लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
हमारे भारत देश में ईमानदार वही है जिसके टेबल पर पैसा पहुंचने का आगम नहीं है । जिसके टेबल पर पैसा नहीं, वही सही टाइम पर ऑफिस आता है और आफिस छोड़ देता है। जब टेबल पर माल-पानी आने लगता है तो जल्दी आफिस में कर्मचारी भी आने लगते हैं और 8 बजे शाम तक जनसेवा भी करते रहते हैं। यह उनकी उपरी कमाई का साधन होता है । इसकी समाज में पूरी वकत होती है। यह उनका स्पेशल स्टेटस होता है। वेतन तो वह केवल नाम मात्र के लिए लेते रहते हैं।
इस देश में पुलिस भ्रष्ट तभी तक लगती है जब तक किसी का बेटा दारोगा में भर्ती नही हुआ होता है। परिवार में जब कोई पुलिस में आ जाता है तो सारा पुलिस का सिस्टम पाक-साफ दिखाई देने लगता हैं। पहले की जाने वाली सारी आलोचना खुदबखुद रुक जाती है।
इस देश में टीचर तभी तक निट्ठले लगते हैं जब तक उनकी बेटी टीचर नही बनी है। परिवारीजन के टीचर बनते ही वही टीचर गुरु ब्रह्मा के सदृश्य हो जाते है। उनके परिवार की इज्जत समाज में बढ़ जाती है और उनके द्वारा की जाने वाली सारी आलोचनायें खुदबखुद बन्द हो जाती है।
जैसे जर्मन जन्म से ही योद्धा, जापानी जन्म से नियम मानने वाले होते हैं। वैसे ही हम भारतवासी जन्म से भ्रष्ट होते हैं।भ्रष्टता हमारे ब्लड और संस्कार में जगह बना रखी है। ये मात्र कानून बनाने से नहीं जाने वाला है। हम समाज की चकाचैध में अपनी दृष्टि पर परदे का आवरण डाल लेते हैं। दूसरों का वैभव व चमक-दमक देखकर हम उल्टे-सीधे हरकतों से उससे आगे बढ़ने का प्रयास करने लगते हैं और हमारी सारी संवेदनायें समाप्त हो जाती हैं। हमें केवल पैसा या मुद्रा ही दिखाई देती है। हम उसकी चकाचैंध में वह सब करने लगते हैं जिसे ना करने के लिए हमने कसमें खाई है और संविधान या कानून जिसे मना कर रखा है।
नियम और कानून एक का मुँह बंद करता है, तो दूसरे प्यासे प्रतीक्षित का मुँह खोल भी देता है। एकलव्य के साथ नाइंसाफी का रोना रोने वाले अपने भीतर का द्रोण नहीं देख पाते हैं । जिस प्रकार अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे से जुड़े होते हैं।उसी प्रकार हमें अपने हित के लिए, वह सब अपना अधिकार समझने लगते हैं जो दूसरे के लिए सबब बनती है या बनने जैसा लगती है। हाथी के दंत खाने को और तथा दिखाने को और होते हैं। हम भी उसी प्रकार समाज में दोहरा चरित्र जीने लगते हैं और वह सब बड़े हक से करने लगते हैं, जिसे और अपना हकतल्फी मानते हैं।
भारत देश के ज्वेलर्स को 8 नवम्बर 2016 की तारीख को पूरा मौका मिला। उन्होंने अपनी खूब कमाई किया। सोने- चांदी के भावों में अचानक उछाल आ गया। दुकाने रातों-दिन खुली रहीं। पुरानी नोंटों की जगह आभूषण व सोनें की ईंटें, धनकुबेरों के तिजोरियों एवं गुप्त तहखानों में आने लगीं। जिस पर लक्ष्मी जी मेहरबान है, वह उनके प्रसाद की गंगा में डुबकी क्यों ना लगाये ? आज जब छापों में यह सबके सामने आ रही है। लोग इसे देख-सुनकर अपने को धन्य मान रहे हैं । उन्हे अपने को भारतवासी होने का गर्व महशूस हो रहा होगा।
