कहो कौन्तेय-२१ (महाभारत पर आधारित उपन्यास)

(पाण्डवों का हस्तिनापुर में प्रत्यागमन)

विपिन किशोर सिन्हा

हस्तिनापुर नगर के प्रवेश द्वार पर आचार्य द्रोण और कृपाचार्य हमलोगों के स्वागत के लिए स्वयं उपस्थित थे। उनके पीछे दुर्योधन, दुशासन, विकर्ण, चित्रसेन इत्यादि समस्त कौरव भी मुस्कुराते हुए, हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मुझे आश्चर्यमिश्रित हर्ष हुआ। दोनो गुरुवर के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद धीरे-धीरे हमने नगर में प्रवेश किया। नगर को नवागता वधू की भांति सजाया गया था। मार्ग में सब ओर पुष्प बिखेरे गए थे। सुगन्धित जल का छिड़काव किया गया था। सारा नगर दिव्य धूप की सुगंध से सुवासित हो रहा था। स्थान-स्थान पए तोरण बने थे और राजकीय भवनों पर पताकाएं फहरा रही थीं। प्रजाजनों ने भी अपने-अपने गृहों पर ध्वज लगा रखे थे तथा उन्हें विभिन्न प्रकार के पुष्पहारों से सुशोभित भी किया था। शंख, भेरी और शहनाई की मधुर ध्वनि संपूर्ण नगर में मंगल भाव का संचार कर रही थी। नगरवासी और पुरवासी नेत्रों में हर्ष के अश्रु लिए हम सबके दर्शन कर रहे थे। चारो दिशाओं से जयकार की ध्वनि आ रही थी।

राजमहल के मुख्य द्वार पर पितामह भीष्म और महाराज धृतराष्ट्र ने हमारा स्वागत किया। हमने उनके समीप जाकर उनके चरणों में प्रणाम निवेदित किया। आगे बढ़ने पर काशिराज पुत्री, दुर्योधन की पत्नी ने पांचाली का विधिपूर्वक सत्कार कर अगवानी की। माँ कुन्ती ने कृष्णा का परिचय माता गांधारी से कराया और पुत्रवधू के साथ चरण-वन्दना की। गांधारी ने आशीर्वाद देकर याज्ञसेनी को हृदय से लगा लिया। अत्यन्त सावधानी से हमने हस्तिनापुर में अपनी दूसरी पारी आरंभ की। महात्मा विदुर ने कांपिल्यनगर में ही दुर्योधन, शकुनि, कर्णादि की कुटिल मंशा से हमलोगों को अवगत करा दिया था। हमलोगों को बन्दी बनाकर लाने की कर्ण की योजना भी हमें विस्तार से बताई थी। राज्य को दो भागों में विभक्त कर खाण्डवप्रस्थ का भाग हमें देने की योजना भी हमें ज्ञात थी लेकिन प्रकट रूप से हमने इसका आभास नहीं होने दिया। संपूर्ण हस्तिनापुर पर वैधानिक और न्यायोचित अधिकार हमारा ही था। इसके दो भागों में विभाजन की कल्पना ही मन को व्यथित कर देती थी। हृदय के अंदर बहुत पीड़ा होती थी। पूर्वजों ने अथक परिश्रम, अतुलित पराक्रम और कुशल नेतृत्व के बल पर हस्तिनापुर राज्य को समृद्ध किया था। हमारे आपसी कलह के कारण यह विभाजित हो जाएगा। दो खण्डों में बंट जाएगा। मैं कभी-कभी अत्यन्त विचलित हो जाता था। पिता के राज्य का बंटवारा कही से भी हृदय को स्वीकार नहीं था। लेकिन श्रीकृष्ण और विदुर जी ने कांपिल्यनगर में ही विचार-विमर्श कर अग्रज युधिष्ठिर को आधा राज्य स्वीकार करने हेतु राजी कर लिया था। भविष्य में कौरवों और पाण्डवों के मनोमालिन्य, संभावित विवाद और किसी भी तरह के संघर्ष को विराम देने के लिए इसे अत्यन्त आवश्यक समझा गया। कुरुकुल शिरोमणि पितामह भीष्म ने भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। सहमति क्या, यह प्रस्ताव मूल रूप में उन्हीं का था। आश्चर्य – घोर आश्चर्य! हस्तिनापुर की रक्षा की प्रतिज्ञा से बंधे पितामह भी गृहकलह को टालने हेतु विभाजन को विवश थे। लेकिन विभाजन क्या कोई समाधान दे सका?

कुछ दिनों तक हम लोगों ने हस्तिनापुर के राजमहल में विश्राम किया। श्रीकृष्ण भी हमारे साथ ही आए थे। वे विभाजन से उत्पन्न हमारी व्यथा को अनुभव करते थे। शयन कक्ष में जाने के पूर्व वे मेरे साथ ही रहते थे। मेरे अन्य भ्राता भी अपने समय का अधिकांश भाग मेरे और श्रीकृष्ण के साथ ही बिताते थे। मैं कोई कार्य या भविष्य की योजना के विषय में पूछा करता था – यह कार्य क्यों करना है और इसका परिणाम क्या होगा? मेरे सारे प्रश्नों के सहज भाव से समाधान दिया करते थे वे। उनके उत्तर मुझे मौन कर दिया करते। कुछ लोग कहते, मौन रहना मेरी दुर्बलता थी। नहीं, ऐसा नहीं था। कुन्तीमाता औत श्रीकृष्ण के वचनों को मैंने जीवन भर शिरोधार्य किया – मनःपूर्वक। उनके चरणों में निरपेक्ष भक्ति ही मेरे जीवन की शक्ति थी। यही मेरे जीवन का सार था। माँ ने कई बार, सदैव अग्रज की आज्ञा के अधीन रहने की शिक्षा दी थी, श्रीकृष्ण ने भी यही कहा था। हमें युधिष्ठिर पर राम जैसी श्रद्धा थी। राम के तीन ही अनुज थे, युधिष्ठिर चार अनुजों के अग्रज थे। अग्रज युधिष्ठिर के पांव के अंगूठे के संकेत मात्र से हम सभी अनुज अपनी बात अधूरी छोड़कर चुप हो जाते। हम सभी भ्राता मानसिक रूप से राज्य के विभाजन के लिए तैयार हो गए।

हमलोगों के मनोभावों को अनुकूल देख, महाराज धृतराष्ट्र ने राजसभा में हम सभी भ्राताओं को बुलाकर खाण्डवप्रस्थ स्वीकार करने का आग्रह किया। अपने पुत्रों की निन्दा और हमारी प्रशंसा करते हुए राज्य के विभाजन को उन्होंने गृह-कलह समाप्त करने का एकमात्र विकल्प बताया। हमलोगों की ओर से श्रीकृष्न ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया। महाराज ने अविलंब श्रीकृष्ण की सम्मति से महर्षि व्यास को बुला अग्रज युधिष्ठिर का विधिपूर्वक अभिषेक कार्य भी संपन्न करा दिया। इस अवसर पर आशीर्वाद देने हेतु कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म और धौम्य इत्यादि श्रेष्ठजन भी अत्यन्त उत्साह के साथ उपस्थित थे।

हस्तिनापुर के युवराज युधिष्ठिर अब खाण्डवप्रस्थ के राजा, महाराज युधिष्ठिर बन चुके थे।

क्रमशः 

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जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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