बाग़ी करोड़ों लोग हैं दो चार मत समझ…..

इक़बाल हिंदुस्तानी

मजबूर हूं मगर मुझे लाचार मत समझ,

बेरोज़गार हूं मगर बेकार मत समझ।

 

मेरी तरह सभी को क़लम तो नहीं मिली,

बाग़ी करोड़ों लोग हैं दो चार मत समझ।

 

इल्ज़ाम का भी देंगे तेरे वक़्त पर जवाब,

कुछ मस्हलत है चुप हैं ख़तावार मत समझ।

 

क़ीमत अदा करोगे तो लिखदेंगे क़सीदे,

ये लोग व्यापारी हैं फ़नकार मत समझ ।

 

करने के इश्क़ तौर तरीके़ तो सीख ले,

दिलबर की ना को तू सदा इन्कार मत समझ।

 

लाने में इन्क़लाब मेरा साथ दे ना दे,

लेकिन दिमागी तौर पर बीमार मत समझ।

 

बच्चे जो तुझको देते हैं एहसान मान ले,

इक पेड़ बोके फल का तू हक़दार मत समझ।

 

इंसान बनके देख तू दुनिया है मज़े की,

मज़हब को अपने बीच में दीवार मत समझ।।

 

नोट-बाग़ीःविद्रोही, मस्लहतःरण्नीति, क़सीदेःचापलूसी, फ़नकारःकलाकार

1 thought on “बाग़ी करोड़ों लोग हैं दो चार मत समझ…..

  1. “इंसान बनके देख तू दुनिया है मज़े की,

    मज़हब को अपने बीच में दीवार मत समझ”
    लाजवाब

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