इसके बाद बैंक मैनेजर की बारी आयी है। उन्होंने दो-दो हजार रुपयों के लिए पूरे देश के लोगों को लाइन में खड़ा करा दिया। कुछ दिनों की अपनी छुट्टी बरबाद किया। पिछले रास्ते से जान-पहचान वाले अपने काले को सफेद करने के लिए सम्पर्क किये तो कमीशन में घर आने वाली लक्ष्मी का निरादर कैसे करते ? जनता तो उल्टे उन्हे सलूट भी करने लगी थी। मान सकता हूँ कि सबके सब बैंक वालों के हिस्से में लक्ष्मी जी नहीं आई होंगी, तो क्या उन्हें इस हेराफेरी की जानकारी भी नहीं रही होगी ? यदि देश के प्रति एक भी बैंक जन अपना सही फर्ज निभाता, तो नोटवन्दी सफल होकर रहता है और जनता इतना परेशान भी नहीं होती। और ना सरकार को माननीय उच्चतम न्यायालय तथा चुटभैयों पप्पू, केजरी व दौलत की वेटियों के ताने सूनने को मिलते।
शायद कल किसी इन्कम टैक्स वाले की बारी आ सकती है। क्या उन्होंने ही सारी ईमानदारी का ठेका ले रखा है? वे भी इसी समाज के अंग हैं । उनकी भी जरुरतें होती हैं। मंहगाई में केवल वेतन से परिवार पालने में उन्हें भी तकलीफ होती होगी। सब कोई मोदीजी तरह फकीर तो हैं नहीं। वह प्रधानमंत्री के साथ ही साथ स्वयं को प्रधान सेवक भी मानते हैं। उन्हें राजपद मिला है तो वह रामराज्य लाने को सोच सकते हैं। परन्तु राम के राज में एक सामान्य दलित के कहने पर रामजी ने अपनी पवित्र धर्मपत्नी का क्या त्याग नहीं किया था ? देश की सेवा के लिए क्या मोदीजी यह त्याग नहीं कर रहे हैं? रामजी तो सर्व शक्तिमान थे। वे सबके मन की भी जानते थे और तदनुकूल करते भी थे। मोदीजी के अधिकारी मोदीजी जैसे कैसे बन सकते हैं? वे सेवक तो हैं नही, वे तो अधिकरी हैं और परिवार वाले हैं। इसलिए आगे किसकी बारी आयेगी यह कह पाना मुश्किल है?
कल तक महँगी प्याज होने पर लोग कहते थे कि देश की करोडों जनता नमक-प्याज खाकर जीवन जीती है, और आज वही गरीब-जनता ना जाने कौन सा धन जमा भी कर रही है और निकाल भी नहीं पा रही है। फिरभी भीड़ छटने का नाम नही ले रहा है। यह भाड़े का भीड़ भी हो सकती है। इसके पीछे कोई ना कोई गिरोह या संगठन भी सक्रिय हो सकता है। यही गिरोह या संगठन ही आज आम जनता का हितौशी बन भूंक भी ज्यादा रहा है।
#नोटबंदी अपने उद्देश्य में सफल है या असफल इसका परिणाम आने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा। इस बात पर तो मुहर लग गयी है कि हमारे भारत देश में 100 में 90% बेईमान हैं फिर भी मेरा भारत महान हैं ।मैंने घर-घर में देखा है कि एक घर में औरत जब 4 बच्चों को दूध देती है, तो अपने बेटे की गिलास में थोड़ी ही सही, पर मलाई अधिक डालती है। भाई अपने सगे भाई को पुश्तैनी जमीन एक हाथ टुकड़ा भी अधिक देने को राजी नही होता। परिवार का कोई सदस्य कितना भी कमायें ,पर बाप के पेंशन पर नज़र जरुर रहेगी कि कहीं बेटी को कुछ दे तो नहीं रहे हैं ?
