लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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rajendraअशोक “प्रवृद्ध”

कृण्वन्तो विश्‍वमार्यम् तथा स्वदेशो भुवनत्रयम्-अर्थात् सम्पूर्ण विश्‍व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनायेंगे तथा तीनों लोक अपने ही देश हैं, आदि समानता के वैदिक मंत्र प्रारम्भ से ही भारतवासियों के पुरुषार्थ को प्रेरित करते रहे हैं । सपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से भारतवासी सहस्रों वर्षों पूर्व से ही विश्‍व के देशों में जाते रहे और वहाँ भारतीय संस्कृति के जन-कल्याण का संदेश देते रहे हैं । अगस्त्य, कम्बु, कौण्डिय और राजेन्द्र चोल आदि दिग्विजयी महापुरुष भारत के दक्षिणी भू-भाग के कुछ ऐसे श्रेष्ठ पुरुष हैं, जिन्होंने विदेशी भूमि पर भारतीय विजय पताका फहराकर भारतीय सभ्यता-संस्कृति के प्रत्यारोपण के प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर दी और भारतीय संस्कृति का अमिट प्रभाव विश्व पर छोड़ा। इन्हीं दिग्विजयी पुरुषार्थी और पराक्रमी पुरुषों में से एक भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले तमिल चोल साम्राज्य के महान शासक राजेंद्र चोल-प्रथम पहले भारतीय शासक थे, जिन्होंने भारत के वैभव को विदेशों तक विशेष पहचान दिलाई।चोल साम्राज्य के काल में भारत एक बड़ी ताकत और सम्पन्नता के लिए पहचाना जाना जाता था I यह सत्य है कि चोल साम्राज्य की महानता और वैभव को देश में अब तक अनदेखा किया जाता रहा है I लेकिन यही वह काल था जब भारत एक बड़ी ताक़त और सम्पन्न राष्ट्र के रूप में चोल वंश के शासक राजेंद्र चोल-प्रथम के नेतृत्व में सम्पूर्ण भारत के साथ ही पूर्व एशिया तक पहुँच गया था I यही कारण है कि विश्व के महान विजेताओं में गिने जाने वाले राजेंद्र चोल-प्रथम के राज्याभिषेक अर्थात शासनकाल के एक हजार वर्ष पूरे होने पर भाजपा की केंद्र सरकार को शासनारूढ़ होने के साथ ही इसका स्मरण कर मिलेनियम सालगिरह समारोह मनाने की घोषणा करनी पड़ी और देशवासियों को देश के समृद्ध इतिहास से अवगत कराने के लिए मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को केंदीय विद्यालय संगठन को पत्र भेज चोल वंश की परम्परा और साम्राज्य के बारे में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए निर्देश देना पड़ा I

ध्यातव्य हो कि दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य के सबसे महान शासक राजेंद्र चोल प्रथम राजराजा चोल के पुत्र थे। राजेंद्र चोला-प्रथम ने बिहार और बंगाल के पाल वंश के राजा महिपाल को हराने के पश्चात सुदूर दक्षिण से गंगा के मैदानों तक राज्य की सीमा हो जाने के कारण गंगेकौण्ड की उपाधि धारण कर गंगैकौण्ड (गंगई कोड़ा) चोलपुरम नामक एक नई राजधानी का निर्माण किया था। वहाँ उन्होंने एक शिव मंदिर भी बनवाया था। अपनी राजधानी में राजेंद्र चोल- प्रथम ने एक विशाल कृत्रिम झील का भी निर्माण कराया जो कि सोलह मील लंबी तथा तीन मील चौड़ी थी। यह झील भारत के इतिहास में मानव निर्मित सबसे बड़ी झीलों में से एक मानी है। उस झील में बंगाल से गंगा का जल लाकर डाला गया। चोल सम्राट राजेन्द्र देव स्वयं शैव थे, किन्तु भगवान विष्णु तथा गौतम बुद्ध के अनेक मन्दिर उन्होंने बनवाये। उनके राज्य में प्रत्येक पंथ और सम्प्रदाय को राज्य से प्रश्रय मिलता था और उपासना पद्धति की सम्पूर्ण स्वतंत्रता चोल-राज्य में थी। वर्तमान में तमिलनाडु के त्रिची जिले के गंगकुंडपुरम् में इस प्राचीन विशाल नगरी के भग्नावशेष हैं।अपने शासनकाल में उन्होंने दक्षिण भारत में विकसित विशाल चोल साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत में किया था। राजेंद्र चोल-प्रथम के नेतृत्व में चोल साम्राज्य ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने राज्य क्षेत्र का विस्तार किया, जिनमे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका , मालदीव, मलेशिया , दक्षिणी थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल थे। मध्ययुग के समय कई तमिल कवियों ने अपनी कविताओं में राजेंद्र चोल-प्रथम के सफल आक्रमणों का गुणगान किया था। उत्तर भारत में गंगा नदी तथा मलेशिया तक अपना शासन स्थापित करने के बाद, उन्हें गंगैकौण्ड (गंगईकोड़ान) चोल और काडारामकोड़ान के खिताब से नवाज़ा गया था।

आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व सातवाहनों के निर्बल होने के बाद दक्षिण भारत में पल्लवों और पाण्ड्यों का प्रभुत्व हो गया। चोल राजवंश उन दिनों पल्लवों के अधीन था तथा वर्तमान कुडप्पा जिले (तमिलनाडु) के क्षेत्र तक उनका शासन सीमित था, लेकिन नवीं शताब्दी के अंत में चोलों की शक्ति कुछ बढ़ने लगी। यह वह काल था जब पल्लवों और पाण्ड्यों के बीच चल रहे संघर्ष में दोनों कमजोर हो रहे थे और इसका लाभ उठा कर चोल शक्तिशाली हो रहे थे। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर विजयालय नाम के चोल राजा ने अपनी स्थिति मजबूत की और उसके पुत्र आदित्य ने अपना स्वतंत्र चोल राज्य स्थापित कर लिया । आदित्य का पौत्र राजराज सन् 985 में चोल-वंश का पहला प्रतापी नरेश बना, जिसने पहले तो पाण्ड्य राज और केरल के राजा को परास्त किया और फिर पश्‍चिमी गंगदेश (आज का आंध्र) को हरा कर पूरे दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ कर ली ।तत्पश्चात उसने अपनी शक्तिशाली नौसेना से सिंहल द्वीप (श्रीलंका) का उत्तरी भाग जीत लिया। उसके पुत्र राजेन्द्र देव ने अपने पिता राजराज के निधन के बाद 1014 में चोल साम्राज्य की बागडोर हाथ में ली। राजेन्द्र देव एक दूरदर्शी शासक था, जिसे एक शक्ति-सम्पन्न भारत की आवश्यकता दिखलाई पड़ रही थी, क्योंकि उत्तर भारत में महमूद गजनवी के आक्रमण प्रारम्भ हो चुके थे। इसके लिए उसने चोल साम्राज्य का विस्तार कर दक्षिणपथ को सैनिक दृष्टि से सुदृढ़ करने का कार्य आरम्भ किया। दूसरा काम उसने राज्य को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने का किया। आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तक तो चोल साम्राज्य विस्तार पा ही चुका था, अब राजेन्द्र चोल ने कलिंग (उड़ीसा) और बंगाल की विजय-यात्रा शुरू की। दोनों ही राज्यों ने राजेन्द्र की अधीनता स्वीकार कर ली। दक्षिण में उसने सिंहल द्वीप (श्रीलंका) को पूरी तरह जीत कर भारत की दक्षिणी सीमा को पूरी तरह निरापद कर लिया। उसकी नौसेना अब तीनों सागरों (हिन्दू, सिन्धु और गंगासागर) में स्वच्छंद रूप से विचरण करने लगी।
आर्थिक मजबूती के लिये चोल-राज ने अन्य देशों से व्यापार को बढ़ावा देने का निश्‍चय किया। उस समय चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से भारत का अधिकतर व्यापार होता था। बहुमूल्य सामग्री से लदे जहाज गंगासागर (बंगाल की खाड़ी) और हिन्द महासागर को पार कर यव द्वीप (जावा) होते हुए लव-द्वीप (लाओस), चम्पा(वियतनाम), कम्बुज (कप्पूचिया) के बन्दरगाहों पर माल उतारते थे। इसके बाद ये पोत चीन और जापान की ओर बढ़ जाते थे। इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिये राजेन्द्र देव ने अपनी नौसेना को और मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों पर सवार हो महासागरों को नापने के लिये निकल पड़ा । इतिहासकारों