आजकल त्यौहारों का मौसम है। एक के बाद एक त्यौहार… इस कड़ी में अब करवा चौथ आने वाली है। हर त्यौहार की तरह इस त्यौहार का भी बाज़ारीकरण बहुत हुआ है।इस त्यौहार के लिये नये कपड़े गहने से लेकर, पति क्या उपहार दें इसकी चर्चा भी होती है और विज्ञापन भी भर भर कर देखे जा सकते हैं। बाज़ारीकरण एक तरफ समृद्धि का प्रतीक है तो दूसरी तरफ़ दिखावे का, इसलिये त्यौहारों पर ख़रीददारी करते समय अपनी आवश्कताओं की प्राथमिकतायें तय करना बहुत ज़रूरी है। कुछ लोग मानते हैं कि करवाचौथ पति पत्नी के प्रेम का प्रतीक है, यदि ऐसा है तो प्रेम के प्रतीक को अनावश्यक रूप से तोहफों से तोलना सही नहीं है।

हमारे त्यौहार हमारी परम्परा और संस्कृति की धरोहर हैं परन्तु कालांतर में उनमें बहुत से बदलाव आगये हैं। करवाचौथ में आये बदलावों का प्रमुख कारण यश चोपड़ा और करण जौहर की फ़िल्में और टी. वी धारावाहिक हैं।इन्होने इस त्यौहार को बड़े ग्लैमरयुक्त तरीक़े से पेश करके इसकी चकाचौंध इतनी बढ़ा दी है कि लगता है कि ये पूरे भारत का सबसे बड़ा त्यौहार है, जबकि ऐसा नहीं था। यह त्यौहार जितने ज़ोर शोर से पंजाब में मनाया जाता था कहीं नहीं मनाया था।फिल्मों में करवाचौथ के पंजाबी स्वरूप को ही बहुत बहुत सजधज के साथ दिखाया जाता है।

मुझे याद है उत्तर प्रदेश में तो हम निर्जल व्रत भी नहीं करते थे दूध चाय फल वगैरह खाते रहते थे। न नये कपड़े का चलन था, न पति के उपहार देने का, न पति को चलनी से देखने का, न पति के द्वारा पानी पिलाने का, न सामूहिक पूजा का।घर की औरतें घर मे पूजा कर लेती थीं चाँद को अर्घ देकर व्रत खोला जाता था। सास को या किसी और बड़े व्यक्ति को साधारण से बायने में कुछ रुपये रखकर दे दिये जाते थे।

उत्तर भारत के अन्य प्रदेशों में भी थोड़े बहुत अंतर के साथ करवाचौथ इसी तरह से मनाया जाता होगा पर अब यह त्यौहार पूरे फ़िल्मी अंदाज़ में मनाया जाने लगा है।बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में करवाचौथ का अस्तित्व नहीं था पर अब वहाँ भी इसकी ख़ुशबू पहुँच गई है।

अब मैं करवाचौथ के मनोवैज्ञानिक पक्ष की बात करूँगी। ये त्यौहार पति की लंबी आयु की कामना के लिये रखा जाता है।करवाचौथ का व्रत करना पति की लम्बी उम्र की गारंटी नहीं हो सकता ये हम सभी जानते है पर मानते नहीं हैं।चलिये परम्परा निभाने के लिये साल में एक व्रत करना है तो कीजिये कोई नुकसान नहीं है त्यौहार मनाने में……. मैने लैंगिक बराबरी, या नारी सशक्तीकरण की बड़ी बातें करने वाली औरतों को पूरी निष्ठा के साथ करवाचौथ करते देखा है।दरअसल महिलाओं के ज़हन में, उनके अवचेतन व अचेतन मन में एक ‘डर’ बिठा दिया गया है(conditioning) जिसे वे ख़ुद नहीं समझती। हर साल करवाचौथ पर जो कहानी सुनाई जाती है वह इस conditioning का बहुत बड़ा कारण है।

मैने देखा है बुज़ुर्ग महिलाये, डायबेटिक महिलायें, गर्भवती महिलायें, इनैमिक महिलायें भी अपने स्वास्थ्य को भूलकर ये व्रत करती ही हैं, सिर्फ उस ‘डर’ के कारण। इन महिलाओं का सदैव जवाब यही होगा कि नहीं ऐसा कोई डर नहीं है जब तक निभा सकता है निभा लेंगे। मैं ऐसी महिला को जानती हूँ जो ख़ुद केमोथैरेपी ले रही हैं और करवाचौथ कर रही हैं।ये स्वयं नहीं जानती कि ये व्रत उनके मन में बैठा ‘डर’ करवा रहा है। एक बार इस डर को निकाल सकें तो व्रत करने की ज़रूरत नहीं होगी पर सालों की conditioning को तोड़ना आसान नहीं है।

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