इस देश में बेईमानी की पहली पाठशाला परिवार ही है। हम चाहते हैं की लंगोट पहनने वाला गाँधी पड़ोस में पैदा हो
और अपने घर गुलाब लगाने वाला नेहरु पैदा हो ।ये देश शराब को नापाक हराम कहके अफीम-गाँजा पीने वालों का देश है। अपनी बेटी-बहनों को सात तालों , बुरके वा परदे से छुपाकर ढ़कने वाला दूसरों की बेटी-बहनों को घूरने (X-Ray करने) वाला देश है।
इस देश के रग-रग में भ्रष्टता है, चाहे वो नोट बंदी में चीखे या न चीखे। मुझे बस एक ही ईमानदार दिखाई दे रहा है। इस कुरुक्षेत्र में वो प्रधान सेवक है, वो बर्बरीक है, जिसने अपने ही हाथों अपनी गर्दन काटकर (भ्रष्टाचार मुक्त करने का संकल्प लेकर) खूब तमाशा देख व दिखा रहा है। उस बर्बरीक ने सबको नंगा करके रख दिया है । अपनों को,गैरों को, मुझको, आपको और सबको।हम यदि उसको सहयोग ना कर सके तो कमसे कम हो-हल्ला करने वालों को रोकने-टोकने वा जनता में उसके सही मैसेज को पहुंचाने का काम तो कर ही सकते हैं। कम से कम इतना तो कह ही सकते हैं कि 70 साल से पनपा यह कैंसर का रोग, एक ही आपरेशन या थिरौपी से एक ही बार में, पूरा का पूरा ठीक नहीं हो सकेगा। इसमें वक्त भी चाहिए और सब्र भी ,त्याग भी चाहिए और बलिदान भी। यदि एसा हो सका तो वह दिन दूर नहीं कि भारत एक बार फिर जगत का गुरु ना बन सके। उसे सोने की चिड़िया बनने से कोई भी नहीं रोक सकेगा।

2 Responses to “‘मेरा भारत महान’, जहाँका ‘जनजन बेईमान’”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    चलिए मैं मान लेता हूँ कि आपका प्रधान सेवक ईमानदार है या कम से कम आप जैसे बहुत लोगों की नजर में ईमानदार दीखता तो है,पर फिर बात आती है ,इस ईमानदार प्रधान सेवक के सन्देश को घर घर पहुंचाने की,वह कौन करेगा?अंग्रेजी में एक कहावत है: “Man is known by the company he keeps.”मैं नहीं समझता कि इसके बाद भी इस सन्देश पहुंचाने वाली बात में कुछ कहने को बाकी रह जाता है.
    अब थोड़ा आगे बढ़ कर देखते हैं.करीब करीब सब राजनैतिक दलों में ६० से ८० प्रतिशत चंदे के स्रोत का पता नहीं.हमारे प्रधान सेवक की पार्टी इसमे सबसे ऊपर है.क्या प्रधान सेवक का यह कर्तव्य नहीं है कि वह अपनी पार्टी में सबसे पहले पारदर्शिता लाये?
    लोकपाल ऐक्ट संसद पारित कर चुकी है.राष्ट्रपति का मुहर लगने के बाद वह Notify भी हो चूका है.क्या मैं पूछ सकता हूँ कि अभी तक लोकपाल क्यों नहीं बहाल हुआ? ऐसे अनेक प्रश्न हैं,जो उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं.

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  2. इंसान

    डॉ. राधेश्याम द्विवेदी जी, ज्यों ज्यों आपका निबंध, “‘मेरा भारत महान,’ जहाँ का ‘जनजन बेईमान’” पढ़ता गया मैं त्यों त्यों ह्रदय पर बराबर लग रही चोट की आह में डूबने लगा लेकिन अकस्मात निबंध के अंतिम भाग में मोदी जी स्वरूप मलहम ने मानो मन शीतल कर दिया और मैं पुनः उभर कर लौट आया हूँ| अब इस डूबने और उभरने की क्रिया में मैं अपने को उन सभी लोगों की ही तरह देखता हूँ जो कर्तव्य को त्याग अपने हित में केवल अधिकारों की मांग करते हैं| मैं बचपन से ही मंदिरों व धार्मिक सभाओं में श्री रामायण की कथा व टिप्पणी सुनते बड़ा हुआ हूँ लेकिन देख रहा हूँ कि आज वैश्विकरण की ओर निष्क्रिय बढ़ते श्री रामायण नहीं बल्कि देव कुमार और माइकल जैक्सन हमारे आदर्श बन कर रह गए हैं| सभ्य देशों में श्री रामायण के बोध में सक्रियता लाने हेतु नियम व कानून बनाए हैं जिन का अनुसरण करते वहां नागरिक कर्तव्य और अधिकारों में संतुलन बना अपना जीवन-यापन करते हैं| कोई आश्चर्य नहीं एकलव्य के साथ नाइंसाफी का रोना रोते हम अपने भीतर का द्रोण नहीं देख पाते|

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