के अनुसार, राजेन्द्र चोल के इस नौसैनिक अभियान की योजना अभूतपूर्व व अद्वितीय थी। प्राचीन भारत के तब तक के सबसे बड़े इस नौसैनिक अभियान का उद्देश्य अन्य देशों से भारत के व्यापार के मार्ग को सुरक्षित करने के साथ ही वैदिक धर्म की विजय-पताका पुनः पूरे एशिया में फहराना था। दक्षिण-पूर्व एशिया के तत्कालीन श्रीविजय साम्राज्य के साथ चोल राजवंश के मित्रता के सम्बन्ध थे, लेकिन वहाँ के सैनिकों ने भारत से माल लेकर आई कई नौकाओं को लूट लिया था। उसका दण्ड देने के लिये राजेन्द्र देव ने यह नौसैनिक अभियान प्रारम्भ किया था ।
सन् 1025 में उसके सैनिक बेड़े ने फुर्ती से गंगा सागर पार कर यव-द्वीप (जावा) और सुवर्ण द्वीप(सुमात्रा) पर अधिकार कर लिया। श्रीविजय साम्राज्य के तत्कालीन अधिपति संग्राम विजयतुंगवर्मन की नौसेना भी काफी शक्तिशाली थी। चोल सेना ने मलय प्रायद्वीप (मलेशिया) पर आक्रमण कर श्रीविजय के प्रमुख बन्दरगाह कडारम् (केडाह) को जीत लिया। दोनों सम्राटों के मध्य हुए निर्णायक युद्ध में चोल नौसेना के लड़ाकू युद्ध-पोतों ने श्रीविजय राज्य की नौ-सेना को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। पराजय के पश्‍चात विजयतुंगवर्मन ने चोल सम्राट से मित्रता कर ली।भारत का व्यापार मार्ग अब पूर्ण रूप से सुरक्षित होने के साथ संम्पूर्ण दक्षिण भारत और सिंहल द्वीप के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया पर भी चोल साम्राज्य की विजय पताका फहराने लगी। अन्दमान-निकोबार द्वीपों और मालदीव पर भी चोल-नौसेना का अधिपत्य हो गया।
विश्‍व के महान् विजेताओं में से एक राजेन्द्र चोल ने अनेक जन-कल्याणकारी कार्य भी किये। उसके शासन काल में पूरे दक्षिणापथ की जनता सुखी और समृद्ध थी। साहित्य, कला, स्थापत्य कला, मूर्ति कला,मंदिरों के निर्माण, शिक्षा आदि के क्षेत्र में राजेन्द्र देव के समय उल्लेखनीय विकास हुआ। वैदिक संस्कृति की शिक्षा के लिये प्रत्येक कुर्रम अर्थात ग्राम में श्रेष्ठ गुरुकुल उस काल में स्थापित किये गये। इनमें संस्कृत और तमिल में शिक्षा दी जाती थी। श्रीरंगम्, मदुरा, कुंभकोणम्, रामेश्‍वरम आदि प्रसिद्ध स्थलों पर राजेन्द्र देव ने भव्य मंदिर बनवाये, जो आज भी स्थापत्य कला के अद्वितीय उदाहरण माने जाते हैं।

One Response to “विश्व के महान विजेताओं में से एक राजेंद्र चोल प्रथम”

  1. Himwant

    बुद्ध के बाद करीब 1000 से 1500 वर्षो तक बौद्ध मत का विकास हुआ एवं उस काल में हमारी आक्रमकता क्रमशः समाप्त होती चली गई। उसके बाद हम हमलावरों से अपनी रक्षा नही कर पाए। चोल एवं मौर्य राज्यो की आक्रमकता बरकरार रहती तो हमारा इतिहास थोड़ा भिन्न होता। इतिहास में पात्र महत्वपुर्ण है, उनकी व्रुतिया हमे बहुत कुछ सिखाती है। जो इतिहासकार पात्र, घटना और समय काल में उलझा रहे उनसे क्या सिख पाएंगे हम।

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