भारत में बुलेट ट्रेन, मोदीजी कुछ विचारणीय बातें

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे 14 सितंबर को भारत दौरे पर आ रहे हैं। निश्‍चित ही उनके आगमन पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उनके साथ द्विपक्षीय वार्ता भी होगी। इतना ही नहीं तो जो सूचना है उसके अनुसार मोदी और आबे गांधीनगर में वार्ता करने के साथ ही महत्वाकांक्षी मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना के लिए भूमि पूजन भी करेंगे। जोकि एक बुलेट ट्रेन परियोजना है। इस रेल परियोजना को लेकर बताया जा रहा है कि 98 हजार करोड़ रुपये की ये योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अतिमहत्‍वाकांक्षी परियोजना है, जिसके पूरा होने के बाद देश को चीन, जापान या यूरोप के तमाम देशों की तरह हाई स्‍पीड ट्रेन में यात्रा करने का सुखद आनंद मिल जाएगा।

 

वस्‍तुत: एक बार में देखें तो यह यात्रा हमें सुखद गतिशील भविष्‍य के संकेत देती है। हाईस्‍पीड ट्रेन में सफर करते हुए भविष्‍य के भारत की कल्‍पना कुछ इस तरह से भी की जा सकती है कि जैसे अब भारत पूर्णत: विकसित हो गया है। कहीं कोई समस्‍या नहीं, न भूख की और न ही किसी तरह से कोई गरीबी के अपमान की। इस बुलेट ट्रेन में सफर करनेवालों को हो सकता है कि सभी कुछ‍ हरा ही हरा दिखाई दे। क्‍या नेता, क्‍या देश की अर्थसम्‍पन्‍न उच्‍च जनता और क्‍या प्रशासन के कर्मचारी लोग । किंतु इसके बाद भी कुछ ज्‍वलंत बिन्‍दु हैं, जिनके बारे में भारत सरकार खासकर रेल मंत्री पियुष गोयल और देश के प्रधानसेवक हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अवश्‍य ही सोचना चाहिए।

 

विचारणीय बिन्‍दु यह है कि क्‍या भारत में बुलेट ट्रेन की आवश्‍यकता है? क्‍या हमारे यहां सभी ट्रेन सही समय पर चल रही हैं? आम नागरिक रेलवे विभाग के लिए एक उपभोक्‍ता है, क्‍या उसके लिए जो रेल किराए से लेकर अभी आरक्षण रद्दीकरण के नियम बनाए गए हैं, वे पर्याप्‍त हैं और सही तरह से वे उपभोक्‍ता स्‍तर पर उनके साथ न्‍याय कर रहे हैं? क्‍या सभी गाड़ि‍या समय पर आ-जा रही हैं? अंग्रेज प्रशासन में वर्ष 1947 में 15 अगस्‍त के पूर्व तक जितना रेल पटरी पर ठोस कार्य किया गया और रेल मार्ग के लिए नए-नए रास्‍ते खोजे गए, क्‍या आज भी वही प्रयास हो रहे हैं? आखिर भारत में ट्रेनें पटरी से क्यों उतर जाती हैं? देश की आजादी के 70 वर्ष पश्‍चात भी हमने समुचे देश में क्‍यों नहीं सेंसर युक्‍त उच्‍चस्‍तर की तकनीक अपनाई जिससे कि पूर्व में ही पता चल जाए कि आगे खतरा है और ट्रेन एक्‍सीडेंट को रोका जा सकता।

 

वर्तमान में यदि भारत की उसके पड़ौसी देश चीन से रेलवे नेटवर्क को लेकर तुलना की जाए तो स्‍थ‍िति बहुत कुछ स्‍पष्‍ट हो जाती है । स्वतंत्रता के समय भारत का रेलवे नेटवर्क चीन से दोगुना था। पर आज चीन हमसे मीलों आगे दिखता है। जबकि चीन भौगोलिक संरचना में भले ही हमसे बड़ा हो, किंतु प्राकृतिक वि‍वि‍धता एवं प्राकृतिक संसाधनों में भारत आज भी चीन से कई गुना आगे है। चीन का अधिकतम भाग अनुपयोगी है, जनसंख्‍या के सघन घनत्‍व के कारण उस पर आबादी का दवाब भी हमसे अधिक है, इसके बाद भी वह अपने अधिकतम मानवसंसाधन के सफल उपयोग और उपभोग में हमसे आगे है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर पर्याप्‍त ध्‍यान दिया है और वे अपने मानवसंसाधन के बेहतर उपयोग पर ही इन दिनों अधिकतम बल देते दिखाई दे रहे हैं। केंद्र में सरकार आने के बाद से रेलवे में भी बहुत से नवाचारी परिवर्तन हो रहे हैं, फिर भी जिन विषयों पर गंभीरतापूर्वक ध्‍यान दिया जाना चाहिए, लगता यही है कि अभी उस पर पर्याप्‍त ध्‍यान नहीं दिया जा रहा है।

 

