरसती है

बाजार मे हर चीज बहुत मंहगी है।

बाहर बाढ जैसा नज़ारा है

इधर घर की नाव डूबने को है।

सब्ज़ियों के भाव बादल जैसे

गरज रहे है

हर चीज को महगाई ने डस लिया है

इन्सान और इन्सानियत

क्यों इतनी सस्ती हो गई?

राह चलते इसके दूकानदारो की

हस्ती हो गयी।

बाजार मे आलू,आटा,चावल

प्याज, दूध पानी तक मँहगा है।

मगर आदमी (इन्सान) बहुत सस्ता है

इसे ले जाओ

जैसे मर्जी सताओ

मारो,खाओ,पकाओ

किसी को कुछ फर्क नही पडॆगा

भूखॊ का पेट तो भरेगा

पर महंगाई का दंश नही चुभेगा।

One Response to “महँगाई का दंश – पुनीता सिंह”

  1. श्‍यामल सुमन

    shyamalsuman

    बहुत खूब पुनीता जी। आपकी इस रचना को पढ़कर पहले की लिखी निम्न पंक्तियों की याद आयी-

    बिजलियाँ गिर रहीं घर पे न बिजली घर तलक आयी।
    बनाते घर हजारों जो उसी ने छत नहीं पायी।
    है कैसा दौर मँहगीं मुर्गियाँ हैं आदमी से अब,
    करे मेहनत उसी ने पेट भर रोटी नहीं खायी।।

    Reply

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