आदमी की जान लेना भी तो कारोबार है…..

इक़बाल हिंदुस्तानी

0देश उनकी गोद में जाने को अब तैयार है,

राजनीति जिनकी ख़ानाजंगी का आधार है।

 

0ताक़तों दौलत के बल पर छिन रही पतवार है,

और कश्ती का असल मालिक यहां लाचार है।

 

0किसमें हिम्मत है कि पूछे उसका क्या किरदार है,

ऐब चाहे हों हज़ारों आदमी ज़रदार है।

 

0देर से इंसाफ़ मिलना भी कोई इंसाफ़ है,

फ़र्क़ कुछ पड़ता नहीं फिर जीत भी तो हार है ।

 

0भूख दौलत की हमें किन रास्तों पर ले गयी,

आदमी की जान लेना भी तो कारोबार है।

 

0फ़ायदा आये नज़र तो कुछ भी छप जाये ख़बर,

खुद ख़बर बनता नहीं वो मालिके अख़बार है।

 

0हमने अपने लालचों में कितने झगड़े कर लिये,

इन सभी झगड़ों का हल मेरी नज़र में प्यार है।

 

0काफ़िये की बंदिशें और शर्तेफ़न सब कुछ नहीं,

शायरी दिल से ना हो तो शायरी बेकार है।।

 

नोट-ख़ानाजंगीः गृहयुध्द, किरदारः चरित्र, ज़रदारः धनवान, काफ़ियाः ग़ज़ल की तुक, शर्तेफ़नः विधा के नियम

1 thought on “आदमी की जान लेना भी तो कारोबार है…..

  1. इन सभी झगड़ों का हल
    —– मेरी नज़र में प्यार है।
    —– शायरी दिल से ना हो
    ——- तो शायरी बेकार है।।
    जब आपकी इन पंक्तियों को देखा तो मुग्ध हुए बिना ना रहा गया|
    सवेरा मोड़ पर ही होगा –कुछ और घन प्रहार करने होंगे|

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