रेलवे के निजीकरण की बातें चलीं तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि इसका निजीकरण नहीं करेंगे, यह अच्‍छी बात है रेलवे का निजीकरण होना भी नहीं चाहिए,किंतु रेलवे के मूलभूत (कोर) और गैर-मूलभूत (नॉन-कोर) गतिविधियों के अंतर को तो भलि‍भांति समझना ही होगा । गैर-मूलभूत गतिविधियों के संचालन की रेलवे को क्‍या आवश्‍यकता है ? क्‍या मेडिकल, हॉस्टल और स्कूल-कॉलेज चलाने का कार्य, विनिर्माण इकाइयों का संचालन रेलवे को आगे भी करते रहना चाहिए? कोई भी निजी कम्पनी विनिर्माण कर सकती हैं। इन सब के कारण बहुत बड़ा रेल बजट, प्रबंधन का ध्यान, मानव ऊर्जा एवं संसाधन की व्‍यर्थ बर्वादी हो रही है। यानी नॉन-कोर गतिविधियों के संचालन से कोर गतिविधियों का संचालन प्रभावित हो रहा है।

 

रेलवे कई तरह से आमजनता से माल की ढुलाई एवं यात्रा किराए से अपनी आर्थ‍िक आवश्‍यकता की पूर्ति करती है, कम पड़ने पर केंद्र सरकार से वह मदद भी लेती है। पर जनता से उसके जो टिकिट नियम हैं, उन पर वह हमेशा ही कटघरे में खड़ी होती रही है। वर्तमान रेल नियमों का अध्‍ययन कहता है, रेल विभाग आमजनता की जेब पर डाका डाल रहा है, उसके बाद भी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। हर रेलवे हादसे के बाद सरकार जाँच के आदेश देती है। किंतु परिणाम कुछ नहीं। लोकसभा में इसी वर्ष तत्‍कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने स्‍वीकार्य किया था कि “पिछले दो साल और मौजूदा साल में हुए रेल हादसों की बड़ी वजहें रेलवे स्टाफ़ की नाकामी,मशीनों की ख़राबी, तोड़-फोड़ हैं” । कोई ऐसा वर्ष नहीं बीतता जिसमें की बड़े हादसे न हुए हों।  इसी वर्ष जुलाई में आई नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय रेलवे की कैटरिंग सर्विस में खाने की स्थिति बहुत बुरी है और ये इंसानी इस्तेमाल के लायक नहीं। भोजन में छिपकली, कॉकरोज और इल्‍ली निकलती रहती हैं। सीएजी और रेलवे की ज्वाइंट टीम ने 74 स्टेशनों और 80 ट्रेनों का मुआयना करने के बाद इस रिपोर्ट तैयार की थी। कैग की आई रिपोर्ट के बाद हंगामा तो मचा लेकिन सुधार की दिशा में अब तक कोई ध्‍यान नहीं।

 

इसी प्रकार जिस ट्रेन को 120 और 130 की स्‍पीड पर चलना चाहिए वह 60 और 80 की स्‍पीड पर चलती हैं। ऐसे ही 100 की स्‍पीड तय ट्रेनों को 40 एवं 60 पर चलाया जाता है। इससे हो ये रहा है कि जिसको आगे दूसरी ट्रेन पकड़ना है या किसी जरूरी मीटिंग अटेंड करना है, वह उससे वंचित हो जा रहा है। ट्रेन लेट होने का खामियाजा कई स्‍तरों पर आम जनता भुगत रही है। ट्रेन के विलम्‍ब को अभी तक रेलवे ने अपनी गलती स्‍वीकार्य नहीं किया है। जबकि आज भारत के अलावा कई विकसित एवं विकासशील देशों में ट्रेन के अपने गंतव्‍य स्‍थान पर देरी से पहुँचने पर आम उपभोक्‍ता का उसे पूरा किराया ससम्‍मान वापिस कर दिया जाता है।

 

वस्‍तुत: ऐसी तमाम कमियां हैं जिन पर आज रेलवे को समुचा ध्‍यान देकर उन्‍हें दूर करना जरूरी है। यहां प्रधानमंत्री मोदी की बुलेट ट्रेन चलाने का विरोध कोई नहीं कर रहा है। अच्‍छा ही है, इसके परिचालन से देश में ओर कई हजार लोगों को रोजगार के रास्‍ते खुलेंगे, उससे यात्रा करनेवालों के जीवन में भी समय की गति आएगी ही, किंतु यहां इतनाभर कहना है कि मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना जापान के सहयोग से जल्‍द पूरी होने केसाथ में जो अन्‍य ट्रेने हैं, उनके परिचालन,रख रखाव, समय पाबंदी, आम जनता के लिए बनाए गए रेलवे नियमों की तानाशाही बंद करने जैसे तमाम मुद्दों पर भी रेल मंत्री पियुष गोयल एक समय सीमा निर्धारित कर समुचित ध्‍यान दें। सत्‍य यही है कि तभी सच मायनों में रेलवे की सहभागिता से भारत गति पकड़ेगा, एक बुलेट ट्रेन से इस दिशा में बहुत कुछ होनेवाला नहीं है।

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