देखकर आंसू मेरी आंखों में घबराते हैं लोग…..

इक़बाल हिंदुस्तानी

रात में चुपके से आकर आग सुलगाते हैं लोग,

बाद में हमदर्द बनके पानी बरसाते हैं लोग।

 

जानते हैं ज़िंदगी पानी का है एक बुलबुला,

फिर भी इस नाचीज़ पर कितना इतराते हैं लोग ।

 

पहले दौलत के लिये अपनों से नज़रे फेर लीं,

फिर उन्हीं अपनों की ख़ातिर खूब पछताते हैं लोग।

 

चंद लम्हांे में बिखरकर आैंधे मुंह गिर जायेंगे,

बनके गुब्बारा हवा में उूंचा उड़ जाते हैं लोग।

 

सिर्फ़ पैसा ही नहीं थोड़ी मिलनसारी भी रख,

वक़्त पड़ता है बुरा तो काम आ जाते हैं लोग।

 

बिजलियां होती हैं पानी में उन्हें होगी ख़बर,

देखकर आंसू मेरी आंखों में घबराते हैं लोग।

 

मुफ़लिसी इंसान के रिश्तों की दुश्मन बन गयी,

अपनों को अपना भी बतलाने में शरमाते हैं लोग।

 

आदमी का आदमी पर ख़ौफ़ इतना छा गया,

शाम होते ही घरों में छिप के सो जाते हैं लोग।।

 

नोट-नाचीज़ः तुच्छ, मुफ़लिसीः ग़रीबी, ख़ौफ़ः डर, लम्हेः पल

 

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