लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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आज सुबह जैसे ही मैंने अखबार खोले, मेरा खून खौल उठा। फिर निर्भया ! अभी एक हफ्ता ही हुआ है, निर्भया के बलात्कारियों को मृत्युदंड की घोषणा को और रोहतक के इन नर-पशुओं की इतनी हिम्मत पड़ गई ! क्यों पड़ गई, इतनी हिम्मत इनकी ? क्या इसलिए नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय की उस सजा का उन पर या किसी भी दरिंदे पर कोई असर नहीं हुआ ?

निर्भया के बलात्कार और हत्या ने सारे देश को हिला दिया था लेकिन उसके बलात्कारियों की सजा के कारण किसी के सिर पर जूं भी नहीं रेंगी। क्यों नहीं रेंगी ? इसके लिए कोई जिम्मेदार है तो हमारी संसद है और अदालतें हैं। दोनों का रवैया बेहद कठोर होना चाहिए। जस्टिस वर्मा कमेटी ने निर्भया-कांड के बाद सजा-ए-मौत की सिफारिश की थी। उसके आधार पर कानून भी बना लेकिन सजा-ए-मौत भी बेअसर साबित हो रही है।

जस्टिस वर्मा कमेटी ने निर्भया-कांड के बाद सजा-ए-मौत की सिफारिश की थी। उसके आधार पर कानून भी बना लेकिन सजा-ए-मौत भी बेअसर साबित हो रही है।
निर्भया-जैसे कांड पिछले चार साल में कई हो गए हैं। ऐसा इसलिए होता है कि अदालत के फैसले इतनी देर में आते हैं कि लोग उस घृणित बलात्कार और हत्या को भूल चुके होते हैं। इसके अलावा फांसी पर चढ़ाने का काम गुपचुप होता है जबकि अपराध खुले-आम होता है। यदि इन अपराधियों के साथ वही बर्ताव किया जाए, जो इन्होंने उन युवतियों के साथ किया था याने उन्हें खुले आम फांसी दी जाए, उनके अंग भंग किए जाएं और उन्हें मरते हुए लाखों-करोड़ों लोगों को देखने-दिखाने दिया जाए तो भावी बलात्कारियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ सकती है।

बलात्कार करने वाले हत्यारों के माता-पिता के लिए भी कठोर कारावास की सजा अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि वह कुकर्म उनकी कुशिक्षा या उपेक्षा का ही परिणाम है। यदि संसद ऐसा कानून पास करे और अदालतें अधिक से अधिक एक माह में फैसला दे दें तो देखें, फिर यह पशुता घटती है या नहीं ? बिजली के तार को क्या कभी आपने किसी को छूते हुए देखा है , नहीं ! क्यों ? क्योंकि उसे पता होता है कि उसे ज्यों ही छुआ कि प्राण गए! कानून बने तो ऐसा बने !

One Response to “फिर निर्भयाः कानून बने तो ऐसा!”

  1. शकुन्तला बहादुर

    Shakuntala Bahadur

    मैं भी यही लिखना चाहती थी , जो विद्वद्वर वेदप्रताप जी ने लिखा है । मैं पूरी दृढ़ता से उनके मत का समर्थन करती हूँ । विशेषरूप से आत्मस्वीकृति के बाद तो सन्देह के लिए कुछ शेष ही नहीं रहता । कोर्ट्स के बीच सालों साल केस के बाद निर्णय आने के कारण कुछ अपनी मौत मर जाते हैं तो कुछ आत्महत्या कर लेते हैं । सज़ाए मौत ताकती रह जाती है । पिछली निर्भया के केस में तो चश्मदीद गवाह के होने पर भी पाँच साल लग गए । तब तक अपराधी जेल में रोटियाँ तोड़ते रहे और अदालत का समय और उन पर व्यय हुआ धन भी व्यर्थ चला गया । लम्बे समय में लोगों के मन में वो बर्बरतापूर्ण दुर्घटना भी
    धूमिल पड़ जाती है । अत: दंडविधान में परिवर्तन नितान्त आवश्यक है ।

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