शदाणी दरबार के संत साई युधिष्‍ठरलाल जी से सिन्ध,पाकिस्तान के हालात पर एक साक्षात्कार

गत 20 अप्रैल को संत साई युधिष्‍ठरलाल जी के दिल्ली आगमन पर हिमालय परिवार पत्रिका के सहसपांदक कमल खत्री ने संतश्री से भेंट करते हुए सिन्ध व पाकिस्तान के हालात पर चर्चा की। बातचीत के मुख्य अंश –

गत 20 अप्रैल को संत साई युधिष्‍ठरलाल जी के दिल्ली आगमन पर हिमालय परिवार पत्रिका के सहसपांदक कमल खत्री ने संतश्री से भेंट करते हुए सिन्ध व पाकिस्तान के हालात पर चर्चा की। बातचीत के मुख्य अंश –

साई जी, शदाणी दरबार द्वारा विगत 20 वर्षों से सिन्ध से श्रद्धालुओं का जत्था भारत आता रहा है व भारत से सिन्ध को श्रद्धालुओं का जत्था जाता रहा है। इन जत्थों की अगुवाई आप स्वंय कर चुके हैं। आज वहां स्वात घाटी पर तालिबान का कब्जा व जरदारी हकुमत का फेल होना, वहां की सरकार की पकड़ कमजोर होना, इन सब बातों पर आपकी राय-

”पहले तो मैं आपको यह स्पष्‍ट कर दूं कि तालिबान व पाक सरकार कोई दो चीज हैं ही नहीं। हम इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों ही योजनाबद्ध तरीके से अपनी कारवाईयों को अंजाम देते है और मीडिया व अतंराष्‍ट्रीय समुदाय के सामने अपनी अपनी शेखियां बखारते रहते है व एक दूसरे का धमकाते व पुचकारते रहते है।”

साई जी, क्या आज भी पाकिस्तान में खानों(जमींदारी या सांमतवादी) का प्रभुत्व कायम है या जम्हूरियत ने अपने पैर पसार लिए है –

”हाँ यह सच है कि 60 व 70 के दशक तक खानों(जमींदारों) का जनता के हर फैसले पर उनकी नजर रहती थी। ऐसा भी नहीं था कि हकुमत का कंट्रोल नहीं था पर केवल खानों तक। आम फैसले जरगहों(पंचायतों) में लिए जाते थे जिनमें खानों का प्रभुत्व रहता था। खान की इजाजत से ही कोई प्रषासिनक फेरबदल होते थे। पर आज सूचना तकनीक में प्रगति के कारण पहले यह बात शहरों से गायब हुई व आज जिलों से गायब हो रही है। पर तहसील व ग्रामस्तर पर यह दबदबा आज भी कायम है।”

क्या साई, ऊँचनीच जाति के मामले में भी –

”वहां भी ऐसा ही है केवल निचले स्तर पर ही जातपात का भेदभाव है पर एक भेदभाव बढ़ा है वो हिन्दु-मुस्लिम। मुर्शरफ ने अपने शासन के दौरान इस भेदभाव को गहरा करते हुए खासकर सिन्ध में इस्लामीकरण को तेजी से फैलाया। इसकी शुरूआत जियाउलहक ने की थी पर वह पंजाब व फ्रटिंयर प्रांत तक ही सीमित थी। जिसके कारण आज हम देखते है कि किस तरह इन इलाकों से ही अलगाववाद, जेहाद व तालिबान जैसे शब्द सुनाई पड़ते है।”

साई जी, क्या आज भी पाक में सिन्धी पंजाबी मतभेद कायम है-

”जैसा कि मैने कहा कि पिछले 10-15 सालों से वहां पर एक ही प्रकार का भेदभाव बढ़ा है और वो हिन्दु-मुस्लिम जिसे मुर्शरफ जैसे नेताओं ने और अधिक धार दी है। क्षेत्रीय मुद्दों की जगह राष्‍ट्रीय मुद्दे हावी हो गए है। सिन्धी नेता केवल सत्ता पाने की होड़ में सिन्धी कौम को भूल गए है।”

साई जी, जैसा कि पिछले दिनों लदंन से एक लेख प्रकाशित हुआ था कि 2016 में पाक विघटित हो जाएगा, इस बारे में आप का क्या विचार है-

”देखिए, जो चीज हुई ही नहीं है, उसके बारे में कोई भी टिप्पणी करना ठीक नहीं। यह बात ठीक है कि पाक में हालात इतने बिगड़े हुए है कि कहां से विघटन शुरू होगा, कब होगा व होगा भी या नहीं, कह नहीं सकते। आप एक ओर कह रहे है कि यह रिर्पोट लंदन में छपी, जो देश पाक में हालात ठीक होने के के लिए करोड़ो डॉलर दे रहे हो वे ही विघटन की बात करें एक विरोधाभास सा लगता है।”

साई जी, यह मानते हुए कि पाक विघटित हो गया तो क्या ‘सिन्ध अलग राष्‍ट्र बनने की ओर जाएगा या भारत से मिलने का प्रयास करेगा –

”अभी-अभी जैसा मैने कहा कि जो चीज हुई ही नहीं उस बारे में टिप्पणी करना ठीक नहीं। अगर आप संभावानाओं की बात करते है तो सिन्ध के बारे में आपको बता दूं कि सिन्ध भारत के साथ तो कतई मिलने वाला नहीं क्योंकि सिन्ध में इस तरह की कोई मूवमेंट या माहौल जो भारत के पक्ष में हो, नहीं है। सिन्ध में जो भी नेता है उनका पहला मकसद सत्ता पाना है। सिन्धीयत व सिन्धी कौम से उनका कोई लेना-देना नहीं है। मुर्शरफ ने फौज व जमीदारों के माध्यम से इन सब मंसूबों की हवा निकाल दी थी।”

साई जी, अगर ऐसा हुआ तो सिन्धी कौम का क्या होगा? क्या आपको नहीं लगता कि सिन्धी राष्‍ट्रवाद की भावना पैदा होने पर सिन्धी हिन्दु-मुस्लिम का भेद भूल एक हो जाएंगे, जिसमें आप जैसे सिन्धी धर्मगुरूओं का अहम रोल हो सकता है-

”जीयेसिन्ध नाम की मूवमेंट जिन्ना के जमाने से शेख अयाज के नेतृत्व में चलती रही लेकिन उसके मरने के बाद मूवमेंट भी मर ही गई। आप एक असंभव बात की बात कर रहे है। आज सिन्ध हो या पूरा पाकिस्तान, हर जगह हिन्दू को अपनी जान की पड़ी है वह पहले अपनी जान बचाएगा या फिर पाक हकुमत से सिन्धीयत के लिए लड़ेगा ? सिन्धी धर्मगुरूओं के बारे में जो आपने पूछा है तो यह बात जरूर चिंतन करने लायक है व हम इस पर जरूर विचार करेगें।
जय शदाराम! ”

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